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हिंदी पखवाड़ा मनाना मजबूरी या मोहब्बत

गृहलक्ष्मी टीम

12th September 2019

14 सिम्बर का महीना आते ही साहित्य के गलियारे में सुगबुगाहट तेज हो जाती है, कथित लेखक और बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोगों में हिंदी पखवाडा़ मानने की होड़ सी मच जाती है। ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि हिंदी पखवाड़ा मनाना मजबूरी है या मोहब्बत। वरिष्ठ साहित्यकार और जानमाने व्यंग्यकार अनूप श्रीवास्त्व जी की कविता हिंदी में मुस्कराया इसी सवाल का जवाब है।

हिंदी पखवाड़ा मनाना मजबूरी या मोहब्बत

हिंदी में मुस्कुराया

~~~~
हिंदी पखवाड़ा मनाने की
चख चख के दौरान
मैंने कहा ~बड़े बाबू !
आप साल भर तो
सारा काम काज
अंग्रेजी में निपटाते हैं
लेकिन हफ्ता पन्द्रह दिन के लिए
एकदम बदल जाते हैं
सिफ हिंदी हिंदी चिल्लाते हैं
सच सच बताइये बड़े बाबू
आप को अपने आफिस की कसम
इस बार भी आपको क्या 
हिंदी पखवाड़ा मनाने का ख्याल 
अचानक ही आया है
 बड़े बाबू मुस्कराकर बोले
शोर मत मचाइए
मैंने फिर दोहराया 
लेकिन आप को कैसे पता चला
ऐसे क्योंकि
पिछले साल की ही तरह 
आज फिर हमारा बॉस 
कुर्सी पर बैठते ही 
हिंदी में मुस्कुराया है।
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