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प्रतीक्षित लम्हा- भाग 2

डॉ. अमरनाथ 'अमर'

9th October 2019

वह उन्हें देख कर कह उठे- 'भावी! कितनी प्यारी है ये पहाडिय़ां और कितनी सुंदर है इन पर बर्फ से ढकी चादर। बिल्कुल तुम्हारी तरह। जी चाहता है बस तुम्हें इसी तरह निहारता रहूं। बड़ा सुख और संतोष है तुम्हारे सौंदर्य को देखने और निहारने में। और मैं मन ही मन पुलकित हो उठती। आलोग ने बताया था कि उसके घर वाले भी शादी के लिए तैयार हैं। यह कहते हुए उसने मेरे मुंह में एक टॉफी डाल दी थी, आधी अपने दांतों से काटकर। फिर हम दोनों मुस्कुराते हुए आगे बढ़ चले थे। एक साथ एक ही डगर पर।

प्रतीक्षित लम्हा- भाग 2

एक बार गर्मी की तपती शाम में उसने कहा भी तो था, इन्हीं रास्तों पर चलते हुए- भावी क्या जानती हो, ये किसके पेड़ हैं? मैंने कहा ऊं...हूं.... पर कितने सुंदर फूल हैं, लाल-लाल और पीले-पीले। बिल्कुल डालियों पर लदे-लदे। है न आलोक। हां भावी, ये लाल-लाल गुलमोहर के और पीले-पीले अमलतास के फूल हैं। गर्मी में सुर्ख रंगत लिए, बिल्कुल तुम्हारी तरह। उसकी बात सुन मैं शरमा गई, जिसे देख वह हौले से मुस्कुरा उठा।

मेरा वक्त हंसी-खुशी में इसी तरह गुजरने लगा था। अब मैं उस दिन का इंतजार करने लगी, जब मेरे हाथों में मेहंदी लगती। पिता जी भी उसी वर्ष शादी के पक्ष में थे। हम दोनों तो तैयार थे ही। आलोक की इच्छा थी कि साथ-साथ एम.ए. और पी-एच.डी करने की। उसने कहा भी तो था- 'भाविका, जीवन के बहुत सारे अधूरे पक्ष हैं, जो तुम्हारे आने से पूर्ण हो जाएंगे... और न जाने क्या-क्या। जो शादी से पूर्व हर नौजवान सोचा करता है। लेकिन कुछ दिनों बाद आलोक कहीं व्यस्त रहने लगा। एक दिन मिलने पर उसने इतना ही कहा था कि वह कुछ परेशान है। घर से खत आया है। स्थिति कुछ ठीक नहीं। कह नहीं सकता कि अचानक ऐसा क्या हो गया, जिससे सब कुछ अनिश्चित हो गया है।

आलोक ने कुछ स्पष्ट नहीं कहा। उसकी परेशानी मेरे लिए घबराहट का कारण थी। कई दिन आलोक से मुलाकात नहीं हुई। शाम की किरणें यूं ही ढलने लगीं। उनमें मेरे लिए कोई आकर्षण नहीं था। ऐसे में इच्छा होती, आलोक कहीं से आता और कह उठता- ये किरणें तो... लेकिन यहां सन्नाटा था और यही मेरी परेशानी का कारण भी। तभी कई दिनों के बाद आलोक मेरे घर आया, अस्त-व्यस्त, परेशान सा। आंखों में जैसे कोई बड़ा राज छिपा था। ललाट पर पसीने की बूंदें। बाल बिखरे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई। मैं घबरा उठी उसे इस हालत में देख कर। तुमने अपना ये क्या हाल बना रखा है आलोक? कहां थे तुम इतने दिन? मैं चिल्ला उठी। लेकिन आलोक स्थिर, गंभीर। भावी! उसने धीरे से कहा।

हां, बोलो ना...।

मैं परेशान हूं। घर से तार आया है। पिता जी के देहांत की खबर...। यह कहते हुए उसकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे।

मैं नहीं जानता था कि इतनी जल्दी...। मुझे तुरंत लखनऊ के लिए निकलना होगा।

तुम मेरा इंतजार करना भावी।

वह तो करूंगी ही आलोक, लेकिन इस दु:ख में अपने-आप को संभालो।

मेरी आंखों से टप-टप आंसू गिर पड़े। समझ में नहीं आ रहा था कि आलोक से और क्या कहूं। अपना ख्याल रखना आलोक। डबडबाई आंखों से मैंने कहा।

आधे घंटे बाद ही लखनऊ के लिए ट्रेन है- आलोक ने कहा। मैंने आलोक को गले से लगा लिया। हिम्मत रखना आलोक। मैं हमेशा इस दु:ख में तुम्हारे साथ हूं। जल्द लौटना।

आलोक ने धीरे से गर्दन हिलाई और दरवाजे की ओर बढ़ गया। आलोक चला गया। मैं रो पड़ी। सब कुछ अचानक इस तरह पलट जाएगा कि मैंने कल्पना नहीं की थी। इस दुखद समाचार से मेेरे घर वाले भी काफी परेशान थे, मगर सभी कितने मजबूर थे।

