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मुझे माफ़ कर देना- भाग 1

सुभाष नीरव

11th October 2019

डाक में कुछ चिट्ठियाँ आई पड़ी हैं। निर्मल एकबार उन्हें उलटपलट कर देखती है, पर पढऩे को उसका मन नहीं कर रहा। वह जानती है कि ये सभी चिट्ठियाँ पाठकों की तरफ से ही आई हैं, जो नि:संदेह अभी हाल ही में एक पत्रिका में छपे उसके आत्मकथा-अंश को लेकर ही होंगी। अधिकांश में उसकी तारी$फ होगी, कुछ में उसके साथ सहानुभूति दिखाने की कोशिश की गई होगी और हो सकता है, एक-आध चिट्ठी में आलोचना भी हो। पता नहीं क्यों, आजकल पाठकों के आए खतों को वह उतनी बेसब्री से नहीं पढ़ती जितनी बेसब्री से पहले पढ़ा करती थी। उसकी रचना पर यदि कोई खत आता था तो वह सारे काम छोड़कर उसे पढऩे बैठ जाया करती थी। कई-कई बार पढ़ती थी, खुश होती थी। दिनभर एक नशा-सा तारी रहता था उस पर।

मुझे माफ़ कर देना- भाग 1

वह उन चिट्ठियाँ का जवाब भी देती थी। पर अब उस तरह की उमंग उसके अंदर जैसे शेष ही नहीं रही थी। निर्मल उठकर खिड़की के पास जा खड़ी होती है। खिड़की के पार एक टुकड़ा नीला आकाश कैनवस की तरह फैला हुआ है। कहीं- कहीं उड़ान भरते परिन्दे इस आकाश में एक लकीर-सी खींचते प्रतीत होते हैं। करीब बीस वर्ष हो गए निर्मल को भी कागज के आकाश पर शब्दों के परिन्दे उड़ाते हुए। कई कहानी संग्रह, कविता संग्रह, कितने ही उपन्यास और अब वह अपनी जि़ंदगी के सफे खंगाल रही है।

उम्र के इस पड़ाव पर वह अपनी आत्मकथा लिख रही है जिसका एक अंश हिंदी की एक प्रसिद्ध पत्रिका में अभी हाल में प्रकाशित हुआ है। उसकी नज़र फिर से मेज़ पर पड़ी चिट्ठियाँ पर पड़ती है। उसको लगता है, मानो मेज़ पर पड़ी चिट्ठियाँ उसको अपनी ओर खींच रही हों। वह छोटे-छोटे पैर उठाती मेज़ के पास आ खड़ी होती है। चिट्ठियों के ढेर को एकबार फिर उलट-पलटकर देखती है। अचानक एक लिफाफे पर उसकी दृष्टि स्थिर हो जाती है। लिफाफे के बाहर भेजने वाले का नाम पढ़कर वह सोच में पड़ जाती है। उसके हाथ तेज़़ी से लिफाफा खोलते हैं। इतना लम्बा खत! यह तो उसकी कालेज की सखी रंजना का खत है। वह कुर्सी पर बैठ जाती है। कांपती उंगलियों में पकड़ा हुआ खत वह बेसब्री से पढऩा शुरू करती है 

प्रिय निर्मल,

अरे, तू तो बहुत बड़ी लेखिका बन गई। तेरी एक दो कहानियां मैंने पहले भी पढ़ी थीं, न जाने किस पत्रिका में, पर मुझे नहीं पता था कि उन कहानियों की लेखिका मेरी सखी निर्मल ही है। यह तो मुझे उस पत्रिका से पता चला जिसमें तेरी आत्मकथा तेरे परिचय और चित्र के साथ छपी हुई है। सच पूछो तो मैं तो यूं ही वक्तकटी के लिए इस पत्रिका के पन्ने पलट रही थी कि तेरी फोटो पर मेरी निगाहें रुक गईं। फिर तेरी आत्मकथा को पढ़े बगैर रह न सकी। पढ़ लेने के बाद मैं पूरी रात बेचैन रही। नींद पता नहीं कहां रास्ता भूल गई थी। मुझे तेरे संग बिताये वे दिन याद आते रहे। वो कालेज के दिन मेरी आंखों के सामने जैसे पुनर्जीवित हो उठे हों। तूने अपनी आत्मकथा में कालेज के दिनों को स्मरण किया है, मुझे और रवीन्द्र को याद किया है। रवीन्द्र और मुझे तूने जिस प्रकार पेश किया है, वह तेरा सच है। पाठकों को भी वह सच ही लगेगा। परंतु क्या तू सचमुच नहीं जानती कि तेरे साथ क्या हुआ था? या तू जान बूझकर उस सच को आंखों से ओझल किए रखना चाहती है। 

