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बच्चे का सपना अब है अपना

ऋचा कुलश्रेष्ठ

16th June 2015

अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धति में आ रही नित नई तकनीक ने नि:संतान दम्पतियों के सपनों को साकार करने में बड़ी मदद की है। आज भारत में भी बांझपन के इलाज के लिए विभिन्न तकनीक उपलब्ध हैं।

एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देना हर दंपति का सपना होता है। बच्चों के बगैर जीवन अधूरा-अधूरा लगता है। इस सपने को पूरा होने से रोकता है बांझपन। नियमित रूप से 12 महीने तक गर्भनिरोधक के इस्तेमाल के बिना यौन संबंध स्थापित करने के बाद भी गर्भ धारण न हो पाना बांझपन कहलाता है। बांझपन

में किसी महिला का गर्भाधान के लिए जैविक रूप से असमर्थ होना, या पूरे समय तक गर्भावस्था को कायम न रख पाना भी शामिल है। भारत में पिछले पांच वर्षों में पुरुषों और महिलाओं दोनों में बांझपन के मामलों में 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बच्चा पैदा नहीं होने के मामलों में 59 प्रतिशत मामलों के लिए पुरुष कारक जिम्मेदार होते हैं। हर 100 नि:संतान दम्पतियों में, 50 प्रतिशत महिलाएं और 40 प्रतिशत पुरुष बांझपन से ग्रस्त होते हैं।

अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धति में आ रही नित नई तकनीक ने नि:संतान दम्पतियों के सपनों को साकार करने में बहुत बड़ी मदद की है। आज भारत में भी बांझपन के इलाज के लिए विभिन्न असिस्टेड प्रजनन तकनीक उपलब्ध हैं जो इच्छुक दम्पतियों के सपनों को पूरा करती हैं। इनमें आईवीएफ, आईयूआई, आईसीएसआई, टीईएस, और सरोगेसी प्रमुख हैं। ऐसी प्रमुख तकनीकों के बारे में जानते हैं गुडग़ांव स्थित बॉर्न हॉल क्लीनिक की वरिष्ठ आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. श्वेता गुप्ता और फोर्टिस अस्पताल के आईवीएफ कंसल्टेंट डॉ. रामनाइक सभरवाल से-

आईवीएफ

आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिप्लाइजेशन। इसमें अधिक अंडों के उत्पादन के लिए महिला को फर्टिलिटी दवाइयां दी जाती हैं और उसके बाद एक छोटी सी सर्जरी के माध्यम से अंडे को निकाल कर निषेचन के लिए प्रयोगशाला में कल्चर डिश में तैयार शुक्राणु के साथ रख दिया जाता है। प्रयोगशाला में इस तरह हुए निषेचन के बाद बने भ्रूण को वापस महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।

आईवीएफ की पूरी प्रक्रिया में दो से तीन सप्ताह का समय लग जाता है। इसमें डॉक्टर की सलाह, जांच, रिपोर्ट की दोबारा जांच, स्टीमुलेशन, अंडों और शुक्राणुओं का संग्रह और अंत में निषेचन के बाद भ्रूण का गर्भ में प्रत्यारोपण शामिल है। इसकी सफलता-असफलता का पता अगले 14 दिनों में प्रेग्नेंसी टेस्ट के बाद लगता है।

ब्लास्टोसिस्ट हस्तांतरण
आईवीएफ प्रक्रिया में यह पूर्वानुमान करना मुश्किल होता है कि तीसरे दिन कौन सा भ्रूण गर्भाधान की स्थिति में होगा, इसलिए इस उम्मीद में चार या इससे अधिक भ्रूण प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं कि कोई न कोई भ्रूण तो गर्भाधान की स्थिति पैदा करेगा जिसके परिणामस्वरूप बच्चे का जन्म हो सके। इसमें भ्रूण को पूर्ण सक्रिय इम्ब्रायोनिक जीनोम के साथ शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है। तीसरे दिन के अन्य भ्रूणों की तुलना में ये ब्लास्टोसिस्ट अधिक स्वस्थ एवं मजबूत होते हैं और इनकी प्रत्यारोपण दर अधिक होती है। इसमें सर्वश्रेष्ठ भ्रूण का चयन होता है क्योंकि अंतिम स्थिति तक केवल सबसे मजबूत भ्रूण ही जीवित रह पाते हैं। अब अनेक नि:संतान दंपति आईवीएफ की परंपरागत तकनीक की बजाय ब्लास्टोसिस्ट हस्तांतरण को अपना रहे हैं ताकि स्वस्थ औलाद पा सकें। ब्लास्टोसिस्ट से बेहतर गर्भाधान दर भी हासिल होती है।

आईयूआई
आईयूआई का अर्थ इंट्रायूटेरिन इनसेमिनेशन है। यह ऐसा गर्भाधान उपचार है, जिसके तहत अंडोत्सर्ग के समय गर्भ में पहले से तैयार शुक्राणु को इंजेक्ट किया जाता है। इससे पहले अंडे के उत्पादन और अंडोत्सर्ग को उत्तेजित करने और गर्भ में भ्रूण प्राप्त करने के लिए प्रजनन दवाइयां लेने की आवश्यकता होती है।

