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ज्ञान, कला और वाणी की देवी- सरस्वती

साधना पथ

29th October 2015

नूतन उत्साह का प्रतीक बसंत पंचमी

तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मान्यताओं वाले देश भारत में हर देवी-देवता का अपना ही एक विशेष महत्व स्थान है जो अपनी शक्तियों के कारण मानव जीवन में अपनी अलग-अलग भूमिका निभा कर उसे सुख-समृद्धि प्रदान करता है। उन्हीं देवी-देवताओं में से एक अहम देवी हैं 'देवी सरस्वती जिन्हें ज्ञान की देवी कहकर संबोधित किया व पूजा जाता है। ज्ञान की देवी सरस्वती मनुष्य को मात्र ज्ञान ही नहीं देतीं बल्कि अच्छी वाणी, कला में निपुणता, तीक्ष्ण बुद्धि व शांति भी प्रदान करती हैं।


सरस्वती यानी स्वयं के बारे में ज्ञान देने वाली। सरस्वती, संस्कृत के दो शब्द 'सर और 'स्व से मिलकर बना है 'सर का संस्कृत में अर्थ होता है तत्व, गुण, सार और 'स्व का अर्थ है स्वयं या आत्म। सरस्वती यानी जो हमें, हमारे स्वयं के वास्तविक तत्व, गुण या सत्य को जानने में मदद करे। जो हमें स्वयं के सत्य से मिलाए। लोक चर्चा में सरस्वती को शिक्षा की देवी व वेदों की माता कहा जाता है। सरस्वती के अन्य पर्याय नाम भी हैं। सरस्वती को इरा, कला देवी, कादंबरी, गिरा, गीर्देवी, गो, जगद्धात्री, ज्ञानदा, देवी, पद्मलाछना, परमेष्ठिनी, पारायणी, प्रज्ञा, ब्रह्मसुता, ब्रह्मणी, ब्रह्मणी, पत्नी, ब्रह्मणी पुत्री, ब्राह्मणी, भारती, महाश्वेता, महाषष्ठी, वाग्देवी, वाड्मयी, वाचा, वाणी, वामा, विद्या, देवी, विधात्री, विमला, वीणा वादिनी, वैखरी, शारदा, शुक्ला श्री, सनातनी, सरस्वती देवी, सांध्य देवता, साहित्य कला देवी, स्वायंभुवी, हंसगामिनी नामों से भी पुकारा व पूजा जाता है।

जन्म कथा
सरस्वती हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं। सरस्वती के जन्म से जुड़ी दो जानकारियां मिलती हैं एक कि वह भगवान शिव और मां दुर्गा की पुत्री हैं तो दूसरी कि वह ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट हुई थीं जिसके चलते ब्रह्मा जी को उनका पिता कहा जाता है। परंतु पुराणों में तता जनमानस में सरस्वती के जन्म को लेकर जिस कथा को सर्वाधिक माना जाता है। वह इस प्रकार है। कहते हैं कि ब्रह्म ने सृष्टि की रचना करने के बाद मनुष्य की रचना की। मनुष्य की रचना के बाद उन्होंने अनुभव किया कि मनुष्य की रचना मात्र से ही सृष्टि की गति को संचालित नहीं किया जा सकता। उन्होंने अनुभव किया कि नि:शब्द सृष्टि का औचित्य नहीं है, क्योंकि शब्दहीनता के कारण विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं था और अभिव्यक्ति के माध्यम के नहीं होने के कारण ज्ञान का प्रसार नहीं हो पा रहा था। इसके बाद उन्होंने विष्णु से अनुमति लेकर एक चतुर्भुजी स्त्री की रचना की, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। ब्रह्मणा  ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी, तब ब्रह्म ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। ये विध्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।

 

 बसंत पंचमी

बसंत को ऋतु राज कहते हैं। यह सभी ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ होता है, इसीलिए इसे ऋतुराज कहते हैं। प्रकृति में बसंत के आगमन की टोह मन में एक नया उल्लास, आशा एवं उत्साह के रूप में प्रकट होती है। अचानक ही लगता है कि मन प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो उठा है। परिवर्तन में भावों की पावन धाराएं बहने लगी हैं और हमारे तन, मन और व्यवहार में सुंदर एवं सुमधुर अभिव्यक्तियां झलकने लगती हैं। कहते हैं, प्रकृति जब मुस्कराने लगती है, तब उसके अंतर्गत आने वाले सभी जड़-जीव एवं मनुष्यों में मुस्कराहट फैल जाती है। बसंत में माता प्रकृति अपने समस्त रहस्यों को छिपा हुआ करके केवल एक मुस्कराहट भरे रहस्य को घिरा हुआ करती है और स्वाभाविक है कि जो प्रकृति से गहरे एवं प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होते हैं, उनके जीवन में इसके परिणाम परिलक्षित होते हैं।

बसंत में पौधों, पादपों, वृक्षों एवं लताओं में सुंदर, सुगंधित एवं सुरभित पुष्पों की रंग-बिरंगी छटाएं मन मोहक एवं मनभावन होती हैं। आम जैसे पेड़ वर्ष भर यूं ही केवल हरियाली की प्रतिमूत बन खड़े रहते हैं, लेकिन बसंत के आगमन के साथ ही ये पेड़ भी अपनी मंजरी की भीनी-भीनी गंध से प्रकृति के सभी घटकों को अपनी ओर आ्कर्षित करने में सफल एवं समर्थ हो जाते हैं। जिन लताओं में केवल पत्तियों के अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता है, उनमें गुच्छे-गुच्छे विभिन्न रंगों के पुष्प इतने खिल उठते हैं कि उनके भार से लताएं झुक जाती हैं। बसंत में सन्नाटा फैलाने वाले घने जंगल के सभी प्रकार के वृक्ष एवं पादप अपने पुष्पों की विभिन्न सुरभियों से वातावरण में एक नया उल्लास उठता है, विचारों में एक नए उत्साह का संचार होता है एवं हृदय भावों से छलकने लगता है।

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