GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

मां की ममता

डॉ. मंजरी शुक्ल

10th June 2017

मां इतनी सुन्दर, इतनी गोरी चिट्टी, उसे खुद पर गर्व हो आया था कि उसकी मां सबसे सुन्दर और सबसे प्यारी है...। सुबह हो या शाम, उसने खुद को मां की ही गोद में पाया, फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि मां उसे बिना बताए ही चली गई।

ख्वाबों से आंख मिचौली करने की अब ऐसी आदत पड़ गई थी कि रितु जान ही नहीं पाती थी कि क्या सच है और क्या झूठ... क्या उसकी मां का उसे छोड़कर जाना झूठ था या उसके पापा का दिन-रात साथ रहकर उसकी देखभाल करना और अपने बालों में काली डाई लगाते हुए उम्र को धोखा देना... उम्र की लुकाछुपी सच थी या बचपन का जवानी से आंखों में आंसू भरकर मुस्कुराते हुए विदा लेना, कभी दुबारा लौटकर ना आने के लिए। भीगी आंखों को पोंछते हुए उसने दीवार घड़ी की ओर बड़े ही अनमने ढंग से देखा, जैसे उसे पता था कि रात के दो तो बज ही रहे होंगे। उसका अंदाजा बिलकुल सही था, रात के दो बज रहे थे, पर रोज की तरह उसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी।

नींद आखिर आती भी कैसे, उसके पापा जो समाज की जिम्मेदारियों से ग्रस्त थे और जिनके इशारे के बिना मेरठ शहर का पत्ता भी नहीं हिलता था, उनके घर आने का अभी समय ही कहां हुआ था। बाहर की समस्या सुनने के लिए वो कितनों के घर जाते थे, ये बात वो उम्र के उस पड़ाव पर आते ही जान गई थी, जिसे किशोरावस्था कहते है। एक ऐसा दौर, जहां न तो बच्चों के साथ खेलने की उम्र होती है और न बड़ों के बीच बैठने की इजाज़त, बस फुटबॉल की तरह इधर से उधर लुढ़कते रहो और लोग तुम्हें लातों से मार मारकर गोल करते हुए तुम्हें ठोंक पीटकर गोल भी बनाते रहे। पापा की उसे बहुत याद आ रही थी, अचानक उसे जोरों से हंसी आई और वो हमेशा की तरह फ्रिज से लिमका निकाल कर बैठ गई। 'इतनी रात में किसके यहां फोन करे और क्या कहे कि शहर का कमिश्नर दूसरों की समस्याओं का हल खोजते खोजते खुद ही लापता हो गया है।

कौन उसकी बात पर विश्वास करेगा कि दिन की उजली धूप में शराफत से नहाया हुआ कोई पुरुष रात होते ही अमावस के चांद की तरह गायब हो जाता है। अचानक उसे पता नहीं क्या हुआ, वो अपनी मां की पुरानी फोटो लेकर बैठ गई और मुस्कुराती हुई मां की तस्वीर देखकर न चाहते हुए भी उसके आंसू बह चले। थोड़ी देर तक धीरे-धीरे रोने के बाद उसकी रुलाई फूट पड़ी और पागलों की तरह जमीन पर सर मारते हुए वो भरभराकर रो पड़ी। मां उसे क्यों छोड़ कर चली गई, ये उसे कभी पता नहीं चल पाय। उसे अच्छे से याद है, वो उस समय दस साल की थी जिस दिन उसकी मां ने लाल साड़ी पहनकर उसके गाल में मुस्कुराते हुए हलकी सी चिकोटी काटते हुए पूछा था, 'मैं कैसी लग रही हूं?' और वो अपनी बेइन्ताह खूबसूरत मां को एकटक देखती रह गई थी। उसकी मां इतनी सुन्दर, इतनी गोरी चिट्टी उसे मानों खुद पर गर्व हो आया था कि उसकी मां उसकी सभी सहेलियों की मां से सुन्दर है... सबसे सुन्दर और सबसे प्यारी।

