…………….. ‘उफ!’ राजा विजयभान सिंह के दिल पर बिजली गिर पड़ी। उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया। शायद चक्कर आ गया था। आंखें छलक आईं। वह मानो स्वयं ही से बोले‒ ‘ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा कभी नहीं हो सकता। राधा कहीं नहीं जाएगी। मैं उसे ढूंढकर ही दम लूंगा…गांव-गांव, बस्ती-बस्ती, शहर-शहर, देश-विदेश, जहां कहीं भी वह होगी, मैं उसे अवश्य ढूंढ निकालूंगा। उसकी तलाश में अपने जीवन की सारी पूंजी गंवा दूंगा, परंतु उसे पाकर ही दम लूंगा।’ उसके होंठों से तड़पती एक आह निकली।
प्रताप सिंह से उनकी यह अवस्था देखी नहीं गई। आगे बढ़कर उसने उन्हें कमर से सहारा दिया… एक मित्र के समान, एक भाई के समान, फिर दूसरे हाथ से दोनों घोड़ों की लगाम थामकर वह वापसी की ओर लौट पड़ा। राजा विजयभान सिंह के दिल पर बरछियां चल रही थीं। प्रताप सिंह के सहारे वह लड़खड़ाते कदमों से चलने लगे। गांव के लोग और अधिक संख्या में एकत्र हो चुके थे। सभी की दृष्टि इन्हीं दोनों पर स्थिर थी…चकित!
सहसा राजा विजयभान सिंह रुककर अपने घोड़े की लगाम थामते हुए बोले‒ ‘प्रताप… इनसे से भगवान कृष्ण की मूर्ति ख़रीद लो।’
वह आगे बढ़ गए। प्रताप सिंह पीछे पलट गया।
……. जब अपने अरमानों की लाश उठाए वह अपने सिपाहियों समेत वापस पहुंचे तो राजमहल एक कब्रिस्तान के समान उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। वह अंदर प्रविष्ट हुए और जाकर राजमहल के तालाब के किनारे बैठ गए, पत्थर की कुर्सी पर। पानी की सतह पर पहले से ही फूलों की पंखुड़ियां तैर रही थीं। राधा के स्वागत में उन्होंने उसके अंदर इत्र भर दिया था, इसकी सुगंध से राजमहल, उसके आस- पास तथा दूर-दूर तक का वातावरण सुगंधित था। पानी के प्रतिबिम्ब में उन्होंने देखा एक हल्की- हल्की छाया उभर रही है। अपने मस्तिष्क का सहारा लेकर उन्होंने इस छाया को पानी की सतह पर जलपरी के समान उभरते देखा। राधा! अपनी लटों को किस सुंदरता से लपेटकर उसने पानी पर तैरते एक सफ़ेद फूल को चुनकर टांग लिया था। फूल की भीगी पंखुड़ियों पर शबनम के आंसू थे…सतह के अंदर उसका सफ़ेद शरीर पानी से मिल-जुलकर भूरा-भूरा प्रतीत हो रहा था।
राजा विजयभान सिंह और अधिक सहन नहीं कर सके। झट खड़े होकर उन्होंने छलांग लगा दी और तब ही उनकी चेतना जागी। प्रताप सिंह समीप ही खड़ा उनकी इस अवस्था को बहुत गौर से देख रहा था। कूदकर उसने झट अपने मालिक को संभाल लिया। ऐसा न हो कि राजा विजयभान सिंह अपने मस्तिष्क का संतुलन खोकर जान गंवा बैठें। राजा विजयभान सिंह जब बाहर निकले तो प्रताप सिंह के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़े। ऐसा लगता था राधा की जुदाई अब और अधिक उनसे सहन नहीं होगी। प्रताप सिंह उनकी सिसकियों में सम्मिलित होकर स्वाभाविक तौर पर रो पड़ा।
