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ध्यान यानी शांत हो जाना

जे कृष्णमूर्ति

28th December 2015

ध्यान स्व का बोध है और बिना स्वबोध के ध्यान संभव नहीं है। स्वबोध के अभाव में प्रार्थना का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए जहां स्वबोध है, वहां सम्यक चिंतन होगा और इसलिए उचित कर्म होगा।

ध्यान यानी शांत हो जाना

ध्यान क्या है? एकाग्रचित्त होना ध्यान नहीं है, क्योंकि जहां रुचि होती है, वहां किसी वस्तु पर एकाग्रचित्त होना अपेक्षाकृत सरल होता है। युद्ध और नरसंहार की योजना बनाने वाला सेनापति बड़ा एकाग्रचित्त होता है। पैसा कमाने वाला व्यापारी बड़ा एकाग्रचित्त होता है वह कठोर भी हो सकता है, क्योंकि वह प्रत्येक दूसरी भावना को एक ओर करके जो चाहता है उस पर पूर्णतया एकाग्रचित होता है। यदि एक व्यक्ति की किसी वस्तु में रुचि है तो वह स्वभावत: सहज रूप में एकाग्रचित्त होता है। ऐसी एकाग्रता ध्यान नहीं है। वह केवल बहिष्करण है।

ध्यान स्व का बोध है और बिना स्वबोध के ध्यान संभव नहीं है। यदि आप प्रत्येक क्षण अपने समस्त प्रत्युश्ररों के प्रति सजग नहीं हैं, यदि आप अपनी नित्य की क्रियाओं के प्रति पूर्णतया सचेत, उनसे पूर्णतया परिचित नहीं हैं, तो खुद को एक कमरे में बंद कर लेना और अपने गुरु या स्वामी के चित्र के सामने ध्यान के लिए बैठना एक पलायन है, क्योंकि स्वबोध के बिना सम्यक चिंतन नहीं होता और बिना सम्यक चिंतन के आप जो कुछ भी करते हैं, चाहे उसमें आपके इरादे कितने भी महान क्यों न हों, उसका कोई अर्थ नहीं है।

स्वबोध के अभाव में प्रार्थना का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए जहां स्वबोध है, वहां सम्यक चिंतन होगा और इसलिए उचित कर्म होगा। अत: जहां उचित कर्म होता है, वहां दुविधा नहीं होती और परिणामस्वरूप, वहां किसी व्यक्ति से इस अनुनय की आवश्यकता नहीं होती कि वह आपको उस दुविधा से मुक्त करे। पूरी तरह से सजग व्यक्ति ध्यानरत ही होता है, वह प्रार्थना नहीं करता, क्योंकि उसे कुछ नहीं चाहिए।

प्रार्थना के द्वारा, विधि-विधान के द्वारा, दोहराने और इसी प्रकार की तमाम बातों द्वारा आप एक प्रकार की स्थिरता प्राप्त कर सकते हैं, परंतु वह केवल जड़ता है, अर्थात्ï एक ऐसी स्थिति है जिसमें मन और हृदय एक थकावट की हालत में पहुंच जाते हैं। यह मन को बेहोश कर लेना है। और यह बहिष्करण जिसे आप एकाग्रता कहते हैं यथार्थ तक नहीं ले जाता, एक को छोड़कर अन्य को अलग हटाने की ऐसी कोई भी प्रक्रिया यह नहीं कर सकती।

समझ अपने आपको जानने का परिणाम है और यदि हमारी मंशा सही है तो जागरुकता कोई मुश्किल काम नहीं है। यदि आप स्वयं की समस्त प्रक्रिया के, केवल सतही स्तर पर ही नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व की समस्त प्रक्रिया के अनुसंधान में रुचि रखते हैं, तो यह जागरुकता अपेक्षाकृत आसान होती है। यदि आप वास्तव में अपने को जानना चाहते हैं तो आप अपने हृदय और मन का अन्वेषण करेंगे जिससे कि आप उनकी समस्त विषयवस्तु को जान सकें और जब उसे जानने की मंशा होगी तो आप जान ही लेंगे।

उस अवस्था में विचार और भावना की प्रत्येक गति का आप बिना निंदा या औचित्य-समर्थन के अध्ययन कर पाते हैं, जैसे-जैसे विचार या भावना उठती है, वैसे-वैसे उसका अनुगमन करने में आप एक ऐसी शांति का अनुभव करते हैं जो कि बाध्यता से या विधि-विधान से नहीं आती, बल्कि जो किसी समस्या के न होने का, किसी अंतर्विरोध के न होने का परिणाम है। यह उस सरोवर के समान है जो किसी भी शाम में शांत और नीरव हो जाता है, जब हवाएं नहीं चल रही होतीं। जब मन शांत होता है, तो असीम प्रकट होता है।