रवीन्द्र और मेरी तस्वीर तूने अपनी आत्मकथा में जिस प्रकार प्रस्तुत की है, क्या वह तस्वीर सच के बहुत करीब है? निर्मल... हमने एम.ए.(हिंदी) एक साथ ही की थी। हम दोनों ने दो वर्ष कालेज के हॉस्टल के एक ही कमरे में इक_ा ही बिताये थे। हम अच्छी सहेलियां थीं, एक-दूजे को ह्रश्वयार करती थीं। हमारे बीच लड़ाई-झगड़ा भी होता था। पर जितना मैंने तुझे समझा है, तू शुरू से ही एक चुप और गुमसुम-सी रहने वाली लड़की रही है। तूने कभी प्रतिवाद करना सीखा ही नहीं। जो तुझे मिल गया तो ठीक, नहीं तो सब्र कर लिया। अपना दर्द, अपना दु:ख, अपनी पीर, तू अपने अंदर ही जज़्ब करती रहने वाली स्त्री है। शायद, इसी जज़्ब किए दर्द ने तेरे हाथों में कलम दे दी और तू मुंह से न बोलकर अपने शब्दों से उन्हें जुबान देती रही। मुझे लगता है, तू आज भी वैसी ही है, जैसे पहले थी। पर मैं बचपन से ही ऐसी लड़की नहीं थी। मैंने चुप रहना कभी सीखा ही नहीं। अपनी बात चीख-चीखकर कहना, अपनी हर बात को लोगों से मनवाना मेरी आदत का एक अहम हिस्सा रहा है। जो चीज़ मुझे पसंद आ जाती, उसको हासिल करना मेरी मज़बूरी बन जाता। यदि मेरी पसंदीदा वस्तु मुझे आसानी से नहीं मिलती तो मैं उसे छीन लेने की हद तक पहुंच जाती और छीन भी लेती। बचपन में बहन-भाइयों से छीन लिया करती थी। बड़ी हुई तो सहेलियों से छीन लेना मेरी आदत थी। मैं यह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाती थी कि जिसको मैं पसंद करती हूं, जो मैं चाहती हूं, वह चीज़ कोई दूसरा ले जाए। मेरी इस आदत से तू भलीभांति वाकिफ है। तेरी कोई भी चीज जो मुझे अच्छी लग जाती थी, पसंद आ जाती थी, मैं तेरे से मांगती नहीं थी, छीन लेती थी। चाहे वह तेरा पेन हो, तेरा हेयर-क्लिप हो, सूट हो या फिर जूती। तू कई बार एक दो दिनों के लिए मुंह फुला लिया करती थी, परंतु मुंह से कोई प्रतिवाद नहीं करती थी। कभी लड़कर अपनी चीज़ वापस नहीं ली। तेरे मुंह में जैसे जुबान ही न हो। निर्मल...मैं कईबार सोचती थी कि तू कैसी लड़की है। इसी बीच, हमारी जि़ंदगी में रवीन्द्र आ गया। एक सुंदर, खूबसूरत नौजवान। मेरी बड़ी बहन की एक सहेली का छोटा भाई। पता नहीं, उसकी देह में कैसी खुशबू थी कि मैं पहली ही नज़र में उसकी हो गई। सोते-जागते उसका नशा मेरे पर तारी रहता। हर वक्त उसकी सूरत मेरी आंखों के सामने रहती। वो जब भी मेरे साथ बात करता, मैं किसी दूसरी ही स्वप्नमयी दुनिया में पहुंच जाती। वह मेरे संग इतना खुल गया था कि हम आपस में हर प्रकार की बातें कर लेते थे। वो बातें भी जो समाज में वर्जित कही जाती हैं।

जारी...

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