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कौन कहता है नहीं मिलता है बेटी के हाथों मोक्ष

डॉ. विभा सिंह

12th September 2017

बिहार राज्य का छोटा सा शहर 'गया' पिंडदान और तर्पण के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि यहां उन मृतात्माओं को भी शांति और मोक्ष प्राप्त होता है, जिनके पुत्र नहीं हैं।

कौन कहता है नहीं मिलता है बेटी के हाथों मोक्ष
 
 
जब मैंने तय किया कि मैं बिहार जाऊंगी, तो बहुत से लोगों का एक ही प्रश्न था, 'तुम्हें और कोई जगह नहीं मिली?' राजधानी जैसी ट्रेन में भी किसी ने मुझे यह नहीं भूलने दिया कि मैं बिहार जा रही हूं और उससे बड़ी बात अकेली जा रही हूं। जाने से पहले मिलने वाली ढेर सारी नसीहतें और सफर के दौरान गुंडागर्दी के तमाम किस्से सुनते हुए जब मैंने छोटे से शहर 'गया' की जमीन पर कदम रखा, तो मन ही मन प्रार्थना दोहरा दी कि मैं सही-सलामत लौट आऊं।
 
बिहार राज्य का छोटा सा शहर 'गया' पिंडदान और तर्पण के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि यहां उन मृतात्माओं को भी शांति और मोक्ष प्राप्त होता है, जिनके पुत्र नहीं हैं। आम धारणा है कि पुत्र यदि यह कर्म करें, तो ही माता-पिता को मोक्ष प्राप्त होगा। इस मान्यता के चलते कई परिवारों में यह कर्म ताऊ या चाचा के बेटों से कराया जाता है। जब हम विष्णुपद (पिंडदान यहां किए जाते हैं) पहुंचे, तो कई पिंडदानी (स्थानीय लोग पिंडदान करने वालों को यही कहते हैं) मौजूद थे। कर्म करा रहे शास्त्री जी ने बताया कि श्राद्ध सिर्फ कर्म ही नहीं श्रद्धा का प्रतीक भी है, इसलिए स्त्री हो या पुरुष जिसके मन में बड़ों के लिए श्रद्धा हो यह कर्म कर सकता है।
 
गया में पितृपक्ष के दौरान ऐसा जनसैलाब उमड़ता है कि लगता है कहीं कुंभ का मेला ही लगा हुआ है। खुद के मोक्ष की कामना लिए मनुष्य प्रयाग और काशी की ओर रूख करता है, लेकिन बिछड़ गए स्वजनों को मोक्ष प्राप्त हो और उनकी आत्मा को शांति मिले इसके लिए वे गया आते हैं।
 
कोई भी पुत्री मृत स्वजनों का श्राद्ध कर सकती है
 
आखिर गया में ऐसा क्या है, कि लड़कियां भी यहां पिंडदान कर सकती हैं। यह प्रश्न शुरू से ही दिमाग में कुलबुला रहा था। इसका जवाब लेने हम देवघाट के रामानुज मठ पहुंचे, तो जगतगुरु राघवाचार्य ने बताया, 'कोई भी पुत्री यहां आकर अपने परिवार में मृत स्वजनों का श्राद्ध कर सकती है। यदि बेटी विवाहिता है, तो भी वह अपने मायके के सदस्यों का वैसे ही श्राद्ध कर सकती है, जैसा अधिकार पुत्र को प्राप्त है।' क्योंकि मां की कोख से सभी संतानों ने जन्म लिया है, इसलिए सभी को माता-पिता के कर्म करने का अधिकार है। बेटी और दामाद जोड़े में इस कर्म को कर सकते हैं। गया में विधवा स्त्रियां भी आती हैं, जो अपने मायके और ससुराल दोनों पक्षों के सदस्यों का पिंडदान करती हैं। राघवाचार्य इस बारे में तर्क देते हैं, 'पुराने जमाने में लड़कियों को सम्पत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त नहीं था। अब लड़कियों को अन्य बातों में उत्तराधिकार प्राप्त है, तब उन्हें स्वत: ही पिंडदान और श्राद्ध का भी उत्तराधिकार मिल गया हैं।'
 
माता-पिता के लिए सभी संतानें एक समान हैं
 
कई पंडितों का मत है कि श्राद्ध या तो घर का सबसे बड़ा सदस्य कर सकता है या फिर सबसे छोटा। यानी यदि 4 भाई या बहनें हैं, तो बीच के 2 भाइयों को इसका अधिकार नहीं है। राघवाचार्य इस बारे में कहते हैं, 'माता-पिता के लिए सभी संतानें एक समान हैं। बड़े भाई या बहन सिर्फ घर के बड़े होने के नाते यह कर्म कर सकते हैं। लेकिन यदि बड़ा भाई या बहन उस समय उपस्थित नहीं है, तो छोटा भाई या बहन इस कर्म को कर सकते हैं। जब माता-पिता के यहां कोई भेदभाव नहीं हुआ, तो फिर उनके कर्म में भी यह भेद नहीं होना चाहिए। जो लोग कहते हैं कि बड़ा ही यह कर्म कर सकता है, वह गलत कहते हैं।'
 

 

परिवार मिल कर श्राद्ध करें, तो श्रेष्ठ होता है
 
ज्यादातर घरों में किसी भी एक भाई के यहां यह संस्कार किया जाता है। जबकि यदि घर अलग हो, तो सभी को श्राद्ध भी अलग करना चाहिए। मृत्यु के बाद एक बार गया में पिंडदान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। यदि पूरा परिवार मिल कर यह कर्म करें, तो श्रेष्ठ होता है, अन्यथा जो सदस्य आ सके उसे जरूर आना चाहिए। वार्षिक श्राद्ध के बाद सभी को श्राद्ध करना चाहिए। यदि बड़ा भाई श्राद्ध कर्म कर रहा है, तो भी सभी को नियम का पालन करना चाहिए, तब ही सभी फल के भागी होंगें। ऐसा नहीं कि बड़ा भाई सभी कर्मकांड को पूरा करे और फल सभी को मिल जाए।
 
जीवित व्यक्ति भी कर सकता है अपना पिंडदान
 
गया की एक और विशेषता है। यहां जीवित व्यक्ति भी अपना पिंडदान कर सकते हैं। यह श्राद्ध भगवान जर्नादन के यहां किया जाता है। इसमें भगवान जर्नादन से प्रार्थना की जाती है कि 'एस पिंडो मया दत्तो तद हस्थे जनार्दना, अतकाले गते मैहयम तमतु दाता गएससि' यानी जब हमारा अंतकाल होगा तब तुम हमारे दाता होगे। फिर यह भगवान की जिम्मेदारी होती है कि वह उस व्यक्ति के पिंडदान-तर्पण के फल को मृत्यु के पश्चात उसे देते हैं। राघवाचार्य जी बताते हैं, 'यह एक तरह से भगवान के यहां भक्त का फिक्स डिपॉजिट है।'
 
 
 
 

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