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प्रतीक्षित लम्हा- भाग 1

डॉ. अमरनाथ 'अमर'

7th October 2019

आज भीड़ में भी जैसे अकेलेपन का एहसास होने लगा है। कभी भीड़ में मैं जीती थी, भावनाओं की उछाल के साथ। वक्त का एक-एक कतरा खुशी से झूम उठता था। भीड़ के अकेलेपन में भी उसका साथ हर सांस में उमंग भर देता था। ऐसे में वह कह उठता था'भाविका! जि़ंदगी जीने की चीज़ है, सार्थकता के साथ और इस सार्थकता के लिए अपने कृत्यों के साथ-साथ हमें एक कारवां, एक सच्चे दोस्त और निश्चल प्रेम की जरूरत होती है।

प्रतीक्षित लम्हा- भाग 1

मैं उसकी बातों से सहमत हो हामी भरती। सच धीरे-धीरे लगने लगा था, जैसे कोई मेरा अपना मेरे साथ है। ऐसा आभास होता, मानो मैं खुशी के साथ जीने लगी हूं। कॉलेज से हर शाम हम दोनों गंगा की धारा को देखने चल पड़ते थे। वह अंतर्मुखी स्वभाव का होने के बावजूद कभी-कभी ऐसी मनोहारी बात कह उठता, जिससे मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठता। आंखें झुक जातीं और होंठों पर मुस्कान तैर जाती।

उस शाम भी हम दोनों गंगा किनारे बैठे थे, लेकिन न जाने क्यों वह उस दिन बहुत गंभीर था। कारण? पता नहीं। तभी मैंने पूछा- आलोक! क्या मेरा साथ, मेरा स्नेह अच्छा नहीं लगा? आज अजीब सी खामोशी छाई है। मुझे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है, जैसे तुम अपने-आप में न होकर कहीं दूर चले गए हो!...

मेरी बातों को सुन आलोक ने मेरी आंखों में झांका, धीरे से मुस्कुराया... कुछ देर यूं ही मुस्कुराता रहा। फिर बोल उठा- 'ऐसी बात तो नहीं भावी। तुम तो... मेरी मूकता में... शब्द हो...! और सच पूछो तो मैं तुममें ही जीवन का सार ढूंढा करता हूं, जहां मेरे मन में भावनाओं के न जाने कितने मीठे स्रोत फूटते हैं। जीवन के कंटीले रास्तों पर थक जाने के बाद तुम्हारे, साथ इन स्रोतों में बह जाना चाहता हूं। बहुत दूर तलक। और देखो, हम दोनों को मिल कर प्यार के साथ-साथ शिक्षा और जीवन की सार्थकता के सार को भी ढूंढऩा है, लेकिन बातें बनाकर नहीं, अपने कार्यों और सच्ची निष्ठा से। समझी देवी जी...!

वह अक्सर मुझे 'भावी कह कर ही पुकारता। उसके 'भावी संबोधन में न जाने कितनी बातें छिपी रहतीं। उसकी गंभीरता, उसका हास्य, उसके मज़ाक, उसका आक्रोश… जैसे सभी उसके जीवन के सहयोगी पक्ष थे, जिनके सहारे वह कामनाएं करता... जीता… और मेरे साथ आगे बढऩे की कोशिश करता। यद्यपि उसकी प्रतीकात्मक बातों को मैं ठीक से समझ नहीं पाती, पर 'भाविका की जगह 'भावी संबोधन कहीं ज्यादा अच्छा लगता। ऐसा लगता, जैसे मैं आलोक के और करीब आ गई हूं, लेकिन कभी-कभी डरती भी कि यह 'भावी कहीं हमारे वर्तमान को न छीन ले।

एक दिन हम लोग गंगा किनारे रेत पर बैठे नदी में बहती नावों को देख रहे थे। आलोक गुमसुम-सा रेत पर अपने हाथों को सिर के नीचे रखकर आकाश की ओर निहारने लगा। मैं किनारे बैठ हाथों से कंकड़ उठाने और फेंकने लगी। कभी कोई कंकड़ उठाकर शांत जल में डाल देती। एक छोटा-सा वृत्त बनता और धीरे-धीरे बड़ा होकर विलीन हो जाता। ऐसा करना बड़ा प्यारा लगता। तभी खामोशी तोड़ते हुए आलोक ने कहा- भावी हां! ज़रा सुनो तो। वह नाव देख रही हो न? हां, तो। और ये शाम की डूबती किरणें? हां, वे भी। कितना प्यारा दृश्य है! है न? एक तरफ लालिमा, दूसरी तरफ गति और एक आशा। लगता है, जैसे किसी कुशल कलाकार ने अपनी पेंटिंग से गंगा के पानी को रंग दिया है। सच। हां, शायद ऐसा ही। ...और फिर वह खामोश हो देखने लगा गंगा की बहती धारा को, मानो वह इसके साथ कहीं दूर तलक बह जाना चाहता हो। 

