योग का शरीर पर प्रभाव

गृहलक्ष्मी टीम

25th December 2015

वेदों, उपनिषद, गीता एवं पुराणों आदि से प्राचीन काल से ‘योग’ का उल्लेख मिलता है। भारतीय दर्शन में योग एक अति महत्वपूर्ण शब्द है। आत्मदर्शन एवं समाधि से लेकर कर्मक्षेत्र तक योग का व्यापक व्यवहार हमारे शास्त्रों में हुआ है। योगदर्शन के उपदेष्टा महर्षि पतंजलि ‘योग’ शब्द का अर्थ चित्तवृत्ति का निरोध करते हैं।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि संयमपूर्वक साधना करते हुए आत्मा का परमात्मा के साथ योग करके (जोड़कर) समाधि का आनन्द लेना योग है।

योग के प्रकार
दत्तात्रेय योगशास्त्र तथा योगराज उपनिषद् में मंत्रयोग, लययोग, हठयोग तथा राजयोग के रूप में योग के चार प्रकार माने गये हैं।

1. मंत्रयोगः मातृकादियुक्त मन्त्र को 12 वर्ष तक विधिपूर्वक जपने से अणिमा आदि सिद्धियां साधक को प्राप्त हों जाती है।

2. लययोग- दैनिक क्रियाओं को करते हुए सदैव ईश्वर का ध्यान करना ‘लययोग' है।

3. हठयोगः- विभिन्न मुद्राओं, आसनों, प्राणायाम एवं बन्धों के अभ्यास से शरीर को निर्मल एवं मन को एकाग्र करना ‘हठयोग' कहलाता है।

4. राजयोगः- यम-नियमादि के अभ्यास से चित्त को निर्मल कर ज्योतिर्मय आत्मा का साक्षात्कार करना ‘राजयोग' कहलाता है।

योग का शरीर पर प्रभाव
योग का अर्थ है अपनी चेतना (अस्तित्व) का बोध अपने अन्दर निहित शक्तियों को विकसित करके परम चैतन्य आत्मा का साक्षात्कार एवं पूर्ण आनन्द की प्राप्ति। इस यौगिक प्रक्रिया मंे विविध प्रकार की क्रियाओं का विधान भारतीय ऋषि -मुनियों ने किया है। यहां हम मुख्य रूप से अष्टागं योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि) से हमारी सुप्त चेतना शक्ति का विकास होता है। सुप्त तन्तुओं का पुनर्जागरण होता है। एवं नये तन्तुओं, कोशिकाओं (सेल्स) निर्माण होता है। परिणामस्वरूप ठीक प्रकार से रक्त-संचार होता है। और नई शक्ति का विकास होने लगता है। और नई शक्ति का विकास होने लगता है। योग से हृदयरोग जैसी भंयकर बीमारी से भी छुटकारा पाया जा सकता है।

आसनः पद्मासन, भद्रासन, सिद्धासन या सुखासन आदि किसी भी आसन में स्थिरता और सुखपूर्वक बैठना आसन कहलाता है। साधक को जप, उपासना एवं ध्यान आदि करने के लिए किसी भी आसन में स्थिर और सुखपूर्वक बैठने का लम्बा अभ्यास करना चाहिए। कोई आसन करते समय मेरूदण्ड सदा सीधा होना चाहिए। भूमि समतल हो, बिछाने के लिए गद्दीदार वस्त्र, कुश या कम्बल आदि ऐसा आसन होना चाहिए, जो विद्युत का कुचालक तथा आरामदायक हो।

विधि: 
जब श्वास भीतर से बाहर आए, तब बाहर ही कुछ सेकेंड तक रोक कर रखें और जब बाहर से भीतर जाएं, तब भी उसको भीतर कुछ सेकेंड तक रोक कर रखें। इस प्रकार एक दूसरे के विरूद्ध क्रिया करें, ताक दोनों प्राणों की गति रूककर वे प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन हो जाती है। इससे चित्त निर्मल होकर उपासना में स्थिर हो सकता है।

ध्यान क्या है जाने इसके बारे मंे
आसन पर बैठकर कोमलता से आंखें बंद करके ईश्वर से मिलन की कल्पना करना अथवा ‘ओडम्' को साकार करना ध्यान की आरंभिक अवस्था है। ध्यान के समय ईश्वर के अतिरिक्त अन्य विषय का स्मरण नहीं करना चाहिए। भारतीय संस्कृति में तो ध्यान प्रत्येक क्रिया का पूरक होता था। इसी लिए आज भी हमें अपने घर एवं परिवार के बड़े व्यक्ति किसी कार्य को विधिवत सम्पन्न करने हेतु जब कहते हैं, तब सर्वत्र यही वाक्य होता है।-भाई ध्यान से पढ़ना, ध्यान से चलना, प्रत्येक कार्य को ध्यान से करना। आज हम ध्यान शब्द का प्रयोग करते हैं तो परन्तु ध्यान क्या है यह नहीं जानते लेकिनक जीवन के प्रत्येक कार्य से साथ जुड़े इस ध्यान शब्द से हम यह तो जान ही सकते हैं कि ध्यान जीवन का अपिहार्य अंग है। ध्यान के बिना जीवन अधूरा है।

1-ध्यान के द्वारा मन को शांति मिलती है। मन पूर्णतः शान्त एवं एकाग्र हो जाता है।

2-कपालभाति और अनुलोम-विलोम प्राणायाम विधिपूर्वक करने से मन निर्विषय हो जाता है। अतः ध्यान स्वतः लगने लगता है।

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