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कांटों का उपहार - पार्ट 50

रानू

13th September 2017

रानू का मशहूर और लोकप्रिय उपन्यास कांटों का उपहार अब ऑनलाइन पढ़ें, सिर्फ गृहलक्ष्मी डॉट कॉम पर....

कांटों का उपहार - पार्ट 50

सहसा कुछ सोचकर उसने मूर्ति उसी स्थान पर रख दी। गहने भी उसी स्थान पर चरणों में डाल दिए। फिर झट उसने प्रभु यीशु मसीह की मूर्ति उठा ली। यदि वह पहेली की तह में पहुंच सकती है तो इसी मूर्ति के द्वारा। यह मूर्ति बाबा ने बनाकर फादर जोजफ को भेंट की थी। वह बता सकते हैं कि उन्होंने यह मूर्ति किसे दी थी? कब दी थी? क्यों दी? किन अवस्थाओं में दी?

शमा को जलता छोड़कर वह सीढ़ियां चढ़ती बड़े कमरे में पहुंची तो सूर्य की किरण उड़ती गर्द में कम होकर लाली में परिवर्तित हो चुकी थी। तेज पगों से वह बाहर निकली तो सूर्य अपने विश्रामगृह का द्वार खटखटा रहा था। कार ड्राइवर ने उसे देखा, आश्चर्य से परंतु कुछ पूछने का साहस नहीं कर सका। उसने पिछला गेट खोला तो वह उसमें बैठती हुई बोली‒ ‘बेलापुर चलो...’

 ‘बेलापुर।’ ड्राइवर ने आश्चर्य से समय का अनुमान लगाने के साथ अंदर बैठते हुए पूछा।

 ‘हां‒ ज़रा जल्दी चलो‒’ राधा ने अधीरता से कहा और गर्दन घुमाकर हवेली को देखा। डूबते सूर्य की लालिमा में रंगी होने के पश्चात् भी दीवारों के होंठों पर अपनी जीत की एक मुस्कान थी। शायद इस हवेली के सारे पाप धुल चुके थे, पापों का प्रायश्चित हो चुका था और शायद अब यहां एक नया जीवन उत्पन्न होने को बेकरार हो रहा था, शायद इसीलिए रामगढ़ इलाके पर से यहां की कुचली हुई आत्माओं को उनका मार्ग मिल चुका है। और शायद इसीलिए रामगढ़ का निर्माण अब एक नए सिरे से होने वाला है, जिसका नाम है पटेल नगर‒सरदार वल्लभ भाई पटेल नगर। जिसे बनाने के लिए वह व्यक्ति आया था जिसकी मां ने सर्वनाश किया है।

 जब कार गर्द उड़ाती हुई रामगढ़ से बाहर जाने वाले रास्ते पर भागने लगी तो राधा ने देखा, मज़दूर अपना-अपना काम समाप्त करने के बाद अलाव जलाकर खाना बनाने में व्यस्त हैं। कुछेक अपने छोटे से संसार में भी ख़ुश होकर शोर मचा रहे हैं, लोकगीत गा रहे हैं। उनकी आवाज़ ढोल की ताल तथा घंटी की टन-टन के साथ उसके कानों में बहुत दूर तक आती रही और वह इस आवाज़ पर कान धरे बहुत ख़ामोशी के साथ अपने बीते हुए युग को चलती-फिरती तस्वीर के रूप में देखती रही, जो उसने रामगढ़ गांव में आज से लगभग बाईस वर्ष पहले बिताया था।

बेलापुर से दो मील से अधिक पहले जब मिशन अस्पताल के लिए राधा की कार गुज़री तो बरगद का एक विशाल वृक्ष देखकर उसे कुछ याद आ गया। यहां इसी पेड़ के समीप वह एक रात गधे की पीठ से लुढ़ककर नीचे कीचड़ में लथपथ हो गई थी। यद्यपि रात का अंधकार पूर्णतया छाया हुआ था, सूर्य को डूबे हुए भी देर हो चुकी थी, फिर भी वह इस विशाल वृक्ष को एक ही दृष्टि में पहचान गई, पहचान इसलिए गई क्योंकि इसके दो मोटे तने एक-दूसरे से लिपटकर ही जड़ से आरंभ हुए थे।

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