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क्या कहती हैं बुद्ध की मुद्राएं ?

शशिकांत सदैव

1st May 2015

क्या कहती हैं बुद्ध की मुद्राएं?आपकी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए यहां हम आपको बता रहे हैं बुद्ध की दस मुद्राओं का अर्थ।

 

 

आप सभी ने बुद्ध की प्रतिमाओं को कई मुद्राओं या भाव-भंगिमा के साथ देखा होगा। इन अलग-अलग मुद्राओं में बुद्ध की मूर्तियों को देखकर आपके मन में इन मुद्राओं का अर्थ जानने की इच्छा तो उत्पन्न होती ही होगी। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अभय मुद्रा-

'अभय मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति सबसे प्रसिद्ध है। यह मुद्रा डर का सामना करने की ऊर्जा देती है। हाथों की भाव-भंगिमा से बनी इस मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति, चित्र, कैंडल होल्डर व इत्यादि सजावटी सामान के रूप में आमतौर पर आप सभी के घरों में मिल जाती है। 'अभय शब्द संस्कृत का अनुवादित रूप है, इसका अर्थ होता है अभय यानी 'किसी भी प्रकार के भय से रहित होना। अंगूठे और तर्जनी उंगली मिलाकर अभय मुद्रा की जाती है।  इस मुद्रा में सर्वप्रथम किसी भी सुखासन में बैठकर अपने दोनों हाथों की हथेलियों को सामने की ओर करते हुए कंधे के पास रखते हैं। ज्ञान मुद्रा करते हुए आंखों को बंद कर गहरी श्वांस लें और छोड़ें और शांति तथा निर्भीकता को महसूस करें, यही है 'अभय मुद्रा। अगर आप बुद्ध की अभय मुद्रा वाली प्रतिमा या चित्र देखते हैं तो आपको भी सुरक्षा प्रदान करने वाली ऊर्जा, शांति और गहरी आध्यात्मिक सुरक्षा की अनुभूति होगी। मनुष्य को ऊर्जा प्रदान करने वाली इस मुद्रा का फेंगशुई में भी काफी महत्त्व है। इसे आप अपने घरों में फेंगशुई या सजावट की वस्तु के तौर पर लगा सकते हैं। इसे आपके घर के मुख्य द्वार के पास या फिर आपके रहने के कमरे में लगाना ही उचित रहता है।

 

 

 

ध्यान मुद्रा- 

ध्यान या 'समाधि मुद्रा हाथों द्वारा बनाई गई ऐसी भाव-भंगिमा है जो ध्यान करने की ऊर्जा, गहन चिंतन शक्ति तथा ऊर्जा के उच्च स्तर तक पहुंचाती है। बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ को रखकर जो ध्यान की मुद्रा बनती है उसे 'ध्यान मुद्रा कहते हैं। जिसको भी ध्यान में अधिक समय तक बैठना है उसके लिए यह ध्यान मुद्रा उचित है। भगवान बुद्ध व महावीर की कई मूर्ति आपने इस मुद्रा में देखी होगी। इस मुद्रा में व्यक्ति गहन आध्यात्मिक शांति व शांतचित्त होने की ऊर्जा प्राप्त करता है। बुद्ध की इस मुद्रा में उपलब्ध मूर्ति को ध्यान कक्ष, आपके पूजाघर या फिर घर के केंद्र या अध्ययन कक्ष में लगाया जाना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नमस्कार मुद्रा-

'नमस्कार या 'अंजली मुद्रा दोनों हाथों को जोड़कर बनाई ऐसी भाव-भंगिमा है, जिसमें सामने वाले व्यक्ति को सम्मान देते हुए उसका स्वागत किया जाता है। यह मुद्रा लोगों को विनम्रता का संदेश देती है। इस मुद्रा में आप देख सकते हैं कि प्रार्थना के स्वर सीधे हृदय से या तीसरी आंख से निकलते हैं।
सर्व प्रथम आंखें बंद करते हुए दोनों होथों को जोड़कर अर्थात् दोनों हथेलियों को मिलाते हुए छाती के मध्य में सटाएं तथा दोनों हथेलियों को एक-दूसरे से दबाते हुए कोहनियाँ को दाएं-बाएं सीधी तान दें। जब ये दोनों हाथ जुड़े हुए हम धीरे-धीरे मस्तिष्क या हृदय तक पहुचते हैं तो नमस्कार मुद्रा बनती है। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि सिर्फ हृदय या फिर हमारे आध्यात्मिक अंतर जिसे तीसरी आंख भी कहा जाता है इससे ही सत्य विचारों व भावों की अभिव्यक्ति संभव है। दूसरा कारण यह भी है कि हमारे हाथ के तंतु मस्तिष्क के तंतुओं से जुड़े हैं। हथेलियों को दबाने से या जोड़े रखने से हृदय चक्र और आज्ञा चक्र में सक्रियता आती है जिससे जागरण बढ़ता है। उक्त जागरण से मन शांत एवं चित्त में प्रसन्नता उत्पन्न होती है। हृदय में पुष्टता आती है तथा निर्भीकता बढ़ती है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि बुद्ध के सच्चे शिष्य इस मुद्रा में अधिक समय तक नहीं रहते, जिसका प्रमुख कारण ये हो सकता है कि यदि एक बार आपका उस परम शक्ति से साक्षात्कार हो गया तो आपको अधिक समय तक उसकी आराधना नहीं करनी पड़ती। उच्च शक्ति के दर्शन के बाद व्यक्ति इन सबसे ऊपर उठ जाता है। इसे मुख्य द्वार पर, अपने कमरे में या फिर कार्यस्थल पर लगाना शुभ होता है।

