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जन्माष्टमी पर जाएं कान्हा के धाम

राजलक्ष्मी त्रिपाठी

8th August 2017

कृष्ण का नाम लेते ही राधा रानी के साथ बंकिम मुद्रा में खड़े अधरों पर बांसुरी लगाये बांकेबिहारी की मनोहारी छवि सामने आ जाती है। भक्त जन इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कोई इन्हें गोविंद कहता है, कोई कृष्ण, कोई बांकेबिहारी तो कोई कान्हा कहकर बुलाता है। जितने भक्त उतने ही नाम। मंदिरों के इस देश में भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर पूरे भारत में हैं। मथुरा वृंदावन में ये बांकेबिहारी हैं, तो तिरुपति में बाला जी के नाम से प्रसिद्ध हैं। हम आपको ले चलते हैं उन जगहों की सैर पर जहां कृष्ण कन्हैया विराजमान हैं।

जन्माष्टमी पर जाएं कान्हा के धाम

 

मथुरा-वृंदावन-

बालक्रीड़ाओं और लीलाओं से सबको मंत्रमुग्ध करने वाले श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में कृष्ण जन्माष्टमी की धूम देखने वाली होती है। राधा-कृष्ण के खूबसूरत संबंध को जताते मधुर भजनों और बांसुरी की तान पर नाचती गोपियों के नृत्य का जितना मनोहारी संयोजन यहां होता है अन्यत्र नहीं मिलता। कान्हा की जन्मस्थली वृंदावन और कर्मस्थली मथुरा में एक सप्ताह पहले से ही रासलीला शुरू हो जाती है। यमुना किनारे स्थित जिस कदंब की डाल पर बैठकर कान्हा गोपियों के वस्त्र चुराते थे, उस कदंब की डाल पर आज भी लोग अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु धागा बांधकर बांकेबिहारी के दर्शन करते हैं। मथुरा-वृंदावन में बांके बिहारी जी का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। वहां प्रभु का दर्शन झलकियों में कराया जाता है।मान्यता है कि अगर भक्त एकटक कान्हा को देखें,तो वे मुग्ध होकर उनके साथ चले जाते हैं। मथुरा से थोड़ी सी दूरी पर ही गोवर्धन पर्वत है, जिसे कृष्ण ने निवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। मनोकामना पूरी करने हेतु श्रद्धालु इस पर्वत की परिक्रमा करते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जगन्नाथ पुरी-

चारों धामों में से एक जगन्नाथ पुरी धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से बेहद खूबसूरत स्थान है। यहां भगवान कृष्ण का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां एक साथ बलराम, कृष्ण और सुभद्रा की मूर्तियां हैं। यहां तीनों भाई-बहनों की पूजा होती है। यहां प्रसाद में खिचड़ी और चावल चढ़ाने की परंपरा है। श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। ग्यारहवीं सदी में बना यह मंदिर बेहतरीन आर्किटेक्चर का खूबसूरत नमूना है। यह मंदिर पुरी में जून-जुलाई के महीने में होने वाली प्रसिद्ध रथयात्रा का केंद्र है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तिरुपति बाला जी- 

श्रीकृष्ण का एक नाम वेंकटेश्वर भी है। उनको समर्पित तिरुपति बाला जी के मंदिर की गिनती दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में होती है। मान्यता है कि यहां सच्चे दिल से मांगी गई कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहती है। पूरे साल यहां दर्शनार्थियों की भीड़ रहती है। भव्य मंदिर का आर्किटेक्चर देखने योग्य है। इसके अलावा यहां भगवान वेंकटेश्वर के भाई गोविंदराजा स्वामी का मंदिर भी देखने योग्य है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्रीनाथद्वारा -

