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अथ पति व्यथा कथा

रवीन्द्र जोशी

6th November 2015

पति के दुखों को देखकर तो कई बार पहाड़ तक रोने लगते हैं। पति अगर साधारण बना रहे तो बीबी का नौकर लगता है और बनने ठनने लगे तो पत्नी उस पर शक करने लगती है।

व्यंग्य

समझ में नहीं आ रहा है कि कहां से प्रारंभ करूं। आखिर लिखना तो है ही और उसके बारे में लिखना है, जिसके दुखों का न आदि है और न अंत है। उसके बारे में लिखना है जिसके आंसुओं को अगर एकत्र किया जाए तो शहरों की पानी की समस्या खुद ही समाप्त हो जाए, जिसके जले हुए दिल में इतनी आग है कि अगर उसका सही प्रयोग किया जाए तो ईंधन की समस्या खुद समाप्त हो जाए, जो इस दुनिया का मेरे विचार से सबसे अभागा प्राणी है। जी हां, अगर आप समझ गए तो ठीक, नहीं तो बता देता हूं कि मैं दुनिया के उस सबसे दुखी आदमी की बात कर रहा हूं जिसे लोग पति कहते हैं।
त्याग का दूसरा नाम ही पति है। पति वह प्राणी है जो अपनी देह का त्याग करने तक सबके लिए त्याग करता रहता है। सबसे पहले वह कुंवारी कन्या के मां-बाप का बोझ दूर करने के लिए अपनी अक्ल का त्याग करता है। शादी के बाद अपने दोस्तों का त्याग करता है। अगर किसी दोस्त का चेहरा याद आ जाए तो पत्नी की शक्ल याद आते ही उसे भूल जाता है। उसके बाद अपने मां-बाप के साथ के जीवनभर के रिश्ते का त्याग करता है। अपने मन की शांति का त्याग करता है और फिर सदा के लिए सच्चाई का त्याग करता है। बीबी जो कहती है वही सच मानता है, बाकी सब झूठ मानता है। बीबी जब भी पूछती हैं, मैं कैसी लग रही हूं तो उसका एक ही जवाब होता है, पहले से सुंदर।
आज पति का दुख सुनने के लिए कोई भी तैयार नहीं। यहां तक कि उसे बनाने वाला भगवान भी नहीं। जहां पत्नी का दुख हर समाचार चैनल के लिए ब्रेकिंग न्यूज बन जाता है, वहीं पति का दुख चैनल के लिए न्यूज ब्रेक करने वाला होता है। जहां पत्नी का दुख सुनने के लिए हर कान तैयार होता है, वहीं पति के अपने कान भी उसका साथ नहीं देते, क्योंकि उसे पत्नी के अलावा किसी और की आवाज ही सुनाई नहीं देती। घर में तो कोई भी पति की बात को नहीं सुनता। जहां मां समझती है कि बेटा जोरू का गुलाम है, वहीं बहू समझती है कि वो मां का पिट्ठू है। शादी के बाद पत्नी जहां धड़ा-धड़ सपने देखने शुरू करती है, वहीं पति के पहले देखे हुए सपने धड़ा-धड़ टूटने लगते हैं। पति के दुखों को देखकर तो कई बार पहाड़ तक रोने लगते हैं। पति अगर साधारण बना रहे तो बीबी का नौकर लगता है और बनने ठनने लगे तो पत्नी उस पर शक करने लगती है। पति अगर देर से उठे तो उसे निकम्मा समझा जाता है और अगर जल्दी उठे तो उसे उल्लू समझा जाता है। पति अगर पत्नी के पीछे चले तो उसे जोरू का गुलाम समझा जाता है और अगर आगे चले तो बेवकूफ समझा जाता है। पति अगर पत्नी को घुमाए-फिराए तो पिछलग्गू कहा जाता है। पति अगर किसी विषय पर अपनी राय दे तो कोई सुनता नहीं और कोई राय न दे तो उसे घमंडी कहा जाता है।
पति की व्यथा-कथा तब तक समाप्त नहीं होती, जब तक आदमी खुद समाप्त नहीं हो जाता। दुनिया के सभी व्यथा रहित गिने-चुने सुखी पतियों से माफी मांगते हुए लेख समाप्त करता हूँ। 


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