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सोना कितना सोणा है ...

ऋचा कुलश्रेष्ठ

3rd November 2015

भारत में सोने में अधिकांश निवेश आभूषणों के रूप में है लेकिन इसे सोने में निवेश का सबसे अच्छा तरीका नहीं कहा जा सकता क्योंकि सोने का मूल्य घटता बढ़ता रहता है। अगर स्वर्ण लेने का आपका उद्देश्य निवेश न होकर सिर्फ आभूषण हों तो अलग बात है...

सोना कितना सोणा है ...

वर्ष 2008 में आई वैश्विक मंदी का असर भारत पर बाकी पश्चिमी देशों से काफी कम हुआ। इसका कारण भारतीयों के बचत और आभूषण प्रेम को ही बताया गया। यह भारतीयों का आभूषण प्रेम ही है कि उनके पास आभूषण के रूप में 14,000 टन से भी अधिक सोना है जो पूरी दुनिया के स्वर्ण भंडार का लगभग 10 फीसदी है। सोने की वार्षिक वैश्विक मांग में 18 फीसदी हिस्सा सिर्फ भारत का ही है। इसके अलावा अमरीका, फ्रांस और जर्मनी की सरकारों के पास कुल जितना सोना है उससे ज्यादा सोना सिर्फ भारतीयों के पास है।
भारत में सोने में अधिकांश निवेश आभूषणों के रूप में है लेकिन यह सोने में निवेश का सबसे अच्छा तरीका नहीं कहा जा सकता क्योंकि सोने का मूल्य घटता-बढ़ता रहता है। यदि हम आभूषणों को छोड़ दें तो भी सोने में निवेश के कई विकल्प मौजूद हैं जैसे सोने के सिक्के, सोने की छड़ और स्वर्ण फंड इत्यादि।

भारतीय अपने लगभग सभी त्योहारों पर सोने में निवेश करते हैं। उन्हें लगता है कि सोने से बेहतर निवेश किसी अन्य वस्तु में नहीं है जबकि सोने में निवेश करना भी काफी खतरे से भरा हुआ है। अगर आप स्वर्ण को लेने का आपका उद्देश्य सिर्फ आभूषण हैं न कि निवेश, तब तो यह ठीक है। लेकिन निवेश के लिये सोने का चुनाव अच्छा विकल्प नहीं है। यह उस कंपनी के शेयर की ही तरह है, लोग जिसके उछाल के इंतजार सालों करते रहते हैं। यदि आप पिछले कुछ सालों में सोने के उतार चढ़ाव पर गौर करें तो पाएंगे कि जहां इस दौरान मुद्रास्फीति काफी अधिक बढ़ी, वहीं सोने के भाव नीचे ही गिरे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी ने सोने में निवेश किया है, तो उसे लाभ के बजाय हानि ही हुई है। 

 

सोने में निवेश से सिर्फ उस समय अच्छा रिटर्न मिलता है, जब विश्व की आर्थिक परिस्थितियां विपरीत होती हैं जैसे वर्ष 2008 में आर्थिक संकट के दौरान निवेशकों ने शेयर बेच कर सोने में निवेश किया था। इसके बाद जब आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगता है तो सोने को बेचा जा सकता है। अब कोर्इ भी अपनी जरूरत के हिसाब से सोने में निवेश कर सकता है। सोने के भाव अन्तरराष्ट्रीय बाजार तय करता है और इसमें प्रतिदिन घटत-बढ़त होती रहती है, जिससे सोने में निवेश प्रभावित होता है। हम सोने में निम्न प्रकार से निवेश कर सकते हैं -

सोने के आभूषण
सोने के आभूषणों में निवेश को बुद्धिमतापूर्ण निवेश नहीं माना जाता। आभूषण बनवाने या खरीदने के वक्त सुनार को इसकी बनवाई या मेकिंग चार्जेंज देने होते हैं और इसके अलावा कुछ वेस्टेज भी काटा जाता है। कई बार तो मेकिंग चार्जेज़ आभूषण के कुल मूल्य के 25 फीसदी तक होते हैं जो काफी महंगे पड़ते हैं। इसके अलावा आभुषण आमतौर पर बार्इस कैरेट - 20 कैरेट या 18 कैरेट सोने में बनते हैं। इसलिए जब हम इन्हें बेचने जाते हैं तो 22 कैरेट सोने के भाव में ही बिकते हैं। इसका अर्थ यह होता है कि आभूषण के मेकिंग चार्जेज़ तो बेकार ही हो गए और वेस्टेज की लागत भी काटी जाती है।

सोने के सिक्के
सोने के सिक्के या सोने की छड़ में निवेश का अर्थ भी यही है कि जब भी आप इसे बेचने जाएं, आपको इसका मूल्य इसकी खरीद से कम ही मिलेगा। अगर सोने का मूल्य काफी बढ़ गया हो तो बात अलग है। अगर खरीदने के बाद बेचते वक्त सोने का मूल्य बढ़ गया तभी इस पर मुनाफा मिलने की संभावना होती है। ध्यान रखें कि बैंक सोने के सिक्के और बार को बेचते तो हैं लेकिन वापस खरीदते नहीं हैं।

