प्रतीकों का पर्व दीपावली

मीना भण्डारी

10th November 2015

शुभ-लाभ या क्षेम-लाभ नामक इन बालकों को महाशक्तिस्वरूपा पार्वती जी का तथा देवाधिदेव महादेव शंकरजी का प्रेम स्नेह एवं आशीर्वाद तो प्राप्त था ही, साथ ही अपनी दोनों माताओं सिद्धि तथा बुद्धि का रूपसौंदर्य तथा गुण प्राप्त हुआ।

 

प्रतीक
दीपावली के शुभागमन से तो जैसे संपूर्ण वातावरण अपने आप ही जगमगा उठता है। हल्की गुलाबी ठंड के इस मौसम में हर कोई एक नई स्फूर्ति महसूस करता है जिससे हर्षोल्लास भरे इस त्योहार को जोर-शोर से मनाने को भी खुद-ब-खुद मचल उठता है। हफ्तों पहले से ही हम लोगों के मन मस्तिष्क में लक्ष्मी-गणेश, कमल, स्वास्तिक, ओम, दीया, कलश-पल्लव, शुभ-लाभ इत्यादि की छवियां उभरने लगती है। इन सबका अपना-अपना प्रतीकात्मक महत्त्व भी है।

लक्ष्मी और गणेश
यह जगत प्रसिद्ध है कि धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी तथा शांति के देवता गणेश हैं। साथ-ही-साथ जहां शांति होती है वहां धन की देवी लक्ष्मी अवश्य वास करती हैं, लेकिन फिर भी दीपावली की रात को लक्ष्मी-गणेश की उपासना कर शांति और धन-वैभव दोनों को आमंत्रित किया जाता है। इस तरह लाल कपड़े में लिपटी लक्ष्मी पूजन का अर्थ ऐसी देवी के आह्वान से है जो दानी, साहसी, रक्षा करने वाली और बुराइयों के नाश की शक्ति रखने वाली है।

कमल
कमल तो लक्ष्मी जी का प्रिय पुष्प है। इस तरह लक्ष्मी जी की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए इन्हें कमल पुष्प अवश्य चढ़ानी चाहिए। साथ ही साथ कमल इसका प्रतिनिधित्व भी करता है कि जिस तरह वह कीचड़ में खिलकर भी सबको अपनी ओर आकर्षित करता है, वैसे ही हम लोग भी अपने सुकर्मों से सबको अपनी ओर आकर्षित करें अर्थात् भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बनें।

स्वास्तिक
स्वास्ति का अर्थ है 'क्षेम, शुभ, मंगल तथा कल्याण और क का अर्थ है 'करने वाला। इस प्रकार स्वास्तिक का अर्थ है- कल्याण करने वाला। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामण्डल का चिह्नï ही स्वास्तिक होने के कारण स्वास्तिक देवताओं का प्रतीक है, इसलिए समस्त शास्त्रों में स्वास्तिक को शुभता और सकारात्मक ऊर्जा प्रदायक बताया गया है। ऐसा कोई भी मांगलिक कार्य नहीं है शुभ-लाभ या क्षेम-लाभ नामक इन बालकों को महाशक्तिस्वरूपा पार्वती जी का तथा देवाधिदेव महादेव शंकरजी का प्रेम स्नेह एवं आशीर्वाद तो प्राप्त था ही, साथ ही अपनी दोनों माताओं सिद्धि तथा बुद्धि का रूप सौंदर्य तथा गुण भी प्राप्त हुआ। जो स्वास्तिक की रचना के बिना पूर्ण होता हो। इस तरह सभी त्योहार, व्रत, पर्व, पूजा एवं हर मांगलिक अवसर पर सामान्यतया रोली, सिन्दूर या कुमकुम से बनाया जाता है। यह परम शुभता का प्रतीक अनादिकाल से विद्यमान होकर संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। सभ्यता और संस्कृति के पुरातन लेख केवल हमारे वेद और पुराण ही हैं और हमारे ऋषि-मुनियों ने उनमें स्वास्तिक का भान प्रस्तुत किया है। पुण्याहवाचन तथा स्वास्तिवाचन में आशीर्वाद मंत्र इस प्रकार है-

