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खजुराहो - प्रेम की शाश्वत अभिव्यक्ति

गृहलक्ष्मी टीम

24th November 2016

 


 खजुराहो एक विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक स्थल है। खजुराहो के मंदिर विश्व को भारत की अनुपम देन हैं। जीवन के विविध कार्यकलाप रूप और मनःस्थितियां यहां पाषण में बड़ी संवेदनशीलता से उकेरी गई हैं, जो ना केवल शिल्पी दृष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैंं वरन वे चंदेल राजपूतों की असाधारण व्यापक दृष्टि का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके शासन काल में मंदिरों की परिकल्पना की गई थी। 

वास्तुकला की दृष्टि से भी ये मंदिर अप्रतिम हैं और समयकालीन मंदिरों की अनुकृतियों से बहुत भिन्न हैं। इनमें से प्रत्येक मंदिर एक ऊंचे चिनाईदार चबूतरे पर निर्मित हैं, जिनकी बनावट विशिष्ट रूप से ऊर्ध्वगामी हैं, जिनका प्रक्षेपण भी ऊपर की ओर है ताकि चारूता और भारहीनता का प्रभाव दिया जा सके। इनमें से प्रत्येक प्रमुख कक्ष से ऊपर आच्छादन है, जिसमें देवताओं के निवास हिमालय पर्वतमाला की ओर ऊर्ध्वगामी कर शिल्पियों ने अनूठी कल्पनाशीलता का परिचय दिया है। खजुराहो मंदिरों का निर्माण ईसवीं सन् 950 से लेकर 1050 में किया गया था। जो सचमुच रचनात्मकता का चरम उत्कर्ष का काल था। यहां 85 मूल मंदिरों में अभी तक 22 मंदिर विद्यमान हैं।

अभिभूत कर देने वाले खजुराहो का ध्वनि प्रकाश कार्यक्रम महान चंदेला राजाओं के शानदार जीवन और समय की याद दिलाता है और साथ ही यह 10वीं और 11वीं शताब्दी के दौरान बने मंदिरों की अनोखी कहानियों को भी बताता है।

खजुराहो डांस फेस्टिवलः- खजुराहो डांस फेस्टिवल अपने आप में कई मनमोहक रंगों, शानदार परम्पराओं, समृद्ध संस्कृतियों और देश की विभिन्न नृत्य शैलियों को समेटे हुए है। हर वर्ष होने वाले खजुराहो डांस फेस्टिवल में देश के मशहूर शास्त्रीय नर्तक-नर्तकियां अपने नृत्य से समां बांध देते हैं। इस नृत्य समारोह के दौरान ये पत्थर की मूर्तियां और उनके सामने नृत्य करते कलाकार मानो एकाकार हो जाते हैं। कत्थक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, ओडिसी और कथकली जैसे शास्त्रीय नृत्य की कई शैली यहां कलाकारों द्वारा प्रस्तुत की जाती है।

 

 

 

 

 

 

चित्रकूटः- (खजुराहों से 175 किमी. और सतना से 78 किमी. दूर): चित्रकूट ‘अनेक आश्चयों की पहाड़ी' के रूप में प्रसिद्ध यह बस्ती परम शांतिमय परिवेश में विंध्य पर्वतमाला के उतरी पर्वत स्कन्ध में बसी हुई हैं। यहां समग्र प्रशान्त वन, नीरव बहती नदियां और झरने समूचे वातावरण में शांति और विश्राम की अनुभूति कराते हैं। चित्रकूट की आध्यात्मिक विरासत का उद्गम सुदूर अतीत में जनश्रुतियांे के काल में स्थित हैं। कहा जाता है कि यहां के घने वनों में प्रभु श्रीराम और सीता ने अपने निर्वासन काल के चौदह वर्षों में से ग्यारह वर्ष बिताए थे।

 

प्राकृतिक चमत्कार
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान- (जबलपुर टी 160 किमी. दूर): साल और बांसों से भरा कान्हा का जंगल, झूमते-लहराते घास के मैदान और टेढ़ी-मेढ़ी बहने वाली नदियों की निसग्र भूमि है। 1940 वर्ग किमी. फैले इस भू-भाग का सौंदर्य अप्रतिम रूप से नाटकीय है। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान दुर्लभ प्राणी हार्ड ग्राउंड, बारहसिंगा का शरणस्थल भी है। इसके अलावा कान्हा में 200 से अधिक पक्षी पाए जाते हैं। जो पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग है। बाघ सुरक्षा की विशेष योजना ‘प्रोजेक्ट टाइगर' कान्हा वन का निर्माण किया गया था। कान्हा पर्यटन के लिहाज से एक सुव्यवस्थित राष्ट्रीय उद्यान है।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान- (जबलपुर से 190 किमी. खजुराहो से 237 किमी. दूर): यह एक छोटा किंतु सघन राष्ट्रीय उद्यान है। बांधवगढ़ में बाघों की बहुलता पूरे भारत में बाघों की बहुलता की तुलना में सबसे अधिक है। शहडोल जिले में विंध्य पर्वतमाला की दूरस्थ पहाड़ियों में स्थित बांधवगढ़ 448 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसके अलावा यहां पर 200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियों के साथ-साथ हिरण, तंेदुए, सांभर और जंगली सूअर आदि जानवर रहते हैं। इन उद्यान के चारों और विशेष रूप से किले के आसपास अनगिनत गुफाएं हैं, जिनमें वेदियां हैं और प्राचीन संस्कृत शिलालेख अंकित है।

पेंच राष्ट्रीय उद्यान- (जबलपुर से 172 किमी. नागपुर से 92 किमी. दूर): सतपुड़ा पहाड़ी की दक्षिणी भाग में स्थित पेंच राष्ट्रीय उद्यान दक्षिणी मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा को छूता है और रूडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध कृति ‘द जंगल बुक' का उद्गम स्थल यही है। पेंच टाइगर रिजर्व में शाक-पत्ती खाने वाले शाकाहारी जानवरों का घनत्व भारत में सबसे ज्यादा है।

अमरकंटक-(जबलपुर से 228 किमी. दूर, पेंड्रा रोड से 42 किमी. दूर) अमरकंटक नर्मदा और सोन नदी का उदगम स्थल होने से हिंदुओं के पवित्र स्थल के रूप में जाना जाता है। यहां के खूबसूरत बहते झरने, पवित्र तालाब, उंची पहाड़ियां, शांत वातावरण और घने जंगल अमरकंटक को प्रकृति प्रेमी और धार्मिक लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बनाते हैं।

भेड़ाघाट की मार्बल चट्टान- (जबलपुर से 23 किमी. दूर): जबलपुर के भेड़ाघाट स्थित संगमरमरी चट्टान नर्मदा नदी के दोनों ओर करीब 100 फीट ऊंची है। साथ में धुआधार नाम का अलौकिक झरना वहां आये सैलानियों को अपनी ओर बरबस ही आकर्षित कर लेता है।