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अपने ही छल रहें है बालमन

निहारिका जायसवाल

1st May 2015

बाल यौन उत्पीड़न ऐसा अपराध है, जो बच्चे के तन के साथ उसके मन को भी छलनी कर देता है। इसके निशान उसके कोमल मन पर हमेशा के लिए छाप छोड जाते हैं। इसके छाप को हटाने के लिए आवश्यकता होती है आपके प्यार और साथ की ।

 अपने ही छल रहें है बालमन

हमारे देश में स्कूल को मदिंर और अध्यापक को भगवान का दर्जा दिया जाता है। अभिभावक स्कूल के भरोसे अपने बच्चे को इस विश्वास के साथ सौपते हैं कि वहां उसका भविष्य उज्जवल बनेगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से सामने आ रहे बाल यौन उत्पीड़न जैसे मामलों ने अभिभावकों के इस विश्वास को डगमगा दिया है। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि इनमें से अधिकतर हादसे बच्चों के साथ स्कूलों में घटित हो रहे हैं।

स्कूलों में यौन उत्पीड़न


कुछ महीने पहले मंबई के एक उपनगरीय इलाके भांडुप में जूनियर केजी में पढ़ रही 4 साल की बच्ची के साथ उसी के स्कूल के सुपरवाइजर ने शोचालय में दुष्कर्म किया। इस हादसे का उस बच्ची पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि अब वह स्कूल जाने से डरती है। तो वहीं दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र डाबरी में भी कुछ महीने पहले एक स्कूल टीचर ने 10 वर्षीय छात्रा के साथ यही अपराध किया। बाल यौन उत्पीड़न जैसे शर्मनाक अपराध का प्रकोप केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है। चीन के हुनान प्रांत के बाजिशाओ टाउनशिप स्कूल के 60 वर्षीय एक चीनी शिक्षक  ने 19 वर्षीय छात्रा का रेप किया। तो वहीं बेंगलूर के एक निजी  स्कूल में पढ़ा रहे 70 साल के शि़क्षक द्वारा 8 साल की छात्रा के साथ हुए यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया।

शारीरिक संकेतों को समझें
कई बार यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे डर व धमकी से डर कर अभिभावकों को कुछ भी बता नहीं पाते हैं। ऐसे में अभिभावकों के लिए जरूरी है कि वे बच्चों के शारीरिक संकेतों की तरफ ध्यान दें। यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे के शरीर पर किसी भी प्रकार की चोट या खरोच का निशान, जनांग में दर्द या खुजली होना, इंफैक्शन, बच्चे की चाल में बदलाव या दिक्क्त, स्कूल जाने से मना करना व डरना, डरा व सहमा रहना और उदास रहना आदि लक्षण उनमें दिखाई देने लगते हैं। बच्चे में ऐसे लक्षणों के दिखने पर अभिभावकों को कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। तुरंत बच्चे को किसी डॉक्टर को दिखाना चाहिए। इस बारे में आईएमए के अध्यक्ष पदश्री डा. केके अग्रवाल का कहना है कि बच्चे के साथ हुए यौन उत्पीड़न के हर मामले में मेडिकल इमर्जेंसी समझ कर निपटने की जरूरत है। सरकारी व निजी अस्पतालों द्वारा पीडि़त का मुफ्त इलाज करना कानून अनिवार्य है। यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे को देख रहे डॉक्टर का यह कत्र्तव्य भी है कि वह बच्चे को मेडिकल केयर उपलब्ध कराने के साथ फोरेंसिक सबूत इक्टठा करें और पुलिस को अपराध की सूचना दें। जरूरत पड़ने पर कोर्ट पर गवाही भी दें। भारतीय दंड संहिता की धारा 166 बी की तहत किसी डॉक्टर को यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे की मेडिकल जांच से मना करने पर एक साल की कैद या जुर्माना या दोनों ही हो सकता है। 

सतर्कता है जरूरी
बच्चों के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न की घटनाएं जिस तरह सामने आ रही है, उसे देखते हुए अभिभावकों को जरूरत है सतर्कता बरतने की। आर्यन ग्रुप आॉफ हॉस्पिटल की डायरेक्टर डा सुनीता दुबे का कहना है कि यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे की मानसिक स्थिति बहुत गंभीर होती है। ऐसे में उस पर कभी कोई दबाव और डाटना नहीं चाहिए। इसके अलावा अपने बच्चे को इस घीनौने अपराध के शिकार से बचाने के लिए उसके साथ दोस्त जैसा व्यवहार करें। उससे समय-समय पर स्कूल में क्या हो रहा और उसके प्रति शिक्षक का कैसा व्यवहार है, ये जानने की कोशिश करें। उससे समय-समय पर स्कूल में क्या हो रहा है और उसके प्रति शिक्षक का कैसा व्यवहार है, ये जानने की कोशिश करें।

दम पीछे न हटाएं
हर वर्ष बाल यौन उत्पीड़न के कई घटनाएं घटित होती हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही के केस दर्ज कराए जाते हैं। लड़की के साथ हुए शारीरिक उत्पीड़न जैसे मामलों में कई बार अभिभावक समाज और इज्जत के डर के चलते रिपोर्ट दर्ज नहीं कराते हैं। यह सामाजिक डर ही उन अपराधियों के हौसलों को बुलंद बना देता है। यौन उत्पीड़न या किसी भी प्रकार के उत्पीड़न को हमारे देश से खत्म करने के लिए कि हम अपराध के सामने अपना सिर न झुकाएं। किसी प्रकार की घटना होने पर रिपोर्ट दर्ज कराएं। बाल यौन उत्पीड़न को लेकर यनिसेफ की रिपोर्ट की अनुसार भारत में 15 से 19 साल की लड़कियों में से 4.5 फीसदी से ज्यादा यौन उत्पीड़न की शिकार हैं। वर्ष 2012 में भारत में प्रोटेक्शन आॉफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल आॉफेंसेज एक्ट लागू किया गया। जिसमें से 18 साल से कम उम्र के शख्स को बच्चा माना गया है। बच्चे के प्रति यौन हिंसा के किसी भी तरह के मामले पर यह कानून लागू होता है। इसमें पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट सेक्शन 3, नॉन-पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट सेक्शन 7, सेक्सुअल हैरेसमेंट  सेक्शन 11 और बच्चे का पोर्नोग्राफी  सेक्शन 13 के अंर्तगत अपराध माना गया है।