आयुष्मते स्वस्ति, आयुष्मते स्वस्ति, आयुष्मते स्वस्ति।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धक्षभा: स्वस्तिन: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दघातु।।

स्वास्तिक की चार भुजाओं में विद्यवान प्रतीक रूप चार देवताओं से मानव-कल्याण हेतु इस प्रकार प्रार्थना की जाती है। सब ओर विद्यमान सुयशवाले इन्द्र, संपूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा, अरिष्टों को मिटाने हेतु चक्र के समान शक्तिशाली गरुण एवं बुद्धि के स्वामी बृहस्पति जनमानस के कल्याण की वृद्धि करें। इस स्वास्तिक से 100000 सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

 

 

ओम
ओम का हिन्दू धर्म में बड़ा महत्त्व है। यह प्रतीक ब्रह्मा, जो हर जगह, हर समय उपस्थित और जीवन का प्रमाण है, को अभिव्यक्त करने वाला पवित्र शब्दांश है। ओम आत्मिक बल देता है। इसके उच्चारण से जीवनशक्ति ऊध्र्वगामी होती है। इसके सात बार के उच्चारण से शरीर के रोग के कीटाणु दूर होने लगते हैं एवं चित्त से हताशा निराशा भी दूर होती है। यही कारण है कि ऋषि-मुनियों ने सभी मंत्रों के आगे ऊँ जोड़ा है। जैसे- ऊँ नम: शिवाय,ऊँ गणेशाय नम:, ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय, ऊँ भूर्भुव: स्व:, इत्यादि इस तरह यह सकारात्मक ऊर्जा प्रदायक हिन्दू, इस्लाम तथा सिख धर्म में विद्यमान होने के साथ-साथ हम लोगों के जन्म से भी जुड़ा है अर्थात् जन्म लेते ही सर्वप्रथम को ?वां...?वां...?वां करता है। इस तरह अकार, उकार और मकार युक्त ? ही समस्त शब्दों की बुनियाद है।

 

दीया
दीया प्रकाश का प्रतीक है। दीया के सच की अनुभूति को पाए बिना जीवन के अवसाद और अंधेरे को सदा सर्वदा के लिए दूर कर पाना कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी है। दीये का सच उसके स्वरूप में है। दीया भले ही मरणशील मिट्टी का है, परन्तु ज्योति ही अमृतमय आकाश की है। जो धरती का है, वह धरती पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो निरंतर आकाश की ओर भागी जा रही है। ठीक दीये की ही भांति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किंतु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीये में जलने वाली अमृत ज्योति है। हालांकि अहंकार के कारण वह इस मिट्टी की देह से ऊपर नहीं उठ पाती है। आत्मा की ज्योति जलते ही हम लोगों में स्नेह, सौहार्द, ममत्व, इंसानियत जागृत होगी और अपना-पराया, उच्च-नीच का भेद-भाव समाप्त हो जायेगा।

 

कलश-पल्लव
पुराण कुंभ कहा जाने वाला पानी से भरा और आम की पत्तियों से ढंका मिट्टी का घड़ा, उसके ऊपर अनाज से भरा ढंकना और उसके ऊपर रखा नारियल को पूजा शुरू करने से पूर्व आमतौर पर मुख्य देवी-देवता को निकट स्थान दिया जाता है। इन सबके पीछे ऐसी मान्यता है कि हरे रंग का आम्र पल्लव मन की शांति, प्रसन्नता और स्थिरता का प्रतीक है तो पानी से भरा मिट्टी का कलश और अनाज से भरा ढंकना, धन-वैभव और अनाज का।

श्री, शुभ-लाभ, फल और पत्तियां
इस तरह दीपावली में श्री, शुभ-लाभ और फल-पत्तियों का ही बड़ा महत्व है। श्री और शुभ-लाभ तथा रिद्धि-सिद्धि भी लक्ष्मी सूचक शब्द है। इसी तरह नारियल, पान, सुपारी, कसैली, दही, नारियल इत्यादि का भी लक्ष्मी पूजा के अंतर्गत विशेष महत्त्व है। तभी तो इनके बिना लक्ष्मी-पूजा की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जहां तक नैवेद्य या प्रसाद का प्रश्न है तो इसके लिए पका केला और लड्ïडु तथा खील-बताशे को विशेष मान्यता प्राप्त है। साथ ही साथ लोग यह मानते हैं कि पटाखा फोडऩे से घर में छिपी दरिद्रता भागती है तथा लक्ष्मी का प्रवेश होता है।

