आखिर क्यों कहते हैं गंगा को गंगा मैया ?

गृहलक्ष्मी टीम

2nd June 2017

आखिर क्यों कहते हैं गंगा को गंगा मैया ?

 

गंगा हिंदू धर्म की ही नहीं, बल्कि भारत तथा समस्त संसार की पवित्र नदी है। गंगा का नाम ही इतना पवित्र है कि जिसे लेते ही तन-मन ही नहीं आत्मा भी पवित्र हो जाती है, इसी कारण इसे पतित पाविनी भी कहा गया है। अपने उद्गम से लेकर सागर में विघटित होने तक भारत के विशाल भू-भाग का संस्पर्श करती हुई यह नदी अपने आप में हमारी संस्कृति व सभ्यता के इतिहास की जीवित संवाहिका भी है। गंगा के बिना भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। गंगा इस देश तथा इसकी संस्कृति की आत्मा तथा इसका प्राण है। इसकी पवित्रता न केवल शास्त्रसम्मत है बल्कि हमारी आत्मा की गहराइयों में भी इस तरह समाई हुई है कि गंगा के बिना जीवन ही निरर्थक लगता है।

श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि नदियों में मैं गंगा हूं। इसलिए प्राचीन काल से गंगा को गंगा मैया के रूप में पूजा जाता रहा है। गमनार्थक 'गम्' धातु से उणादिक 'गन्' प्रत्यय जोड़ने पर गंगा शब्द की निष्पत्ति होती है। इसका अर्थ है निरंतर गतिशीलता, प्रवाह। 'ग पृथ्वी गच्छति इति गंगा' अर्थात् जो स्वर्ग से सीधे पृथ्वी पर आए, वह गंगा है। 'ग अपव्ययं गम्यतीति गंगा' अर्थात् जो स्वर्ग की ओर ले जाए, वह गंगा है। इस प्रकार गंगा खुद ही सहज, निरोग और जीवन प्रवाह का अनुक्रम बन गई है। शब्द कल्पद्रुम में गंगा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है- 'गमयाति प्राणयति ज्ञापयति वा भव्यव्पदं या शक्ति: सा गंगा' अर्थात् जो शक्ति भगवान के पादपदूमों तक पहुंचा देती है, परम तत्व का स्वरूप बोध कराती है, वह गंगा है। इस व्युत्पत्ति के आधार पर गंगा अपने अध्यात्म आदि दैविक और आदि भौतिक रूपों में उपस्थित होती है। मकरवाहिनी गंगा जग पालनहार श्री विष्णु के चरण कमलों से होकर ब्रह्मा जी के कमंडल से उद्धृत होकर परम योगी महादेव शंकर की जटाओं से झर-झर बहकर पृथ्वी लोक पर जन-जन के कल्याण हेतु प्रवाहित हुई है।

इतिहास के आइने में गंगा

गंगा के महत्त्व को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने अपनी वसीयत में कुछ इस प्रकार लिखा था- 'यही गंगा मेरे लिए निशानी है प्राचीनता की यादगार की, जो बहती आई है वर्तमान तक और बहती चली जा रही है भविष्य के स्वर्णिम महासागर की ओर। उसे मेरा शत-शत प्रणाम और अनेकानेक शुभकामनाएं। इतिहास गवाह है कि गंगा नदी के प्रति न केवल हिंदुओं की बल्कि गैर हिंदू लोगों की भी अपार आस्था रही है। विश्व विख्यात पर्यटक इब्नबतूता ने लिखा है कि सुल्तान मुहम्मद तुगलक के लिए गंगा जल दौलताबाद (पुरानी राजधानी) से बराबर लाया जाता था। उस समय गंगा जल को यहां पहुंचने में चालीस दिन का समय लगता था। अकबर का भी गंगा जल से बहुत अधिक जुड़ाव था। वह उसे अमृत मानते थे। वह घर या बाहर सभी स्थानों पर गंगा जल का प्रयोग करते थे। प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक बर्नियर ने औरंगजेब के विषय में लिखा है- वह खाने-पीने की सामग्री में हमेशा गंगा जल का प्रयोग करता था। यही नहीं, दरबार के अन्य लोग भी गंगा जल का पान करते थे। यात्रा के समय भी गंगा जल साथ रखा जाता था। मराठा पेशवा राजा व राजस्थान के राजपूत राजा भी हरिद्वार से गंगा जल मंगवाकर उसका उपयोग किया करते थे। उस समय एक कांवड़ का मूल्य बीस रुपए पड़ता था।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कई मायनों में लाभकारी है गंगा