र्इटीएफ गोल्ड
भौतिक रूप से सोना खरीदने के बजाय र्इटीएफ गोल्ड निवेश में थोड़ा ज्यादा खर्च जरूर करना पड़ता है, क्योंकि मैनेजमेंट हाउस इस पर मैनेजमेंट फीस की वसूली करते हैं। आपको इस पर कुछ फीसदी ब्रोकरेज भी देना पड़ता है जिससे गोल्ड र्इटीएफ यूनिट की लागत बढ़ जाती है। फिर भी अगर इस बीच सोने का मूल्य बढ़ गया तो इस पर ठीक-ठाक लाभ अर्जित किया जा सकता है।

तरलता
सोने के प्रति भारतीयों को एक अलग तरह का लगाव होता है। वे मानते हैं कि बुरे वक्त में सोना ही काम आएगा। यह कुछ हद तक सही भी है कि अनिश्चित और अपरिहार्य परिस्थतियों में सोना काम आ जाता है। इसे ही तरलता कहते हैं।

रखरखाव की समस्या

 


खरीद तो लिया जाता है लेकिन सोने को घर में रखना एक बड़ी समस्या बन जाता है। अगर सोने को बैंक लॉकर में रखा जाता है तो जरूरत आने पर बैंक से निकालना और फिर वापस रखना समस्या होती है। बैंक लॉकर की वार्षिक फीस भी देनी पड़ती है। और यदि घर में ही सोना रखा जाता है तो उसके चोरी होने का डर हर वक्त बना रहता है। 

अन्तरराष्ट्रीय प्रभाव
भारत में सोने का भाव वैश्विक बाजार निर्धारित करता है, जो वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर चलता है। अमरीकी डॉलर की भी सोने के भाव निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब डालर मजबूत होता है तब सोने के भाव गिर जाते हैं।

मेकिंग चार्जेज़
जब आभूषण बनाया जाता है, तब सुनार आभूषण बनाने पर कुल दाम का कुछ प्रतिशत या एक फिक्स दाम मेकिंग चार्जेज़ के रूप में लेते हैं जो काफी ज्यादा होता है। जितना बड़ा आभूषणों का ब्रांड होता है, उतने ही ज्यादा उसके मेकिंग चार्जेज़ होते हैं।

घाटा
जब आप अपने आभूषण बेच कर कुछ मुद्रा अर्जित करना चाहते हैं तब मेकिंग चार्जेज़ तो शून्य हो जाते हैं और इसके अलावा आपको पिघलाने का शुल्क पिघलने के घाटे के रूप में कुछ शुल्क और चुकाना होता है। यानी कुल मिलाकर आभूषण वापसी में आपको सिर्फ खरे सोने के मू्ल्य का दाम मिलता है जो उस वक्त स्वर्णाभूषण की खरीदारी के मुकाबले काफी कम होता है।

शुद्धता
आभूषणों में इस्तेमाल किया गया सोना 22 कैरेट या इससे कम कैरेट का होता है। इसका अर्थ यह है कि आभूषण के वजन का कुछ हिस्सा सोना नहीं होता।

प्रामाणिकता
सोने की शुद्धता का प्रमाणपत्र होता है हॉलमार्क। जहां हॉलमार्क सोने का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, वहाँ सोने की शुद्धता की कोई गारंटी नहीं होती है।

अब यह आपका निर्णय है कि आप निवेश करना चाहते हैं तो सोने में करें या फिर किसी और जगह। यह भी आपको ही तय करना है कि सोने के किस रूप में आपको निवेश करना है। लेकिन इससे पहले यह जरूर याद रखें कि हर तरह के आभूषण निवेश के लिए सही नहीं होते। आभूषणों में निवेश करना कई बार काफी घाटा भी दे जाता है। सिर्फ पुराने और एंटीक आभूषण के रिटर्न काफी अच्छे मिलते हैं। आभूषणों में निवेश करते वक्त सोचसमझ कर सही जगह से प्रमाणित आभूषण खरीदने चाहिए। यह भी सोच समझ कर ही तय करना चाहिए कि आप आभूषण कहां से ले रहे हैं क्योंकि इसी से यह तय होगा कि आप जो कुछ खरीद रहे हैं वह आपको आने वाले समय में मुनाफा देगा या नहीं। निवेश के लिए लेते वक्त ध्यान रखें कि आभूषणों के दाम बाजार में इसकी मार्केट वैल्यू यानी इसकी बिक्री के दामों के आसपास होने चाहिए। नहीं तो आपको इसका खासा नुकसान झेलना पड़ सकता है।