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अखंड सौभाग्य चाहिए तो करें ‘वट सावित्री’ की पूजा

अर्चना चतुर्वेदी

24th May 2017

अखंड सौभाग्य चाहिए तो करें ‘वट सावित्री’ की पूजा

 

हिन्दू धर्म में वट सावित्री व्रत को भी करवा चौथ की तरह ही माना जाता है। अपने अचल सुहाग की कामना के लिए महिलाएँ बरगद के पेड़ की परिक्रमा कर सावित्री के पतिव्रत धर्म को स्मरण करती हैं। कहते हैं कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों में साक्षात् भगवान शिव का निवास होता है। सभी सुहागिनें इस दिन कच्चे सूत के धागे से सात बार परिक्रमा कर धागा लपेट कर अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।

क्या गांव, क्या शहर हर जगह इस पर्व को मनाया जाता है। वट वृक्ष के आस-पास सभी सुहागिनों का समूह इस दिन परंपरागत विश्वास से पूजा करता दिखाई देगा। ऐसी मान्यता है कि जेष्ठ अमावस्या के दिन वट वृक्ष की परिक्रमा करने पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश सुहागिनों को सदा सौभाग्यवती रहने का वरदान देते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या है ‘वट सावित्री’ व्रत

वट सावित्री व्रत को बरगदाही अमावस्या भी कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, वट वृक्ष देव वृक्ष है। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति व्रत धर्म से मृत पति को पुन: जीवित किया था। तभी से यह वृत ‘वट सावित्री व्रत’ के नाम से जाना जाता है। इसी मान्यता के आधार पर महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वट सावित्री व्रत पर वट वृक्षों की पूजा करती हैं। इस तरह से देखा जाए तो वट सावित्री व्रत पर्यावरण संरक्षण को संदेश भी देता है। वृक्ष रहेंगे तो पर्यावरण बचा रहेगा और तभी मानव जीवन की रक्षा भी होगी।

ऐसे होती है पूजा

इस दिन स्त्रियां व्रत रखकर वट वृक्ष के पास पहुंचकर धूपदीप नैवेद्य से पूजा करती हैं। रोली और अक्षत चढ़ाकर वट वृक्ष पर कलावा बांधती हैं। साथ ही हाथ जोड़कर वृक्ष की परिक्रमा लेती हैं। इससे पति के जीवन में आने वाली अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि के साथ लंबी उम्र प्राप्त होती है।

सास का लें आशीर्वाद

वट की परिक्रमा करते समय एक सौ आठ बार या यथाशक्ति कलावा लपेटा जाता है। इस दिन चने पर रुपए रखकर बायने के रूप में अपनी सास को देकर आशीर्वाद लिया जाता है। सौभाग्य पिटारी और पूजा सामग्री किसी योग्य साधक को दी जाती है।

यमराज का भी होता है पूजन

सौभाग्यवती महिलाएं श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक उपवास रखती हैं। अमावस्या को एक बांस की टोकरी में सप्तधान्य के ऊपर ब्रह्मा और ब्रह्म सावित्री तथा दूसरी टोकरी में सत्यवान एवं सावित्री की प्रतिमा स्थापित कर वट के नीचे पूजा करती हैं। साथ ही इस दिन यमराज का भी पूजन किया जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या है सौभाग्य पिटारी

सिंदूर, दर्पण, मौली, काजल, मेहंदी, चूड़ी, माथे की बिंदी, हिंगुल, साड़ी, स्वर्णाभूषण इत्यादि वस्तुएं एक बांस की टोकरी में रखकर दी जाती हैं। यही सौभाग्य पिटारी के नाम से जानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों का भी पूजन होता है। कुछ महिलाएं केवल अमावस्या को एक दिन का ही व्रत रखती हैं। इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण किया जाता हैं।

इसलिए की जाती है पूजा

वट अमावस्या के पूजन की प्रचलित कहानी के अनुसार सावित्री अश्वपति की कन्या थी, उसने सत्यवान को पति रूप में स्वीकार किया था। सत्यवान लकडियां काटने के लिए जंगल में जाया करता था। सावित्री अपने अंधे सास-ससुर की सेवा करके सत्यवान के पीछे जंगल में चली जाती थी।

एक दिन सत्यवान को लकडियां काटते समय चक्कर आ गया और वह पेड़ से उतरकर नीचे बैठ गया। उसी समय भैंसे पर सवार होकर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री ने उन्हें पहचाना और सावित्री ने कहा कि आप मेरे सत्यवान के प्राण न लें। यमराज ने मना किया, पर वह वापस नहीं लौटी। सावित्री के पतिव्रत धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने वर रूप में अंधे सास-ससुर की सेवा में आंखें दीं और सावित्री को सौ पुत्र होने का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़ दिया। वट पूजा से जुड़ी है धार्मिक मान्यता के अनुसार ही तभी से महिलाएं इस दिन को वट अमावस्या के रूप में पूजती हैं।

 

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