राजस्थान के राजसमन्द जिले में पूर्व की तरफ से पर्वतों की दीवार तथा उत्तर-पश्चिम में प्रवाहित बनास नदी के मध्य स्थित यह छोटा सा स्थान वैष्णवों के महत्वपूर्ण तीर्थों में से एक है। नंदराज के सुपुत्र श्रीनाथ जी के यहां पर पदार्पण करने से इस धाम का नाम नाथद्वारा हो गया। श्रीनाथद्वारा का धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से बहुत ज्यादा महत्व है। यह पुष्टि मार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है।यहां पर भगवान श्रीनाथजी का भव्य मंदिर है।हर साल यहां पर लाखों की संख्या में दर्शनार्थी श्रीनाथ जी के दर्शन हेतु आते हैं।श्रीनाथद्वारा के प्रमुख मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति है। मंदिर की विशेषता यह है कि नारायण ने श्री कृष्ण का अवतार लेकर जिस आयु में जैसा श्रृंगार किया था, मूर्ति को उसी क्रम से सजाया जाता है। जैसे उनका बालरूप,कंस का वध करते हुए जो रूप था आदि। श्रीनाथ जी के मंदिर के निकट ही श्री नवनती जी का मंदिर है। इनका दूसरा रूप बालमुकुंद है। बालमुकुंद की इस मूर्ति के दाहिने हाथ में लड्डू है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वारका-

हजारों साल पहले भगवान कृष्ण द्वारा बसाई गई नगरी भारत के पश्चिम में समुद्र के किनारे पर स्थित है। कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ, इनका पालन-पोषण गोकुल में हुआ परंतु इन्होंने राज द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होंने पूरे देश की बागडोर संभाली यहीं से उन्होंने पांडवों को सहारा दिया। अधर्म पर विजय प्राप्त करके धर्म की जीत कराई। द्वारका श्रीकृष्ण की राजधानी थी। इस स्थान का धार्मिक महत्व आज भी है, लेकिन इसके गर्भ में कई रहस्य छिपे हुए हैं। मान्यता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ ही उनके द्वारा बसाई हुई नगरी भी समुद्र में जलमग्न हो गई थी। द्वारका में आज भी उसके अवशेष मौजूद हैं। द्वारका चारों धामों में से एक है। समुद्र की बड़ी-बड़ी लहरों को देखकर आभास होता है कि ये श्रीकृष्ण के पैर पखारने को आतुर हैं। द्वारका के भीतर श्रीकृष्ण के बहुत सारे मंदिर हैं। माना जाता है कि द्वारिकाधीश के दर्शन मात्र से ही सारे दुखों से मुक्ति मिल जाती है।द्वारका स्थित रड़छोड़ जी के मंदिर की ऊपरी मंजिल प्रभु की सेज है। झूलने के लिए झूला है।खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े दर्पण लगे हैं। पांच मंदिरों के अलग-अलग भंडारे हैं। प्रांगण में बहुत सारे मंदिर हैं। इन मंदिरों में मुख्य प्रद्यूम्न जी, टीकमजी, पुरुषोत्तम जी, देवती माता, माधवजी, अम्बा जी और गरुड़ के मंदिर हैं। इन मंदिरों के सिवाय यहां साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथ जी के भी मंदिर हैं। इन मंदिरों का आर्किटेक्चर देखते ही बनता है सजे -सजाये इन मंदिरों में सोने-चांदी का काम भी है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

एस्कॉन टेम्पल्स-

कृष्ण भक्तों के लिए दुनिया के सभी हिस्सों में एस्कॉन टेम्पल देखने योग्य हैं। एस्कॉन मंदिरों की विशेषता यह है कि यह हर जगह एक जैसा ही बना होता है। यहां की कृष्ण जन्माष्टमी देखने योग्य होती है। देश के सभी हिस्सों में जन्माष्टमी को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र की दही-हांडी बहुत प्रसिद्ध है। तमिलनाडु में दही हांडी को उरिंडी के नाम से मनाते हैं। मथुरा में श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में नंदबाबा सबको उपहार देते हैं,इसलिए इसे नंदोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। कान्हा के जन्म से लेकर उनके बड़े होने तक की झांकी मंदिरों में सजाई जाती हैं। माखन मिश्री के प्रसाद के साथ खासतौर पर धनिये को भुनकर बनाये जाने वाले चूर्ण के प्रसाद का स्वाद पूरे साल याद रहता है। भारत के अलावा बांग्लादेश, पाकिस्तान और दुनिया भर में कृष्ण के भक्त हैं, जो धूमधाम से मनाते हैं। 

 

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