और वो दौड़कर उनके गले लिपट गई। थी गीले लहराते बालों से गिरती हुई पानी की बूंदों को पकडऩे के लिए वो अपनी मां के पीछे-पीछे दौड़ा करती थी और आखिरी में थककर जब वो अपने घुटने पकड़ कर बैठ जाती तो मां बड़े ही ह्रश्वयार से उसके नजदीक आकर उसके ऊपर गीले बाल झटकती, जिससे वो खुशी से झूम उठती। रितु का हाथ जैसे अचकचाकर अपने ऊपर की बूंदों को हटाने के लिए अपने आप ही उठ गया। उसे सिर्फ अपनी मां की ही याद थी, बचपन के झरोखों से झांकने पर... क्योंकि पापा तो हमेशा से ही नाम और पैसों के दीवाने थे। सुबह हो या शाम और या फिर रात, उसने खुद को मां की ही गोद में पाया, फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि मां उसे बिना बताए ही चली गई।

उसे आज भी याद है... स्कूल की पेंटिंग प्रतियोगिता में जब उसे फस्र्ट प्राइज़ मिला था और वो दौड़ती हुई घर भागी थी। मां को सबसे पहले अपना प्राइज दिखने। दरवाजे से ही उसने मां को पुकारना शुरू कर दिया था, पर जो मां उसके स्कूल से लौटने के पहले ही पलकें बिछा, धधकती धूप और कड़कड़ाती सर्दी में हमेशा खड़ी रहती थी वो आज कहां चली गई थी। दरवाज़े पर लगातार घंटी बजाते हुए जब उसके नन्हें नन्हें हाथ थक गए, तो वो रोती हुई अपना भरा हुआ टिफिन हाथों में पकड़े दरवाजे पर ही सो गई। आंख खुली तो उसने खुद को बिस्तर पर पाया। पास ही पापा के साथ डॉक्टर अंकल थे।

पापा उसे देखकर चिंतित स्वर में बोले, 'बेटा, आपने सुबह से खाना नहीं खाया और आपका टिफिन भी भरा हुआ है, तभी देखिये आपको कितना तेज फीवर आ गया है।' उसने पापा को ऐसे देखा मानों कोई मेहमान हो। ना तो उसे उनकी इन बातों में अपनापन दिखाई दिया और ना ही प्यार, बस एक तरह का रटा रटाया वाक्य था जो डॉक्टर अंकल को दिखाने के लिए बोला जा रहा था। उसका सोचना बिलकुल सही था, जैसे ही डॉक्टर अंकल बाहर गए, पापा का भरपूर चांटा उसके गाल पर पड़ा। उसने दर्द से चीखते हुए मां को याद कर जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। नौकरानी को बुलाकर उसे दवाइयां दिखाते हुए पापा ने कुछ कहा और तेजी से बाहर चले गए। नौकरानी बहुत भली थी, उसने प्यार, मनुहार से उसे किसी तरह खाना और दवाइयां खिला ही दी। जैसे ही उसे थोड़ा सा प्यार और अपनापन मिला वो नौकरानी के गले लग कर फूट-फूट कर रो पड़ी।

इतना रोई कि उसकी हिचकियां बंध गई और उल्टियां होने लगी। वो डर गई कि अब उसे बहुत डांट पड़ेगी, पर उस नौकरानी ने, जिसे अब वो दाई मां कहने लगी थी, बड़े प्यार से उसे नहलाया, धुलाया और पाउडर लगाकर बिस्तर पर लेटा दिया। उसने हजारों बार दाई मां से पूछा कि उसकी मां उसे छोड़कर क्यों चली गई, वो तो उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकती थी। हर बार जवाब दाई मां के बहते आंसुओं ने ही दिया। धीरे-धीरे उसने परिस्थितियों के साथ समझौता कर मां के बारे में पूछना ही छोड़ दिया। उसे इस बात पर हमेशा आश्चर्य होता कि उसके पापा ने न तो कभी उसकी मां को ढूंढने की कोशिश की और न ही कभी नाम लिया। जब वह थोड़ी समझदार हुई तो एक दिन अचानक दाई मां के पैरों में अपना सर पटकने लगी। दाई मां की ये देखकर रुलाई फूट पड़ी और वह बोली, 'हमार पांव छूके काहे हमें नरक के द्वारे पहुंचा रही हो बिटिया।

आगे की कहानी पढ़ें पेज 2 पर...