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आखिर क्या है आईवीएफ

ऋचा कुलश्रेष्ठ

1st May 2015

जिन महिलाओं के बच्चे नहीं हैं, वे इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के जरिए मां बनने की उम्मीद को और ज्यादा बढ़ा सकती हैं। पारंपरिक आईवीएफ तकनीक निषेचन के लिए शुक्राणुओं और अंडे के फ्यूज़न पर काम करती है।

आखिर क्या है आईवीएफ

आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन। यह किसी भी समस्या के कारण लाइलाज निसंतान दंपति को बच्चे का तोहफा देने की ऐसी प्रक्रिया है जो दिन प्रतिदिन लोकप्रिय होती जा रही है। इस प्रक्रिया में अधिक अंडों के उत्पादन के लिए महिला को फर्टिलिटी दवाइयां दी जाती हैं और उसके बाद एक छोटी सी सर्जरी के माध्यम से अंडों को निकाला जाता है। इसके बाद इन्हें प्रयोगशाला में कल्चर डिश में तैयार पति के शुक्राणुओं के साथ मिलाकर निषेचन के लिए रख दिया जाता है। यह सब अल्ट्रासाइंड के तहत किया जाता है। प्रयोगशाला में इसे दो-तीन दिन के लिए रखा जाता है और इससे बने भ्रूण को वापस महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। आईवीएफ की पूरी प्रक्रिया में दो से तीन सप्ताह का समय लग जाता है। इसमें डॉक्टर की सलाह, जाँच, रिपोर्ट की दोबारा जाँच, स्टीमुलेशन, अंडों और शुक्राणुओं का संग्रह और अंत में निषेचन के बाद भ्रूण का गर्भ में प्रत्यारोपण शामिल है। इसकी सफलता- असफलता का पता अगले 14 दिनों में रक्त परीक्षण/प्रेग्नेंसी टेस्ट के बाद लगता है।

क्या हैं आईवीएफ की विभिन्न प्रक्रियाएं

 जिन महिलाओं के बच्चे नहीं हैं, वे इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के जरिए मां बनने की उम्मीद को और ज्यादा बढ़ा सकती हैं। पारंपरिक आईवीएफ तकनीक निषेचन के लिए शुक्राणुओं और अंडे के फ्यूज़न पर काम करती है।

 

 

 

 

 

आईसीएसआई

जिस मामले में पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम होती है, वहां आईवीएफ ज़्यादा मददग़ार नहीं होता। ऐसे में आईसीएसआई (इंट्रासिस्टोप्लाज़्मिक स्पर्म इन्जेक्शन) प्रक्रिया प्रभावी होती है जहां निषेचन में मदद करने के लिए, अंडों को इकट्ठा कर हर परिपक्व अंडे के केंद्र में एक शुक्राणु को इंजेक्ट किया जाता है। यह प्रक्रिया अंडों को संग्रह करने के पहले और बाद में पारंपरिक आईवीएफ की ही तरह काम करती है। फर्क है तो सिर्फ इतना कि भ्रूण विज्ञानी टिश्यु कल्चर डिश में शुक्राणु और अंडों को एक साथ रखने की बजाय, अंडों को निषेचित करने के लिए प्रयोगशाला में माइक्रो- मैनिपुलेशन तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। पुरुष बांझपन के उपचार में एक नई सफलता के रूप में, एक माइक्रोस्कोप मशीन के माध्यम से बांझपन के विशेषज्ञ विशेष परखनली शिशु प्रक्रिया आईसीएसआई द्वारा अच्छी गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं का चयन करते हैं।

आईएमएसआई

आईएमएसआई (इंट्रासिस्टोप्लाज़्मिक मॉर्फोलोजिकल सेलेक्टेड स्पर्म इंजेक्शन) की मदद से स्पर्म की छवि 6600 गुना बढ़कर देखी जा सकती है इसलिए इसके माध्यम से बुरी से बुरी स्थितियों में भी सफलता की दर में सुधार संभव है। कहा जाता है कि आईवीएफ और आईसीएसआई में विफल होने के बाद यह प्रक्रिया ज्यादा फायदेमंद रहती है।