आईसीएसआई
आईसीएसआई यानी इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन। इस प्रक्रिया में निषेचन में मदद करने के लिए अंडों को इकट्ठा कर हर परिपक्व अंडे के केंद्र में एक शुक्राणु को इंजेक्ट किया जाता है। यह प्रक्रिया अंडों को संग्रह करने के पहले और बाद में पारंपरिक आईवीएफ की ही तरह काम करती है। फर्क है तो सिर्फ इतना कि भ्रूण विज्ञानी टिश्यु कल्चर डिश में शुक्राणु और अंडों को एक साथ रखने की बजाय, अंडों को निषेचित करने के लिए प्रयोगशाला में माइक्रो-मैनिपुलेशन तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।

टीईएसए/टीईएसई
इस प्रक्रिया के तहत वृषण यानी टेस्टिकल्स में एक सूक्ष्म सूई को प्रविष्ट कराकर सक्शन के माध्यम से ऊतक युक्त शुक्राणु के नमूने प्राप्त किए जाते हैं। यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए उपयुक्त होती है जिनके वीर्य में शुक्राणु कम या नहीं के बराबर होते हैं। ऐसा आम तौर पर पहले हुई किसी सर्जरी, पुराने उपचार या आनुवंशिक समस्या के कारण होता है।

माइक्रो टीईएसई
माइक्रो-टीईएसई में अत्यंत सूक्ष्म सर्जरी के माध्यम से अंडकोष से स्पर्म यानी शुक्राणु प्राप्त किए जाते हैं। इसके तहत स्क्रोटम यानी पुरुष अंडक में बीच में छोटा सा चीरा लगाकर एक या दोनों टेस्टिकल्स को देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया का इस्तेमाल एंजोस्पर्मिया से पीडि़त पुरुषों के लिए किया जाता है।

सरोगेसी
सरोगेसी का सहारा तब लिया जाता है जब चिकित्सकीय मुद्दों के कारण महिला को गर्भधारण की अनुमति नहीं दी जा सकती यानी उसके लिए गर्भ धारण करना खतरनाक साबित हो सकता है। इस प्रक्रिया के तहत, आनुवंशिक दम्पति के अंडे और शुक्राणु के माध्यम से सृजित गर्भ को कोई अन्य महिला धारण करती है। इस प्रक्रिया में, आईवीएफ या आईसीएसआई प्रक्रिया के माध्यम से पत्नी के अंडे को पति के शुक्राणुओं से प्रयोगशाला में निषेचित कराया जाता है और भ्रूण को सरोगेट मदर यानी अन्य महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। यह सरोगेट मदर नौ महीने तक इस भ्रूण को पालती है। सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे का उसे पैदा करने वाली मां से आनुवंशिक रूप से कोई संबंध नहीं होता। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने सिर्फ उन मामलों में ही सेरोगेसी को मंजूरी दी है, जब दम्पति बच्चे पैदा करने में चिकित्सीय रूप से सक्षम न हों या जब गर्भावस्था मां या बच्चे के लिए खतरनाक साबित हो सकती हो।

स्पर्म डोनेशन
जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या नगण्य होती है, वे शुक्राणु बैंक से शुक्राणु ले सकते हैं। शुक्राणु बैंकों को शुक्राणुदाता शुक्राणु देते हैं। शुक्राणु लेने से पहले शुक्राणु दाता के रक्त और मूत्र परीक्षण के साथ-साथ पूरी तरह से शारीरिक परीक्षण किया जाता है।

एग डोनेशन
कन्या जब पैदा होती है तभी से उसके शरीर में अंडे होते हैं और महिला की उम्र बढऩे के साथ-साथ उसके अंडों की उम्र भी बढ़ती है। समय के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता में कमी आती है। 30 वर्ष की उम्र तक महिला के अंडे अच्छी स्थिति में होते हैं लेकिन इसके बाद लंबे समय तक प्रसव न कर पाने वाली महिलाओं को गर्भ धारण करने में कठिनाई आ सकती है।

कितनी कोशिश करें?

आईवीएफ के लिए कितनी बार कोशिश की जाए, इस कोई खास प्रतिबंध नहीं है लेकिन आदर्श स्थिति में किसी दम्पति को चार बार ही आईवीएफ या आईसीएसआई की कोशिश करनी चाहिए और इन कोशिशों के बीच एक से दो महीने का अंतराल होना चाहिए। इसके बावजूद अगर गर्भधारण नहीं हो पाता है तो उसके लिए अंडदान, शुक्राणुदान, भ्रूणदान या गोद लेने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

डॉ. श्वेता गुप्ता का कहना है कि निसंतान दंपति के लिए अब बच्चा पाना सपना नहीं रहा। इन तकनीकों के माध्यम से अब कोई भी दंपति निसंतान नहीं रह सकता। हां यह जरूर है कि कुछ प्रक्रियाएं काफी महंगी हैं। लेकिन समय के साथ तकनीक कॉमन भी हो रही है और लोगों की जेब के साथ सामंजस्य भी बैठा रही है। 

 

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