आलोक के जाने के बाद फूलों में ताजगी नहीं रह गई थी। हवाओं में खुशबू का आभास नहीं था। शाम की किरणें डंसने लगी थीं।

इस तरह वक्त गुजरता रहा। चिंता, चिंतन और घबराहट के बीच महीने दो महीने, साल दो साल कितना भारी रहा, मेरे लिए, कह नहीं सकती। आलोक की कोई खबर नहीं, कोई खत नहीं। आलोक न जाने कहां गुम हो गया था, मुझे भुलाकर।

इस बीच परिस्थितियों ने कितना तोड़ दिया था मुझे। आलोक को भुलाना आसान नहीं था। वह मेरा दोस्त, मेरा ह्रश्वयार है और रहेगा। उसकी तस्वीर मेरी आंखों में बसी हुई है। उसने मेरी नादानी में परिपक्वता भरी, कैसे भूल सकती हूं,, लेकिन अंदर ही अंदर अकेले जैसे टूटने लगी आलोक के बिना। मेरी आंखों में आंसू थे, पर इंतजार भी। गुस्सा भी कि आलोक ने एक झटके में रिश्ते के सारे तार तोड़ दिए। कम से कम पत्र तो लिखना चाहिए था। मन में तरह-तरह की आशंकाएं, भ्रम और अविश्वास भी, फिर भी इसे अस्वीकार करने की दृढ़ इच्छा भी।

आलोक के जाने के बाद घर वालों ने कहीं और शादी की बात चलाई, पर मैंने इस बात को अनसुना कर नकार दिया। किसी और के बारे में मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी। वह मेरे रोम-रोम में बसा हुआ था। उसके बिना जीवन निरर्थक था, लेकिन विपरीत स्थिति में हिम्मत के साथ आगे बढऩे का मूलमंत्र भी तो उसी ने दिया था और यही कारण था कि मैं बिना टूटे उसका इंतजार कर रही थी और अपना कर्तव्य निर्वहन भी।

आलोक के जाने के बाद ही एम.ए. करने के बाद स्थानीय कॉलेज में नौकरी लग गई। आलोक की पढ़ाई के लिए चिंतित थी। पता नहीं उसने कहीं से एम.ए. किया या नहीं। कहीं उसने पढ़ाई ही तो नहीं छोड़ दी। तरह-तरह के ख्याल उभरते और निस्तेज हो जाते।

 

मेरे बारे में लड़कियां कहतीं- बहुत गंभीर टीचर है, लेकिन सच यह है कि इस गंभीरता को मैं अलग नहीं कर पाई। मेरा वक्त लड़कियों को पढ़ाने में, उनकी समस्याओं को दूर करने में गुजरने लगा। शिक्षा और जीवन की सार्थकता की बात अब मैं पूरी तरह समझने लगी थी।

इस तरह उमंग रहित समय की रफ्तार में मैं धीरे-धीरे बहे जा रही थी। आलोक से बिछड़े पांच साल हो गए थे। मेरे अकेलेपन पर कॉलेज में कई तरह की टिप्पणियां होतीं। कई प्राध्यापकों की घूरती नजरों से सामना भी होता, पर मैं इन्हें सहजता से झटक देती।

इन्हीं इंतजार के लम्हों के बीच दो दिन

पूर्व एक अखबार में एक लेख देख कर

चौंक पड़ी।

डॉ. आलोक!

डॉ. आलोक या मेरा बिछड़ा सिर्फ आलोक! मैं मन ही मन बुदबुदा उठी। धड़कन तेज हो गई। घबराहट से पसीने-पसीने हो गई। अतीत की ओर पलटते ही न जाने कितनी तस्वीरें प्रतिबिंबित हो उठीं। मेरे कुंवारे सपने अंगड़ाई लेने लगे। स्वयं को स्थिर किया, पर आंसुओं को बहने से न रोक सकी।

आलोक की तस्वीर के साथ उसका लेख छपा था- 'राष्ट्रीय चरित्र, युवा वर्ग और रचनात्मक कार्यÓ मैं लेख को पढ़ती गई... पढ़ती ही गई। आलोक की तस्वीर को निहारती...निहारती ही रही।

लेख में छपे परिचय से स्पष्ट हो गया कि आलोक दिल्ली के एक कॉलेज में प्रोफेसर है। मेरे मन में अब बहुत तरह की आशंकाएं उभरने लगीं। आलोक ने तो अब घर भी बसा लिया होगा। कैसे भूल गया वह... क्या ह्रश्वयार भी इतना छलावा हो सकता है? मेरा सुख-चैन लुट चुका था। बेचैनी बढ़ गई थी। काश! यह लेख नहीं पढ़ती काश...