गंगा कई कारणों से हमारे लिए लाभदायक है। प्रत्येक पदार्थ के तीन स्तर होते हैं- (1) स्थूल, (2) सूक्ष्म, (3) कारण। ब्रह्मा नजर से जो गुण या लाभ दिखाई पड़ते हैं, वे स्थूल हैं, जो वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा प्रमाणित होते हैं, वे सूक्ष्म हैं और जो तत्वदर्शी आत्मवेत्ता योगियों द्वारा योग की नजर से देखे जाते हैं, वे कारण गुण कहलाते हैं। गंगा जी के भी ये तीनों स्तर हैं। स्थूल रूप से गंगा आर्थिक लाभ वाली नदी है। अपने उद्गम स्थल हिमालय से लेकर सागर में विघटित होने तक अनेक आर्थिक पहलुओं से गंगा ने मनुष्य को बांध रखा है, जिनमें वन-संपदा, जड़ी-बूटी तथा वनौषधियों का विशेष स्थान है। इसके अतिरिक्त गंगा कृषि, मत्स्य पालन व पर्यटन की दृष्टि से भी लाभदायक है। गंगा नदी पर निर्मित अनेक बांध भारतीय जनजीवन तथा अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग है। इन्हें उत्तर भारत का मेरुदंड भी कहा जाता है। सूक्ष्म रूप से गंगा जी मनुष्य को शारीरिक व मानसिक आरोग्य प्रदान करने में सक्षम हैं। गंगा जल में प्राण वायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। अपने इन्हीं गुणों के कारण गंगा जल कभी खराब नहीं होता साथ ही कुष्ठ, अजीर्ण, पुराना ज्वर, तपेदिक, पेचिश, दमा, मस्तक शूल आदि बिमारियों में गंगा जल का प्रयोग अत्यंत लाभदायक है। सन् 1925 में दक्षिण भारत के राजा कृष्ण राव को असाध्य रोग हो गया था। दवाओं से भी लाभ न मिलने पर उन्होंने सभी दवाइयां छोड़कर गंगा जल लेना आरंभ कर दिया और वह उससे जल्द ही स्वस्थ हो गए।

शास्त्रानुसार गंगा का महत्त्व

शास्त्रों का कथन है कि गंगा के स्मरण, दर्शन, आचमन, स्नान-पूजन से विशेष पुण्यों की प्राप्ति होती है। गंगा जी मुक्तिदात्री मानी गई हैं, इसलिए जीवन के अंतिम समय में व्यक्ति के मुंह में दो बूंद गंगा जल व तुलसी दल दिए जाने की प्रथा रही है। भगीरथ ने गंगा जल के स्पर्श मात्र से अपने पूर्वजों का उद्धार करा दिया था। यूं तो गंगा जल में हमेशा ही दिव्य चैतन्य प्रवाहित होता रहता है लेकिन मुख्य तिथियों जैसे कि कुंभ, ग्रहण, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति और एकादशी पर तो इसकी दिव्यता में और भी वृद्धि हो जाती है। इसलिए इन तिथियों में गंगा जी का सान्निध्य विशेष लाभकारी माना गया है।

यह खेद का विषय है कि गंगा जी के असीम महत्त्व व माहात्म्य के बावजूद गंगा में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है और इसका जिम्मेदार कोई और नहीं अपितु स्वयं मनुष्य व उसकी स्वार्थी गतिविधियां ही हैं। ऐसे में यह हम सबका ही दायित्व है कि हम हमारी सभ्यता व संस्कृति की संवाहिका गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने का प्रयास करें और इनके दर्शन, पूजन और स्नान से स्वयं को लाभांवित करें।

 

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