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शिल्पकला के जनक-विश्वकर्मा

- प्राची प्रवीन माहेश्वरी

24th November 2015

विश्वकर्मा जिनको देव वास्तु शिल्पी कहा जाता है ये अंगिरा वंश के भुवन पुत्र थे इन्हें वैदिक सौर देवता भी कहते हैं।

शिल्पकला के जनक-विश्वकर्मा


पर्वोत्सव
ब्रह्मांड की रचना भी विश्वकर्मा जी के हाथों से हुई है। ऋग्वेद के 10वे अध्याय के 121वे सूक्त में लिखा है कि विश्वकर्मा जी के द्वारा ही धरती, अंबर जल आदि की रचना की गई है। कहते हैं जब भी वे किसी चीज का निर्माण करते थे तो उनके पांच पुत्र मनु, माया, त्वस्त, शिल्पी, देवगण उनको अपना सहयोग देते थे। इनके पांचों पुत्रों को पांचाल भी कहा जाता है। विश्वकर्मा पुराण के 35वें अध्याय में उनके जीवन व परिवार संबंधी पूरी विस्तृत जानकारी दी गई है। शास्त्रों, वेदातों में उन्हें सृष्टिकर्ता प्रजापति, सवंत्सर, परमात्मा कहा गया है विश्वकर्मा पुराण में कहा गया है कि आदि नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की। श्री नारायण ने ही विश्वकर्मा जी को आदेश दिया के वे संपूर्ण ब्राह्मांड की रचना करें। इसके लिए ब्राह्मांड जी ने ब्राह्मांड को 14 भागों में बांटा जिसमें सात भाग पाताल लोक के थे, पाताल लोक में नागलोक, दैत्यलोक, यक्षलोक व  ब्राह्मांड में भूलोक, स्वर्गलोक, नरक लोक प्रमुख थे।
विश्वकर्मा जी की सहायता से ही ब्राह्मांड जी ने पांच ज्ञानेंदियों व मानव पशु, पक्षी, जीव, जन्तुओं की रचना की ताकि धरती पर जीवन का चक्र चल सके। उन्होंने ही देवताओं के विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों, गहने, विमान आदि की भी रचना की। इतना ही नहीं विश्वकर्मा जी ने ही समय-समय पर प्राय: प्रत्येक युग में अलग-अलग महत्त्वपूर्ण  रचनाएं रचि जो कि इस प्रकार हैं-
त्रेता युग में- विश्वकर्मा जी ने भगवान शंकर व माता पार्वती के लिए लंका की रचना की। लंका की विशेषता थी कि ये सोने से बनी थी। ग्रह प्रवेश के लिए शंकर जी ने रावण की योग्यता को देखते हुए उसे पुरोहित का कार्य करने के लिए बुलाया। पूरी पूजा- अर्चना कराने के बाद जब रावण वापस जाने लगा तो भगवान शिव ने अत्यन्त प्रसन्न मन से रावण से कुछ मांगने के लिए कहा दक्षिणा रूप में तब रावण ने भोलेनाथ से दक्षिणा में सोने की लंका ही मांग ली। भगवान शिव ने अपना वचन निभाया और दक्षिणा रूप में खुशी-खुशी रावण को लंका दान में दे दी। सतयुग में- विश्वकर्मा जी ने ही दशरथ जी के अनुरोध पर ही रानी कैकेयी के लिए कनक महल की रचना की ये महल बहूमूल्य हीरे, पन्ने, माणिक आदि से बना था। जिसे बाद में रानी कैकेयी ने अपनी प्रिय पुत्रवधू माता सीता को मुंह दिखाई में उपहार स्वरूप दिया था। आज भी अयोध्या में इस महल के अवशेष मिलते हैं। द्वापर युग में- विश्वकर्मा जी ने भगवान कृष्ण के लिए द्वारका नगरी का निर्माण किया था यह नगरी समुद्र के केंद्र में 96 वर्ग मील क्षेत्र में बसी हुई थी। बाद में ये नगरी स्वयं ही समुद्र में समा गई। आज  इसके अवशेष प्राप्त हो रहे हैं जो ये प्रमाणित करते हैं कि है विश्वकर्मा जी द्वारा निर्मित द्वारका नगरी कितनी सुंदर थी। द्वापर के अंत में ही विश्वकर्मा जी ने भगवान श्री कृष्ण के अनुरोध पर ही पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ नगरी बसाई, वो इतनी सुंदर थी कि दुर्योधन के मन में भी उसे पाने के लिए लालच आ गया। वहां जल के स्थान पर थल और थल के स्थान पर जल का आभास होता था, इतना ही नहीं और ना जाने कितने अचरज भरे नजारे थे। वहां दुर्योधन के गलत आभास करने पर ही द्रौपदी ने कटाक्ष भी यही ही कसा था कि अंधे के पुत्र तो अंधे ही होते हैं। दुर्योधन के हृदय में ये शब्द विष बुझे बाण की तरह जा घुसे और महाभारत जैसे महाविनाशक युद्ध की नींव बनें।
युद्ध के उपरांत ही जब चारों तरफ त्राहि-त्राहि मच गई और पूरीहस्तिनापुर नगरी भी अस्त व्यस्त हो गई तब भगवान श्रीकृष्ण के अनुरोध पर ही विश्वकर्मा जी पुन: हस्तिनापुर नगरी का पुननिर्माण  किया।

विश्वकर्मा जी के शिल्प में गजब की अलौकिकता थी इनको ही सभी प्रकार की शिल्पकला का जनक भी माना जाता है कोई भी भवन निर्माण करने से पूर्व शिल्पी आज भी विश्वकर्मा जी की पूजा भी करते हैं व उनके जन्मदिन को भी सभी शिल्पी बड़ी धूमधाम से मनाया करते हैं। इस दिन सभी शिल्पी अपने औजारों की पूजा करते हैं, उनको तराशते हैं। इसी दिन से ही नया शिल्पी पहली बार अपने हाथ में औजार लेता है व कुछ नया निर्मित करता है।