 

 

 

भूमि स्पर्श मुद्रा-

इस मुद्रा में पृथ्वी का स्पर्श या आह्वान किया जाता है। इस मुद्रा में हमेशा सीधा हाथ भूमि को स्पर्श करता दिखता है जबकि बायां हाथ गोद में रखा जाता है। बुद्ध की इस मुद्रा के बारे में कहा जाता है कि जब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी तो वे इस मुद्रा में आसीन थे। ये मुद्रा असीम शक्ति और सत्य व ज्ञान प्राप्ति के प्रति बुद्ध के समर्पण का प्रतिनिधित्व करती है। इस ऊर्जा के सहारे ही बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हो पाई थी तथा ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में आ रही बाधाओं से संघर्ष करने व अज्ञान के अंधकार से लडऩे में सहायता मिली थी। बुद्ध की इस मुद्रा की प्रतिमा को आप घर के केंद्र, मुख्य द्वार या फिर पूजाघर या किसी पवित्र स्थल पर लगा सकते हैं।

 

 

 

 

वरद मुद्रा- 

दूसरों को यह जताने वाली शारीरिक मुद्रा कि हम तुम्हें मनचाहा वर देने या तुम्हारी सब कामनाएं पूरी करने को प्रस्तुत हैं, 'वरद मुद्रा कहलाती है। इसमें देने का भाव सूचित करने के लिए हथेली ऊपर या सामने रखकर थोड़ा नीचे झुकाई जाती है। यह लगभग हमेशा एक ऐसे सम्मानित व्यक्तित्व द्वारा बायां हाथ दिखाकर किया जाता है, जो लोभ, क्रोध और कपट से मानव मुक्ति के लिए समर्पित है। यह मुद्रा बायें हाथ से बनाई जाती है। अधिकतर देखा गया है कि यह मुद्रा अन्य मुद्राओं जैसे भूमि स्पर्श मुद्रा व अभय मुद्रा के बीच संयोजन का कार्य भी करती है। यह मुद्रा ऊर्जा की प्राप्ति के लिए पूर्णत: समर्पित होने का गुण भी सिखाती है। प्रत्येक व्यक्ति को इस मुद्रा के प्रयोग द्वारा प्रबुद्ध बनने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। इस मुद्रा के द्वारा व्यक्ति अपने हाथों के जरिये की गहनतम ऊर्जा की प्राप्ति द्वार ज्ञान के प्रकाश में आलोकित हो सकता है। इस मुद्रा में बनी बुद्ध की प्रतिमा को घर व ऑफिस की उत्तर-पश्चिम दिशा में लगाना चाहिए।

 

कर्ण मुद्रा-

'कर्ण मुद्रा एक बहुत ही शक्तिशाली ऊर्जा की अभिव्यक्ति करती है। इस मुद्रा के प्रयोग से नकारात्मक शक्तियां व बीमारियां समाप्त हो जाती हैं। इस हस्त मुद्रा को सभी बुराइयों का शत्रु भी कहा जा सकता है। यह तर्जनी और कनिष्ठ उंगली को उठाने और अन्य उंगलियों को मोड़कर बनती है। इस मुद्रा द्वारा आप केवल अपने हाथों को देखते हुए एक निर्धारित व ध्यान केंद्रित ऊर्जा की अनुभूति कर सकते हैं। अगर आपके पास बुद्ध की इस मुद्रा में कोई प्रतिमा है तो आप उसकी स्थापना की जगह सोच-समझकर कर ही निर्धारित करें। आपको इसे मुख्य द्वार के सामने या शयन कक्ष या बच्चों के कमरों में नहीं लगाना चाहिए। घर के किसी समस्यात्मक क्षेत्र या खिड़की या फिर ऐसी जगह जहां सफाई की ज्यादा आवश्यकता हो, वहां इसे रखना चाहिए।