आलोक की इन साहित्यिक बातों को मैं उस वक्त ठीक से समझ नहीं पाती थी, फिर भी वे सारी बातें न जाने क्यों मुझे बहुत प्यारी लगतीं। मन रोमांचित हो उठता... सब कुछ बहुत अच्छा लगता...बहुत प्यारा। कॉलेज के दिनों में लड़कियों की ज़ुबान पर आलोक की चर्चाएं रहतीं। अच्छा भी लगता, पर जलन भी होती। खुशी होती कि आलोक पर मेरा दाव तो है। वह मेरा अपना भी तो है। और फिर मैं न जाने कितनी कामनाएं कर बैठती। छोटा-सा एक घरौंदा बन जाता, जिसमें मैं आलोक की तस्वीरों को निहार बैठती। मन में खुशी के ढेर सारे फूल खिल जाते और उनकी खुशबू से मेरा मन महक उठता। मेरे हर कदम पर जैसे आलोक के आने की आहट होती। न जाने क्यों मैं पीछे की ओर मुड़ कर देख भी लेती। मेरी आंखें अक्सर अकेले में आलोक को ढूंढ़ा करतीं। धीरे-धीरे अब आलोक मेरी सांसों में जिंदगी बन कर उतरने लगा था।

आलोक जब भी मिलता, शिक्षा और जीवन की बातें जरूर करता। उसने प्यार को नए ढंग से परिभाषित किया। उसकी संवेदनशीलता और विनम्रता से मैं सहज सरल होती गई। प्यार की संकीर्णता उसे पसंद नहीं थी। कोरी भावुकता भी उसे स्वीकार्य नहीं थी। वह प्यार को मानवीय संबंधों का आधार मानता था।हां, याद आया। उस दिन आसमान में काले घनेरे बादल छाए हुए थे। हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी। उसने अपनी उंगलियों से मेरे बालों को संवारा।

अरे! तुम तो भीग चुकी हो… नहीं तो... मुस्कुराते हुए मैंने कहा। शाम के धुंधलके में उसने बिना कुछ आगे कहे धीरे से मुझे अपने करीब खींच माथे को चूम लिया। मैं सिहर गई। सहम भी गई। कहीं कोई देख न ले। पर मन की गहराई में यही लगता कि काश यह पल यहीं रुक जाता और यह बूंदा-बांदी जोरदार बारिश में तब्दील हो जाती। अजीब-सी दीवानगी छाई रहती उन दिनों।

हां, फिर याद आया। एक दिन कॉलेज की लाइब्रेरी में आलोक से भेंट हुई। किताबें देखने और पत्र-पत्रिकाओं को पढऩे की इच्छा नहीं हुई। वहां से निकल हम दोनों कैंटीन में आ गए। चाय की चुस्कियों के बीच आलोक ने कहा, 'यार... जीवन के पल यूं ही निकलते जा रहे हैं। लगता है जैसे जीवन की सार्थकता की बात कहीं पीछे छूट गई है। 'क्या आलोक! तुम भी न सार्थकता के पीछे ही पड़ जाते हो। मैं झल्ला कर उस पर बिगड़ पड़ी... फिर वही सार्थकता-वार्थकता? आलोक?? मैं चिल्ला पड़ी। जी। मेरे गुस्से को देख वह सहम-सा गया। 'क्या हर वक्त यही धुन लगाए रहते हो… शिक्षा-विक्षा सार्थकता-वार्थकता... मेरी समझ में ये बातें नहीं आतीं। दिमाग खराब हो जाता है, कुछ और भी तो बाते हैं, जैसे… 'जी हां, जी हां, कुछ और भी जैसे...उसके होंठों पर शोख भरी मुस्कान छा गई और मेरा सारा गुस्सा जैसे आसमान में उड़ गया।