 

क्या अर्थ है शुभ-लाभ का?
शुभ-लाभ का शाब्दिक अर्थ वही है जो आप समझते हैं। किन्तु दो बातें आपको सोचनी होगी। पहली यह कि सभी देवताओं से हम अपने शुभ लाभ की प्रार्थना करते हैं, परंतु उनके साथ या उनके नाम के आगे-पीछे शुभ-लाभ क्यों नहीं लिखते। यहां तक की लक्ष्मी जी जो ऐश्वर्य की देवी ही मानी जाती हैं उनके नाम के साथ शुभ-लाभ नहीं जोड़ते। अत:  के साथ शुभ-लाभ जोडऩे का विशेष कारण अवश्य होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि प्रत्येक देवाधिदेव के साथ में उनकी शक्ति, प्रिया अथवा भार्या यानी पत्नी का नाम उनके नामों के पूर्व या बाद में जोड़ते हों कि पार्वती नंदन श्रीगणेशजी की एक नहीं दो पत्नियां हैं। पुरोहित गणपति पूजन कराते समय प्राय: उच्चारण करते हैं, 'सिद्धि बुद्धि सहिताय महागणाधिपतये नम:। किंतु उनमें से शायद ही कोई जानता हो कि उक्त कथन का वास्तविक अर्थ क्या है। आप पूछेंगे तो बता देंगे कि सिद्धि तथा बुद्धि को प्रदान करने वाले महागणेश को नमस्कार करता हूं। यह पूर्ण अर्थ नहीं है और न हो सकता है। अब तक आपने नहीं जाना तो अब आप जान लें कि श्रीगणेश जी को दो पत्नियां हैं और दोनों सगी बहनें हैं। उनमें से एक का नाम सिद्धि और दूसरी क नाम बुद्धि है। अब शुभ-लाभ शब्दों को केवल गणेशजी के नाम के साथ ही क्यों प्रयुक्त किया जाता है यह भी समझ लें। श्री गणेश जी की दो पत्नियां हैं तो उनके दो पुत्र भी हैं। एक का नाम क्षेम है और दूसरे का नाम लाभ है। क्षेम का ही नाम शुभ हुआ। वैसे भी क्षेम का अर्थ कुशलता, रक्षा करना रक्षा होना, शुभत्व है। वहीं गणेशजी के एक पुत्र क्षेम ही शुभ हैं और एक पुत्र लाभ है। कहीं कहीं क्षेम-लाभ या लाभ-क्षेम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।


सारांश में शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार जब गणेशजी को विवाह करने की इच्छा हुई और उनके माता-पिता पार्वती-शंकरजी ने इस विषय पर गंभीरता से विचार किया तो प्रजापति विश्वरूप ने अपनी दिव्यस्वरूपा, सर्वांग शोभना, सिद्धि तथा बुद्धि नामक दोनों कन्याओं से श्रीगणेश जी का विवाह कर दिया गणेशजी की उन दोनों पत्नियों से एक-एक दिव्य पुत्र हुए। उनमें से सिद्ध नामक पत्नी से क्षेम पुत्र पैदा हुआ और बुद्धि नामक पत्नी से लाभ नामक पुत्र पैदा हुआ। ये दोनों पुत्र अत्यंत योग्य एवं सर्व सुख प्रदान करने वाले हुए।पिता श्री गणेश रुद्रगणों मे गणाध्यक्ष थे और अत्यंत पराक्रमी थे, अत: उनकी शक्ति पराक्रम एवं वीरत्व भी प्राप्त होना स्वाभाविक था। अत: ये दोनों क्षेम तथा लाभ नामक गणेश के पुत्र उन्हें परमप्रिय हैं। यही कारण है कि 'सिद्धि-बुद्धि, संहिताए महागणाधिपतये नम: के साथ प्रत्येक शुभ अवसर पर दुकानों, तिजोरियों, बही-खातों आदि में शुभ-लाभ लिखा जाता है। इस प्रकार उपरोक्त विवरण से आप समझ सकते हैं कि शुभ-लाभ का अर्थ क्या होता है और इसका हमारे धर्म में कितना अधिक महत्त्व है।

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