वज्रप्रदमा मुद्रा- 

यह शब्द अविचल आत्मविश्वास का अनुवादित रूप है। यह मुद्रा व्यापक स्तर पर आत्मविश्वास का आह्वान करती है। यहां आत्मविश्वास एक विशेष अर्थ रखता है न कि केवल वह अर्थ जो हम सभी सामान्य अर्थों में समझते हैं। जब हम बुद्ध की इस प्रतिमा को देखते हैं तो पहला सुंदर वाक्य जो मन में आता है वह यह है कि 'मैं शांति के साथ आता हूं क्योंकि मैं शांति हूं। इस मुद्रा को देखकर एक बहुत ही सुंदर सुनहरी शक्ति उत्पन्न होती प्रतीत होती है। जो कि अत्यंत नर्म, दयालु, कांतिमयी, बहुत ही आरोग्यवर्धक, स्थायी है। इस मुद्रा को हम स्वयं में विश्वास जगाने वाली मुद्रा कह सकते हैं। हमारा हमारे उस सच्चे आत्म (स्वयं) से परिचय कराने वाली मुद्रा जो कि हमारे अंदर ही एक सुंदर ऊर्जा साथ उपस्थित है। जब हममें यह विश्वास आ जाता है तो हमारा हृदय ही उस ऊर्जा का मजबूत संचारक बन जाता है। अपने हृदय को शक्ति व विश्वास प्रदान करना- यह वही सत्य है जिसका आह्वान बुद्ध की यह मुद्रा करती है। बुद्ध की इस मुद्रा की प्रतिमा को घर के केंद्र, रहने के कमरे या फिर मुख्य द्वार पर लगाना चाहिए।

 

 

 वितर्क मुद्रा-

यह बुद्ध की शिक्षा पर बहस और संचारण की मुद्रा है। इस मुद्रा को अंगूठे और तर्जनी के पोरों को एक साथ जोड़ कर और शेष उंगलियों को सीधा रख कर, बहुत कुछ अभय और वरद मुद्राओं की तरह, लेकिन अंगूठा तर्जनी का स्पर्श करते हुए बनाई जाती है। यह मुद्रा शिक्षण की ऐसी तकनीक की अनुभूति कराती है, जिसमें बिना किसी शब्द के शिक्षा व ज्ञान का संचार होता है। इस मुद्रा वाली प्रतिमा को घर के कार्यालय, पुस्तकालय या अध्ययन कक्ष में लगाना चाहिए।

 

 

 

धर्मचक्र मुद्रा- 

मुद्रा की यह अवस्था धर्म के घूमते चक्र का प्रतिनिधित्व करती है। 'धर्मचक्र मुद्रा तब बनती है जब छाती के सामने हृदय के पास दोनों हाथ वितर्क में जुड़े होते हैं, दायीं हथेली आगे और बायीं हथेली ऊपर की ओर होती है। अंगूठा व उंगलियां मिलकर चक्र जैसी आकृति बनाते हैं। धर्मचक्र मुद्रा बुद्ध के जीवन के उस एक मुख्य पल का प्रतिनिधित्व करता है जब वे अपने ज्ञानोदय के बाद सारनाथ के हिरण पार्क में बुद्ध जब अपना पहला उपदेश दे रहे थे। बुद्ध की इस प्रतिमा को घर के कार्यालय या रहने के कमरे में रखना चाहिए।

 

 

उत्तरबोधि मुद्रा- 

 इस मुद्रा को सर्वोच्च ज्ञान की मुद्रा कहा जाता है। यह मुद्रा दोनों हाथों को हृदय पर रखकर बनाई जाती है। दोनों तर्जनी उंगली ऊपर उठी हुई आपस में एक-दूसरे को छूती हैं और बाकी की आठ उंगलियां आपस में गुंथी होती हैं। कुछ देर के लिए उत्तरबोधि मुद्रा की अवस्था में रहने पर आपको आपके शरीर में एक तीव्र शक्ति के संचरण की अनुभूति होगी। बुद्ध की इस प्रतिमा को घर या ऑफिस की उत्तर या दक्षिण दिशा या फिर अपने रहने के कमरे में भी रख सकते हैं।