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बच्चों को सिखायें मनी मैनेजमेंट 

मोनिका अग्रवाल

29th August 2017

अगर बच्चों को कम उम्र से ही फाइनेंस के बारे में थोड़ा-थोड़ा सिखाया जाए तो वे समझ सकेंगे कि पैसे आसानी से नहीं कमाये जाते, बल्कि उसके लिए मेहनत करनी होती है और उनका संचय भी जरूरी है।

बच्चों को सिखायें मनी मैनेजमेंट 

 

आजकल के बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत विभिन्न प्रकार के गैजेट्स की होती है और वे आए दिन इन सबकी मांग करते रहते हैं। अगर मांग पूरी करने के साथ-साथ उन्हें कम उम्र से ही फाइनेंस के बारे में थोड़ा-थोड़ा सिखाया जाए तो वे समझ सकेंगे कि पैसे आसानी से नहीं कमाये जाते, बल्कि उसके लिए मेहनत करनी होती है और इसलिए उनका संचय भी जरूरी है। लेकिन बच्चों में फाइनेंशियल मामलों को समझने की समझ कम होती है, इसलिए उन्हें व्यावहारिक उदाहरणों के जरिए समझाना चाहिए ताकि वह मूल बातों को समझ सकें और आपके इस फैसले का आदर कर सकें। अब सवाल उठता है कि बच्चों को किस उम्र में फाइनेंस के बारे में क्या सिखाया जाना चाहिए?

पांच से दस साल की उम्र हालांकि, इस उम्र में बच्चे बहुत नासमझ होते हैं उनको सब समझाना आसान नहीं होता। इसलिए उन्हें आप अपने उदाहरण द्वारा यानी आप अगर नौकरीपेशा हैं तो अपना और अगर नहीं तो अपने पति का उदाहरण देकर समझाएं कि, 'हम/पापा ऑफिस जाते हैं और वहां कड़ी मेहनत करते हैं। जिसके बदले कंपनी/आफिस हमें पैसे देते हैं और उन पैसों को सुरक्षित रखने के लिए हम बैंक का सहारा लेते हैं। जब कभी पैसों की जरूरत होती है, तो एटीएम/बैंक से निकाल लाते हैं। उन्हें इस बात का एहसास कराएं कि पैसे कमाना आसान नहीं। इसके लिए कड़ी मेहनत की जाती है। दस से पंद्रह साल की उम्र इस उम्र में बच्चे थोड़े-बहुत परिपक्व हो जाते हैं। उनमें रुपयों का जमा घटाना, साथ ही जरूरी चीजों की खरीदारी के लिए समझ-बूझ भी आ जाती है। यही नही चीजों के सही रखरखाव और इस्तेमाल को भी समझने लगते हैं। अपने बच्चों को चीजों का सही मूल्य आकलन सिखाने के लिए हो सके तो महीने पंद्रह दिन में एक बार जरूर अपने साथ बाजार लेकर जायें।

जेब खर्च
बच्चे का जेब खर्च बांधें। उसे जेब खर्च जोडऩे के लिए प्रेरित करें। अगर आपका बच्चा किसी नयी चीज की मांग करता है तो, उससे कहिए कि वह अपनी पाकेट मनी सेव कर उससे खरीदारी करे। उदाहरण के लिए जब बच्चों को स्वयं का नकद मिलेगा, उन्हें तय करना होगा कि यह कैसे खर्च करें। बचत के बारे में बात करने का भी यही सही समय है। मान लें कि आपके बच्चे के लिए प्रति सप्ताह रु 200 पॉकेट मनी तय है, लेकिन वह रु 300 की लागत वाला पैन खरीदना चाहता है, तो ऐसे में बाहर जाकर उस पैन को खरीदना संभव नहीं है। तब वह हर हफ्ते कुछ पैसे जमा कर सकता है, फिर बाद में पैन खरीद लेगा।
 
बचत की आदत
इस तरीके से बच्चे के अंदर सेविंग की फीलिंग जागृत होगी और वह बचत के बारे में सीखेंगे। साथ ही यह भी समझाएं कि केवल सोचने भर से चीजें नहीं खरीदी जा सकतीं। प्रत्येक वित्तीय निर्णय के लिए योजना बनानी होती है। आप उन्हें वास्तविक जीवन के उदाहरण या कुछ कहानियों के जरिए यह बातें समझा सकते हैं।
 
निवेश और बचत का फर्क
उन्हें निवेश और बचत का फर्क समझाएं। उन्होंने यह भी समझाएं कि आवश्यकता और शौक में फर्क होता है, इसके लिए उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी से कोई भी उदाहरण लेकर दिया जा सकता है जैसे कि रोज पेट भरना जीवन चलाने की आवश्यकता है लेकिन होटल में जाकर खाना शौक। किशोरावस्था में जब बच्चा किशोरावस्था में पैर रखने लगता है यानी कि टीनएजर हो जाता है तब उस पर कुछ जिम्मेदारी छोड़ें। उन्हें ईएमआई भुगतान, बचत और कर्ज का फर्क समझाएं। उदाहरण के लिए मेरे बेटे को अपने स्कूल प्रोजेक्ट के लिए प्रिन्टर की जरूरत थी। यही मौका था, इएमआई के बारे में समझाने का। उसको कहा गया, 'कंपनी से बात करो, मूल्य पूछो और मालूम करो कि कितनी इएमआई है? और यकीन मानिए आसानी से पूरा प्रोसिजर समझ गया।
 
क्रेडिट और डेबिट कार्ड 
बच्चे को क्रेडिट और डेबिट कार्ड के बारे में समझायें। उन्हें यह भी बताएं कि क्रेडिट कार्ड या कर्ज का भुगतान समय पर न करने से परेशानी का सामना करना पड़ता है। अपने किशोरों को बताएं कि क्रेडिट कार्ड की पेशकश के साथ जमा हो जाने से पहले क्रेडिट कार्ड और ब्याज दरें कैसे काम करती हैं। उन्हें यह भी बताना मत भूलिए कि आज क्रेडिट कार्ड के जरिए वह जो भुगतान कर रहे हैं उसका पुनर्भुगतान उन्हें करना ही होगा। संभावित खतरों को जानने से उन्हें क्रेडिट कार्ड, सिर पर ऋण से बचने में मदद मिल सकती है।
 
खुद भी ध्यान से करें मनी मैनेजमेंट
इन सबसे पहले महत्वपूर्ण बात यह है कि हम खुद कितना मनी मैनेजमेंट की तरफ ध्यान देते हैं बच्चों को समझाने से पहले हमें वित्तीय तौर पर खुद भी अनुशासित होना होगा। तभी समय-समय पर हम उन्हें अपना उदाहरण देकर समझा सकते हैं। वास्तव में अगर बच्चों को वित्तीय मामलों में शिक्षित करना चाहते हैं और समझाना चाहते हैं तो इससे बेहतरीन और कोई तरीका नहीं है। याद रहे आपके बच्चे आपको देखते रहते हैं और ऐसी हर बात खुद भी सीखते हैं, जो आप कर सकती हैं। 
 

 

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