चाय की चुस्कियो के बीच, हंसने-हंसाने के बाद,प्यार भरी बातों के बाद उसने बड़ी सहजता से कहा... भावी! पढ़ाई के साथ-साथ साहित्य, कला संगीत ये सब जीने के साधन हैं, बहाने भी हैं। अच्छा छोड़ो इन प्रसंगों को। एक बात पूछूं भावी? पूछो न।तुम जीवन के हर कदम पर, हर स्थिति में मेरा साथ तो दोगी न? क्यों, विश्वास नहीं होता? मैं झल्ला उठी। आलोक ने सवाल ऐसे गंभीरता से पूछा, जो मुझे कतई अच्छा नहीं लगा। मन ही मन यही सवाल मैंने उससे भी किया, लेकिन इसे शब्द देने से डर लगा। आलोक पर अपने से भी ज्यादा विश्वास था। फिर भी इन प्रश्नों के घेरे में कभी-कभी मैं द्वन्द्व में जीने लगती। इन तमाम स्थितियों के साथ-साथ हम दोनों एक-दूसरे के काफी करीब आ गए। हर शाम हम एक साथ घूमने निकलते और फिर ढेर सारी बातें हो जातीं, कभी शिक्षा और जीवन पर, कभी राजनीति, शिक्षा तो कभी युवा वर्ग की गतिविधियों पर। हां, इनके साथ-साथ निजत्व पर भी गंभीरता से। 

वह खुशनुमा दिन आज भी मुझे याद है। वह मेरे जन्मदिन पर घर आया था। उसे देखते ही मैं खुशी से झूम उठी थी। आलोक मेरे लिए एक गुलदस्ता और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के दो उपन्यास 'पुनर्नवा और 'अनामदास का पोथा उपहार स्वरूप ले आया था। उपहार में किताबें भेंट करना उसे अच्छा लगता। वह हर महीने अपने खर्च से कुछ बचाकर एक-दो किताब जरूर खरीदता। उसी के साथ बहाने मैंने भी न जाने कितनी किताबें पढ़ डालीं।

आज भी उसका दिया उपहार मेरे लिए अनमोल था। आलोक का मेरे घर पर आनाजाना था। एक अच्छे दोस्त के रूप में वह हमारे घर में मान्य था। आलोक घर वालों की नजर में अच्छा था, हर तरह से। वह यहां हॉस्टल में रहता था। परिवार लखनऊ में। पिता जी से अक्सर राजनीति और युवावर्ग की गतिविधियों पर बातचीत होती। कितनी अच्छी लगती थीं वे सारी बातें, जिनका कुछ उद्देश्य होता था। कभी-कभी तर्क-वितर्क में निष्कर्ष नहीं निकलने, पर  चाय की फरमाइश होती और मेरी ड्यूटी थी अदरक वाली चाय बनाने की। जब कभी चाय का कप ह्रश्वलेट में रख कर मैं चाय लाती, आलोक एक शरारत जरूर करता। प्लेट के नीचे हाथ रख वे अपनी उंगली से मेरी उंगलियों को छू लेता। उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान तैर जाती और मैं शरम से जैसे लाल हो जाती। कभी अकेले में इस प्रसंग पर मैं उस पर गुस्सा उतारती तो वह धीरे से बोल उठता, 'वह छुअन, वह स्पर्श प्यार ही तो है।

इसी तरह समय बीत रहा था। घर में मेरी शादी की चिंता बढ़ती जा रही थी। एक दिन पिताजी ने आलोक के समक्ष शादी का प्रस्ताव रख दिया था और लखनऊ जाकर माता-पिता से भी मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। आलोक के अधरों पर मुस्कान तैर गई थी। खुशी में मैंने चुनरी से चेहरे को ढक लिया, ताकि होंठों पर उभरी हंसी को कोई देख न ले। यह स्वाभाविक लज्जा थी।

पिता जी के उठने के बाद आलोक ने अपने बैग से गुलाब का फूल निकाला और मेरे करीब आकर बालों में लगा दिया। मैं तो जैसे खुशी से पागल सी हो उठी। उस दिन मेरा ह्रश्वयार पुष्पित हो गया था। आलोक ने मेरे पास आकर कान में धीरे से कहा- 'हमारे ह्रश्वयार में फूलों की ताजगी और खुशबू हमेशा इसी तरह छाई रहे। अब मैं ढेर सारे सपने सजाने लगी। मैं काफी खुश रहने लगी। मन में दूर, बहुत दूर जाने की इच्छा प्रबल हो उठी। सोचती, दूर कहीं पहाडिय़ों पर आलोक के साथ जाऊं और

जारी...

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