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मौन रहना बेहतर

सीमा ओझा, बक्सर (बिहार)

17th September 2015

हाय मैं शर्म से लाल हुई


मैं पेशे से एक शिक्षिका हूं तथा इन दिनों अपने मूल विद्यालय में ना होकर प्रतिनियुक्त शिक्षिका के रूप में दूसरे विद्यालय में सेवा दे रही हूं। अभी कुछ दिनों पहले मैं अपने मूल विद्यालय के प्रधानाध्यापक से पहली बार रू-ब-रू हुई। उन्होंने बातचीत के क्रम में कहा, 'अरे, मैंने आपको अब तक देखा नहीं था, परंतु आपके वेतन के लिए हस्ताक्षर मेरे ही होते हैं। ''मैंने तुरंत अपनी वाक-पटुता प्रस्तुत करते हुए कहा, 'सर, तो क्या हुआ, वेतन कोई चेहरा देखकर दिया जाएगा क्या?'' मेरी बात पर जब वहां उपस्थित अन्य शिक्षक हंसने लगे तो मुझे बेहद झेंप हुई तथा मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया। कई बार हाजिर-जवाबी से बेहतर मौन होता है।

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