मन केवल तभी मौन होता है जब वह इस सत्य को देख लेता है कि समझ तभी संभव है जब मन मौन हो, यानी यदि मैं आपको समझना चाहंू तो मुझे शांत होना होगा, मुझमें आपके विरुद्ध कोई प्रतिक्रिया न हो, मैं पूर्वग्रहयुक्त न रहूं, मुझे अपने समस्त निष्कर्षों को, अपने अनुभवों को हटाकर आपके समक्ष आना होगा। जब मन संस्कारग्रस्तता से मुक्त होता है, केवल तभी मेरे लिए समझ पाना संभव होता है। जब मैं इस बात के सत्य को देख लेता हूं, तभी मन मौन होता है, और तब यह प्रश्न नहीं उठता कि मन को शांत कैसे बनाया जाये। केवल सत्य ही मन को उसकी कल्पनाओं से मुक्त कर सकता है, सत्य को देख पाने के लिए मन को इस तथ्य का एहसास हो जाना चाहिए कि जब तक वह विक्षोभ की हालत में है, उसके लिए कुछ भी समझ पाना मुमकिन नहीं है।

तो अब हमारा प्रश्न यह नहीं है कि मन को निश्चल कैसे किया जाये, प्रश्न यह है कि कोई भी समस्या सामने आते ही उसके सत्य को कैसे देखा जाये। मन एक सरोवर के समान है जो वायु के स्थिर होते ही शांत हो जाता है। हमारा मन क्षुब्ध है, क्योंकि हमारे पास समस्याएं हैं, और समस्याओं से बचने के लिए हम मन को शांत बनाते रहते हैं।

मन ने ही इन समस्याओं का प्रक्षेपण किया है और मन से अलग कोई समस्या नहीं है, और जब तक मन संवेदनशीलता की किसी भी धारणा का प्रक्षेपण करता रहता है, किसी भी प्रकार की निश्चलता का अभ्यास करता रहता है, वह निश्चल कभी नहीं हो पाता। जब मन को यह एहसास हो जाता है कि स्थिर, निश्चल होने से ही समझ संभव है, तब वह नितांत मौन हो जाता है। वह मौन थोपा हुआ नहीं होता, अनुशासनजन्य नहीं होता, वह एक ऐसी शांति होती है जिसे बेचैन मन समझ ही नहीं सकता।

मन की शांति की तलाश में कई लोग सक्रिय जीवन त्याग कर किसी गांव का, किसी आश्रम का या पहाड़ों का रुख करते हैं, या फिर किसी विश्वास में खुद को कैद कर लेते हैं, या अपने को परेशान करने वाले लोगों से बचते रहते हैं। ऐसा अलगाव मन की निश्चलता नहीं है। किसी अवधारणा, किसी विचार में मन को बंद कर लेना या उन लोगों से बचते रहना जो जीवन को और जटिल बना दिया करते हैं, इस सब से मन की शांति नहीं आ सकती।

मन की निश्चलता का आगमन तभी होता है जब अनुभव-संचयन के द्वारा अलगाव की कोई प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि जब संबंध की समस्त प्रक्रिया को पूर्णतया समझ लिया जाता है। यह संचयन मन को जीर्ण बना देता है, जब मन ताजा होता है, संचयन की प्रक्रिया से मुक्त और नवीन होता है, केवल तभी मन के प्रशांत होने की संभावना होती है। ऐसा मन मृतप्राय नहीं होता, वह अतीव सक्रिय होता है। निश्चल मन सर्वाधिक सक्रिय मन होता है, किंतु यदि आप इसके साथ प्रयोग करेंगे, गहराई से इसकी जांच करेंगे, तो स्पष्टत: देख पाएंगे कि इस निश्चलता में विचार का कोई प्रक्षेपण नहीं है। विचार सभी स्तरों पर स्मृति की प्रतिक्रिया होता है एवं विचार सर्जन की अवस्था में कभी नहीं हो सकता। विचार सर्जनशीलता को अभिव्यक्ति दे सकता है, लेकिन वह स्वत: कभी भी सर्जनशील नहीं हो सकता।

जब मौन होता है, मन की वह प्रशांति, जो कि कोई परिणाम नहीं है, तब हम देख पाएंगे कि उस मौन में एक असाधारण गतिविधि है, एक असाधारण क्रियाशीलता है जिसे विचार से क्षुब्ध मन कभी नहीं जान सकता। उस निश्चलता में कोई उधेड़-बुन नहीं होती, कोई विचार नहीं होता, कोई स्मृति नहीं होती; वह निश्चलता सृजन की अवस्था है, जिसकी अनुभूति तभी हो सकती है जब 'मैंÓ की समस्त प्रक्रिया का पूर्ण बोध हो, पूरी समझ हो, नहीं तो निश्चलता का कोई अर्थ नहीं है। केवल उसी निश्चलता में, उसी शांति में, जो कि कोई परिणाम नहीं है, उस चिरंतन का अन्वेषण हो पाता है जो काल से परे है।

