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मुझे माफ़ कर देना- भाग 2

सुभाष नीरव

12th October 2019

फिल्म और साहित्य को लेकर वह अक्सर बातें करता था। विशेषकर वे बातें जो स्त्री-पुरुष के बीच की अंतरंग बातों को व्याख्यायित करती थीं। मेरे भीतर एक औरत भूखी रहने लगी थी। मैं उसकी भूख को कुचलने की कोशिश करती, तो वह और अधिक भड़क उठती। मैं सोचती कि वह भूख रवीन्द्र के सानिध्य में कम हो जाएगी, उसके स्पर्श से वह शांत हो उठेगी, पर ऐसा न होता। वह और अधिक तेज़ हो जाती। फिर सोचती, रवीन्द्र्र की अनुपस्थिति में यह भूख शांत हो जाएगी, पर जब वह मेरे करीब न होता तो इस भूख को जैसे दौरा-सा पड़ जाता। मुझे वह रवीन्द्र के पास दौड़ा ले जाना चाहती। अभी मैं अपने भीतर की औरत की इस भूख से दो-चार हो ही रही थी कि मुझे यह अहसास होने लगा कि रवीन्द्र की दिलचस्पी मुझमें खत्म होती जा रही है, वह अब तेरी तरफ झुक रहा है।

मुझे माफ़ कर देना- भाग 2

जब वह मुझसे मिलने आता था, मुझे लगने लगता कि वह मुझे नहीं, मेरे बहाने तुझे मिलने आता है। उसकी नज़रें अब मुझे नहीं तलाशती थीं। वह अब तेरे में दिलचस्पी लेने लग पड़ा था। यह बात अलग है कि वह अभी भी मुझसे उसी प्रकार खुल कर बातें किया करता था। यह मेरे लिए असहनीय था, कतई असहनीय निर्मल... मुझे यह बिल्कुल मंजूर नहीं था कि वह मुझे इग्नोर करके तेरे संग बातें करें। फिर, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे तू भी उससे प्रेम करने लग पड़ी थी। वह आता तो तेरा चेहरा खिल उठता। तू अधिक से अधिक उसके संग रहना चाहती थी। मुझे लगा मानो तू मेरे से मेरी ह्रश्वयारी चीज़ को छीन लेना चाहती है। 

मैं रवीन्द्र को पूरा का पूरा हासिल करना चाहती थी। मेरे भीतर की औरत पागल हुई बैठी थी। मैंने तेरे बारे में रवीन्द्र से क्या-क्या झूठ नहीं बोला। तेरे चरित्र को दागी बताया। तेरी बुराइयां की। कालेज के कितने ही लड़कों के संग तेरे संबंध है, रवीन्द्र को मैं बताती रही। मैं चाहती थी कि रवीन्द्र तेरे साथ कोई रिश्ता न रखे। तेरे साथ बात न करे। परंतु, आहिस्ता-आहिस्ता मुझे पता चला कि मैं जो बात रवीन्द्र को तेरे बारे में बताती थी, वह सब की सब तुझे बता देता था। पर तूने कभी इस बारे में मेरे साथ बात नहीं की। न ही कोई झगड़ा किया, न रूठी, न रोई, न कलपी।

निर्मल... तूने अपनी कहानियों, अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने दु:ख लोगों से साझे करने की राह खोज ली। तुझे प्रारंभ से ही साहित्य में रुचि रही थी। हिंदी साहित्य ही नहीं, दूसरी भारतीय भाषाओं का साहित्य भी तू लाइब्रेरी से इशु करवाकर पढ़ती रहती थी। तेरे पास आज एक भाषा है, एक शैली है, एक ढंग है अपनी बात अपनी कलम के माध्यम से कहने का।

पर, मेरे पास तेरे जैसी न भाषा है, न शैली है, न मुझे लिखने का कोई ढंग आता है, पर मैं इस खत के जरिये तेरे साथ अपना दु:ख ही नहीं, एक सच...कड़वा सच भी साझा करना चाहती हूं। निर्मल...मैंने तुझे ही नहीं, रवीन्द्र को भी धोखा दिया। पर आज लगता है, धोखा तो मैंने अपने आप को भी दिया था। मैं रवीन्द्र को हर हाल में अपना बनाना चाहती थी, उसकी हो जाना चाहती थी। मैं चाहती थी कि वह मेरा रहे, पूरा का पूरा। मैं बाजी हारना नहीं चाहती थी। हमारे एम.ए. फाइनल के पेपर हो चुके थे। 

एक दिन मैंने रवीन्द्र से कहा कि मेरी कोख में उसका अंश पल रहा है। उसके पैरों तले से जैसे धरती खिसक गई हो। वह घबरा गया। मैंने उससे कहा कि यदि वह महीने के अंदर-अंदर मेरे साथ विवाह नहीं करेगा तो मैं यह बात अपने परिवार में बता दूंगी और खुद ज़हर खा लूंगी। रवीन्द्र मेरी धमकी से डर गया। जो तीर मैंने चलाया था, वह ठीक निशाने पर लगा था। उसने चुपचाप मेरी बात मान ली। मेरे माता-पिता और भाइयों ने रवीन्द्र को लेकर कोई एतराज़ नहीं किया। शायद इसके पीछे रवीन्द्र का एक अच्छे परिवार से होना रहा हो या फिर उसके परिवार के सफल कारोबार का होना एक कारण रहा हो। मैं खुश थी। हवा में उड़ रही थी। मेरे पैर धरती पर नहीं पड़ रहे थे। मेरे सपने सच होने जा रहे थे। यह वो खुशी थी जिसे मैं तब तुझसे शेयर करना चाहकर भी शेयर नहीं कर पा रही थी।

जारी...

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