इतना कुछ हो गया और मैं अनजान रही, इस कदर ठुकराया आलोक ने मुझे। यह अजीब सी तड़प थी। उसे भूलना मुश्किल और उसके इस अपरिचित परिचय को स्वीकार करना कठिन। दिन गुजारना भयंकर तो काटनी रात प्रलयंकर। क्या करूं, कहां जाऊं कि चैन मिले... आराम मिले। जीने की सारी इच्छाएं समाह्रश्वत।

तभी आज मेरे नाम का एक खत घर के पते पर पोस्टमैन दे गया। पते पर अंकित अक्षर परिचित से लगे। प्रेषक-आलोक। हां यह तो आलोक का ही पत्र है। धड़कन फिर बढ़ गई। क्या होगा खत में? सफाई होगी, नया घर बसा लेने का समाचार होगा, उसे भूल जाने की सलाह होगी, पता नहीं क्या होगा, डरते-डरते लिफाफे को फाड़ा। तेज धड़कनों के बीच स्थिर हो पत्र को पढऩे लगी-

भावी!

मैं माफी के लायक तो नहीं, पर हो सके तो माफ कर दो। मैंने तुम्हारा दिल बहुत दुखाया है। मैं घर-परिवार में हालात से कितना परेशान था, बता नहीं सकता हूं। मेरी खामोशी मजबूरी से ज्यादा, मेरी आवश्यकता बन गई थी। मैं तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं भूला हूं भावी। मेरे जीवन के अंधेरे में तुम्हारी यादें चांदनी थी। मेरी खामोशी मजबूरी से ज्यादा खामोशी, बन गई थी। उस वक्त कुछ था भी तो नहीं, जो इन चार वर्षों में जीवन में इतने उतार-चढ़ाव आए, जिन्हें अभिव्यक्त करने में असमर्थ हूं। कई बार इच्छा हुई कि दौड़कर आ जाऊं तुम्हारे पास, लेकिन खाली हाथ! ऐसा मैं नहीं चाहता था। कई बार चाहा खत लिख दूं, लेकिन लिखने को कुछ था भी तो नहीं, इसलिए खामोश था। पिता जी के निधन के बाद रिश्ते-नातों ने मुझे सड़क पर ला खड़ा कर दिया। घर छूटा, घर-बार छूटा। बिल्कुल सड़क पर था। अगर मेरे दोस्तों ने सहारा न दिया होता तो शायद मैं... रिश्ते-नातों की परिभाषा से मैं इतना डर गया था कि मेरे मन में बार-बार सवाल उठता था कि क्या तुम मेरी इस दयनीय स्थिति में मुझे स्वीकार कर पाओगी। बस यही डर था, यही आशंका थी और इसी कारण मैं अकेले ही इस संघर्ष पथ पर चल पड़ा था। मेरे पास किसी के लिए शब्द नहीं थे, इसलिए खामोश हो गया था, मेरे जीवन और दिलो-दिमाग में तुम्हारे सिवा कोई न था, यही सच है। ह्रश्वलीज मेरी खामोशी को गलत न समझना। हो सकता है तुम्हारी नजर में यह मेरा अपराध हो तो अपना जान कर माफ कर देना। मैं नहीं जानता तुम किस हाल में होगी, लेकिन तुम मेरी जिंदगी हो, यही सच है। जाने क्यों आज भी पूरा विश्वास है, जैसे तुम्हें मेरा इंतजार है। एक लंबे संघर्ष के बाद भावी हमारा पथ तैयार हुआ है। मंजिल झिलमिलाने लगी है। मैंने तुम्हारे लिए एक छोटा-सा घरौंदा भी तैयार कर लिया है। अब इंतजार है तो बस तुम्हारा ही। और सुनो, तुम्हारी चूडिय़ों की खनक का भी। ऐ, अब तो खुश हो न?

भूल के लिए माफ कर दो न। मैं अगले मंगलवार को तुम्हारे पास आ रहा हूं। विशेष मिलने पर।

तुम्हारा आलोक।

खत पढ़ते-पढ़ते न जाने कितनी बूंदें आंसू टपक पड़े। चार वर्ष बाद ऐसे आंसू बहे थे, खुशी के आंसू। इन आंसुओं के साथ बहुत सारा गुस्सा, डर, चिंता, आशंका... सब बह गए। इतना निश्चिंत मैंने अपने-आप को कभी नहीं पाया था।

शाम ढलने लगी थी, लेकिन आज इस शाम की लाल किरणों में ढेर सारी तस्वीरें बोल उठीं, जिंदगी की शिक्षा की, ह्रश्वयार की, सार्थकता की। घर से मैं न जाने कितने ख्यालों में खोई गंगा की ओर चल पड़ी।

शाम ढल गई, तारे झिलमिलाने लगे। मैं घर लौट आई। आज रात के अंधेरे में भी लगा, जैसे उम्मीद और खुशियों के लाखों दीप जगमगा उठे हैं। प्रतीक्षित लम्हों का अंधेरा छंटने लगा और मेरी आंखें इंतजार करने लगीं कल के नए सूरज का।

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