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कांटों का उपहार - पार्ट 51

रानू

14th September 2017

रानू का मशहूर और लोकप्रिय उपन्यास कांटों का उपहार अब ऑनलाइन पढ़ें, सिर्फ गृहलक्ष्मी डॉट कॉम पर....

कांटों का उपहार - पार्ट 51

.............‘चलो‒’ वह बोली और फिर उसे रास्ता बताती हुई सीधी फादर जोजफ के बंगले में पहुंच गई। बंगला पहले के समान ही अब तक सुंदरता से रखा गया था। क्यारियां, फुलवारियां, लॉन, सब कुछ तो उसी प्रकार था।

वह झट कार से बाहर आई, मूर्ति को हाथों में संभाले हुए। लॉन में पग रखा तो पहले ही से अगणित कारें खड़ी थीं। शायद फादर जोजफ की विदाई बहुत धूमधाम से की जा रही है। बरामदे में खड़ी होकर वह किसी नौकर की तलाश में इधर-उधर देखने लगी परंतु जब कोई नहीं मिला तो बाहर आती आवाज़ों का शोर सुनकर उसने दरवाजे पर से पर्दा हटाया और अंदर झांका। जगमगाते प्रकाश में उसने देखा डिनर समाप्त हो चुका है। कमरे के बीच एक बड़ी और लंबी-सी मेज़ थी जिस पर से नौकर प्लेटें उठाने में व्यस्त थे। कुछेक अपरिचित, फादर तथा अन्य आदरणीय हस्तियां एक बहुत ही बूढ़े संन्यासी जैसे महात्मा से बार-बार हाथ मिलाकर हर्ष प्रकट कर रहे थे। कुछेक हाथ मिलाकर बाहर निकलने की तैयारी में भी थे। राधा ने देखा‒एक ओर एक मेज़ पर अगणित उपहार रखे हैं जो निश्चय ही फादर जोजफ को उनके चाहने वालों ने भेंट किए होंगे। उसने एक बार अपने हाथ में ली हुई मूर्ति को देखा। फादर को भेंट देने के बहाने वह आसानी से अंदर जा सकती है और यह विचार आते ही वह झट अंदर पहुंच गई। किसी ने उस पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया तो उसका साहस बंधा। वह आगे बढ़ी और आगे...और ठीक उस बूढ़े संन्यासी समान व्यक्ति के सामने जाकर खड़ी हो गई, जिसके मुखड़े से वास्तव में भगवान की महिमा टपक रही थी। किस कदर बूढ़े तथा बदले-बदले से थे फादर जोजफ, फिर भी उसने उन्हें पहचान ही लिया। मनुष्य कितना ही बूढ़ा हो जाए परंतु अपने व्यक्तित्व का एक अंग अपने साथ ऐसा अवश्य रखता है जो उसकी पहचान कभी नहीं छोड़ता। फादर जोजफ के साथ ही फादर फ्रांसिस भी खड़े थे, जिन्हें वह एक ही दृष्टि में पहचान गई। वे भी कितना बदल चुके थे।

 फादर फ्रांसिस की निगाह उस पर अचानक ही पड़ी तो उसे गौर से देखते हुए वह आगे बढ़े। चश्मे के अंदर से उन्होंने राधा पर ऊपर से नीचे तक दृष्टि डाली।

 ‘आप...।’ उन्होंने कहना चाहा।

 ‘मैं राधा हूं‒कमल की मां।’ राधा ने झट उत्तर दिया।

 राधा। यह नाम फादर जोजफ के कानों में पड़ा तो वह ठिठक गए, अपने लोगों से बातें करते-करते वह अचानक ही रुक गए, चश्मे के अंदर से उन्होंने राधा को भी गौर से देखा और झट उसके सामने आ खड़े हुए।

 ‘आप राधा देवी हैं?’ ख़ुशी से उनका स्वर कांप रहा था।

 ‘जी हां फादर! मैं राधा ही हूं।’ राधा की आवाज़ भी जाने किस दबाव में आकर कांपने लगी, ‘वही राधा जिसे कीचड़ से उठाकर आपने नया जीवन प्रदान किया, जिसके बच्चे को आपने आकाश का तारा बना दिया।’

 ‘नहीं-नहीं राधा बेटी! ऐसी बात नहीं।’ फादर जोजफ बोले‒ ‘ऐसा लगता है राजा विजयभान सिंह ने अभी तक तुम्हें कुछ नहीं बताया। वह भी साथ आए हैं क्या?’ उन्होंने इधर-उधर देखा।

 ‘उनसे मिले तो एक युग बीत गया फादर!’ राधा ने एक निराश आह भरी, ‘इसलिए तो एक भेद जानकर अपने दिल का बोझ दूर करना चाहती हूं।’

 

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