दिन बीते‒कई दिन बीत गए। राजा विजयभान सिंह ने अपने ऊपर काबू किया और राधा की खोज में दूर-दूर तक आदमी भेजे, परंतु उसका कहीं पता नहीं चला। उन्होंने यह सूचना अख़बार में भी देनी चाही, परंतु फिर कुछ सोचकर रुक गए। इसमें उनकी ही नहीं, राधा की भी बदनामी थी। और फिर उनसे घबराकर, तंग आकर वह और भी दूर भाग जाएगी। उनके दिल में यह बात बैठती चली गई कि राधा उनसे घृणा करती है‒ उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगी। क्षमा करेगी क्यों‒ वह तो कातिल हैं उसकी मासूम बहन के, उसके पिता के, स्वयं उसके अरमानों का ख़ून उन्होंने कर दिया है। राधा अब उनकी सूरत भी देखना नहीं चाहती है‒ और इसलिए वह चुपचाप कृष्णानगर छोड़कर चली गई। उनके दिल की दुनिया ही लुट गई‒ सदा के लिए वीरान हो गई। फिर भी उन्होंने आस नहीं छोड़ी। राधा की वह अंतिम भेंट थी, वह भेद भरी खामोशी, उनकी बातों के उत्तर में उसकी पलकों का भीग जाना, सारी बातें सुलगते दिल के एक कोने में अवश्य ठंडे पानी का छींटा मार देती थीं और तब उन्हें एक शांति मिलती, एक तसल्ली, एक आस मिलती। शायद राधा उन्हें क्षमा कर दे, शायद वह उन्हें अपने समक्ष पाकर ठुकराने का साहस नहीं करेगी। शायद उनकी तड़पती हुई अवस्था को देखकर उसे उन पर रहम आ जाए।
फिर भारत का सबसे सुंदर दिन भी आया, ऐसा सुंदर और महत्त्वपूर्ण दिन, जब भारत ने दुबारा जन्म लिया‒ 15 अगस्त सन् 1947। भारत का यह ऐतिहासिक दिन कभी न भुलाया जाएगा। राजा-महाराजाओं के दिन समाप्त हुए और एक नया संसार उत्पन्न हुआ। गरीब जनता को किसानों और मज़दूरों को जीवन मिला तो कुछेक राजा-महाराजाओं को मौत भी मिली। केवल कुछेक देशभक्त राजाओं को इस स्वतंत्रता की दिली प्रसन्नता थी। भारत के चप्पे-चप्पे पर ख़ुशियां मनाई जाने लगीं। देहातों में मिठाइयां बांटी गईं।
राजा विजयभान सिंह अपने राजमहल की पिछली बालकनी में खड़े नीचे नहाने के तालाब को देख रहे थे, जिसकी सतह पर समीप के वृक्षों की छाया कांप रही थी। आज का दिन उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण था‒ दूसरे देशभक्त नेताओं से कुछ अधिक ही। ऐसा इसलिए था, क्योंकि आज उनका ख़ुद का भी जन्म-दिवस था। मां-बाप के जीवन में सदा ही उन्होंने चढ़ावा दिया था‒ गरीबों को मिठाइयां, भोजन तथा कपड़े। यदि वह विदेश में रहते तो उनकी अनुपस्थिति में उनके माता-पिता यह काम कर दिया करते थे। लाड़- प्यार से पाले हुए एकमात्र बेटे के लिए लंबी आयु की कामना ममता की पुकार है। राजा विजयभान सिंह को ख़ुशी थी कि अब सभी मनुष्यों को बराबर समझा जाएगा। हरेक को उनके जीने का पूरा-पूरा अधिकार मिलेगा।
‘प्रताप…!’ समीप खड़े मंत्री से उन्होंने कहा‒‘गरीबों को खाना और कपड़ा बांटा जा चुका है?’
‘महाराज…’ प्रताप सिंह ने कहा‒ ‘हम जानते हैं आपका दिल उदास है लेकिन फिर भी इस बात का अनुमान किसी को नहीं होगा कि वह आपके जन्म-दिवस के इनाम से वंचित है। आपकी आज्ञा नहीं थी, होती तब भी हम ऐसा कर चुके होते। शाम को लोक-नृत्य का पूरा प्रबंध है। रात होते ही यह राजमहल दुल्हन के समान जगमगा उठेगा।’
आगे की कहानी कल पढ़ें, इसी जगह, इसी समय….
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