आईयूआई

आईयूआई का अर्थ इंट्रायूटेरिन इनसेमिनेशन है। यह ऐसा गर्भाधान उपचार है, जिसके तहत अंडोत्सर्ग के समय गर्भ में, पहले से तैयार शुक्राणु को इंजेक्ट किया जाता है। इससे पहले अंडे के उत्पादन और अंडोत्सर्ग को उत्तेजित करने और गर्भ में भ्रूण प्राप्त करने के लिए प्रजनन दवाइयां लेने की आवश्यकता होती है।

आईसीएसआई

आईसीएसआई यानी इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन। इस प्रक्रिया में निषेचन में मदद करने के लिए, अंडों को इकट्ठा कर हर परिपक्व अंडे के केंद्र में एक शुक्राणु को इंजेक्ट किया जाता है। यह प्रक्रिया अंडों को संग्रह करने के पहले और बाद में पारंपरिक आईवीएफ की ही तरह काम करती है। फर्क है तो सिर्फ इतना कि भ्रूण विज्ञानी टिश्यु कल्चर डिश में शुक्राणु और अंडों को एक साथ रखने की बजाय, अंडों को निषेचित करने के लिए प्रयोगशाला में माइक्रो - मैनिपुलेशन तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।

ईएसए / टीईएसई

इस प्रक्रिया के तहत वृषण यानी टेस्टिकल्स में एक सूक्ष्म सूई को प्रविष्ट कराकर सक्शन के माध्यम से ऊतक युक्त शुक्राणु के नमूने प्राप्त किए जाते हैं। यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए उपयुक्त होती है जिनके वीर्य में शुक्राणु कम या नहीं के बराबर होते हैं। ऐसा आम तौर पर पहले हुई किसी सर्जरी, पुराने उपचार या आनुवंशिक समस्या के कारण होता है।

माइक्रो टीईएसई

माइक्रो - टीईएसई में अत्यंत सूक्ष्म सर्जरी के माध्यम से अंडकोष से स्पर्म यानी शुक्राणु प्राप्त किए जाते हैं। इसके तहत स्क्रोटम यानी पुरुष अंडक में बीच में छोटा सा चीरा लगाकर एक या दोनों टेस्टिकल्स को देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया का इस्तेमाल एजोस्पर्मिया से पीडि़त पुरुषों के लिए किया जाता है। 

एग डोनेशन

कन्या जब पैदा होती है तभी से उसके शरीर में अंडे होते हैं और महिला की उम्र बढ़ने के साथ- साथ उसके अंडों की उम्र भी बढ़ती है। समय के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता में कमी आती है। 30 वर्ष की उम्र तक महिला के अंडे अच्छी स्थिति में होते हैं लेकिन इसके बाद लंबे समय तक प्रसव न कर पाने वाली महिलाओं को गर्भ धारण करने में कठिनाई आ सकती है।

स्पर्म डोनेशन

जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या नगण्य होती है, वे शुक्राणु बैंक से शुक्राणु ले सकते हैं। शुक्राणु बैंकों को शुक्राणुदाता शुक्राणु देते हैं। शुक्राणु लेने से पहले शुक्राणु दाता के रक्त और मूत्र परीक्षण के साथ-साथ पूरी तरह से शारीरिक परीक्षण किया जाता है।

क्या है ब्लास्टोसिस्ट

आईवीएफ प्रक्रिया में यह पूर्वानुमान करना मुश्किल होता है कि तीसरे दिन कौन सा भ्रूण गर्भाधान की स्थिति में होगा, इसलिए इस उम्मीद में चार या इससे अधिक भ्रूण प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं कि कोई न कोई भ्रूण तो गर्भाधान की स्थिति पैदा करेगा जिसके परिणामस्वरूप बच्चे का जन्म हो सके। इसमें भ्रूण को पूर्ण सक्रिय इम्ब्रायोनिक जीनोमज् के साथ शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है। तीसरे दिन के अन्य भ्रूणों की तुलना में ये स्टोसिस्टज् अधिक स्वस्थ एवं मजबूत होते हैं और इनकी प्रत्यारोपण दर अधिक होती है। इसमें सर्वश्रेष्ठ भ्रूण का चयन किया जाता है क्योंकि अंतिम स्थिति तक केवल सबसे मजबूत भ्रूण ही जीवित रह पाते हैं। निसंतान दंपति आईवीएफ की परंपरागत तकनीक की बजाय आजकल ब्लास्टोसिस्ट हस्तांतरण को अपना रहे हैं ताकि स्वस्थ औलाद पा सकें। ब्लास्टोसिस्ट से बेहतर गर्भाधान दर भी हासिल होती है।