ध्यान महानतम कला है

ध्यान न केवल जीवन की महानतम कलाओं में से एक है बल्कि शायद यही महानतम कला है। यह कला संभवता: दूसरे से नहीं सीखी जा सकती-और यही इसका सौंदर्य है। ध्यान की कोई तकनीक और तरकीब नहीं होती। इसलिए इसका कोई अधिकारी और दावेदार भी नहीं होता। जब आप स्वयं का निरीक्षण करते हुए अपने बारे में सीखते हैं, अर्थात्ï किस तरह आप खाते-पीते हैं, किस ढंग से आप चलते-फिरते हैं, क्या बातचीत और गपशप करते हैं, आपका ईष्र्या करना, नफरत करना आदि जब जब आप अपने भीतर और बाहर की इन सारी चीजों के प्रति सजग और सचेत होते हैं, बिना किसी काट-छांट के, तो यह ध्यान का ही अंग है।

यह ध्यान हर जग और हर समय हो सकता है: जब आप किसी बस में बैठे हों या जब आप धूप और छाया से परिपूर्ण किसी वनस्थली में टहल रहे हों या जब आप पक्षियों के कलरव-गान को सुन रहे हों या जब आप अपनी पत्नी या अपने बच्चे के चेहरे को देख रहे हों।

ध्यान का अर्थ

ध्यान दैनिक जीवन से कोई भिन्न घटना नहीं है। ध्यान का अर्थ यह नहीं है कि आप एक कोने में जाकर बैठ जाएं, दस मिनट ध्यान करें और बाहर आकर एक कसाई बन जाएं- लाक्षणिक रूप से भी और वास्तव में भी। ध्यान का अर्थ प्रार्थना कतई नहीं है। प्रार्थना-याचना आत्म-दयनीयता की उपज है। जब आप किसी कष्टï और मुसीबत में होते हैं, जब आप पर कोई संकट आता है, तभी आप प्रार्थना करते हैं, लेकिन जब आपके चारों ओर प्रसन्नता और सुख-चैन होता है, तो वहां कोई याचना नहीं होती। यह आत्म-दयनीयता जो मनुष्य के भीतर इतनी गहराई में बैठी हुई है, यही हर तरह के अलगाव का कारण है।

किसी प्रार्थना को या किन्हीं शब्दों को दोहराना न केवल आत्म-सम्मोहन पैदा करता है बल्कि यह स्वयं को चारों ओर से बंद करने का एक उपाय है, जो अत्यंत विनाशकारी है। विचार द्वारा पैदा किया गया अलगाव सदा ज्ञान के क्षेत्र के भीतर ही घटित होता है, और किसी प्रार्थना का उत्तर इसी ज्ञान की प्रतिक्रिया है।

ध्यान इस सबसे अत्यंत दूर की बात है। इस क्षेत्र में विचार का प्रवेश नहीं हो पाता। यहां कोई अलगाव नहीं है और इसीलिए तादात्म्य भी नहीं है। ध्यान में सब कुछ प्रकट होता है, वहां दुराव-छिपाव का कोई स्थान नहीं है। वहां हर चीज साक्षात है, साफ और स्पष्टï है- और तभी प्रेम का सौंदर्य प्रकट होता है।

ध्यान किसी अलौकिक और दिव्य दर्शन की खोज नहीं है, चाहे यह परंपरानुसार कितना ही पवित्र और पूज्य क्यों न हो। ध्यान तो वह अनंत अवकाश और विस्तार है जहां विचार का प्रवेश नहीं हो सकता। विचार द्वारा अपने चारों ओर निर्मित वह लघु अंतराल यानी 'मैं हमारे लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि मन इसके अतिरिक्त कुछ नहीं जानता और इसलिए यह अपना तादाम्य उस अंतराल की हर चीज के साथ करता रहता है। 'न होने का भय भी उसी अंतराल में जन्म लेता है। लेकिन इस सबको समझ लेने के बाद मन अंतराल के, अवकाश के एक ऐसे आयाम में प्रवेश कर सकता है जहां सक्रियता ही निष्क्रियता है- और यही ध्यान है।

ध्यान का अर्थ यह पता लगाना है कि अपनी सारी गतिविधियां और अपने सारे अनुभवों समेत मस्तिष्क क्या पूर्णता: शांत हो सकता है। बाध्य होकर नहीं, क्योंकि जिस क्षण आप इसे बाध्य करते हैं, फिर से द्वैत आ खड़ा होता है, और वह सत्ता भी, जो कहती है, 'अद्ïभुत अनुभूतियों के जगत में प्रवेश के लिए मुझे अपने मस्तिष्क को नियत्रिंत कर शांत कर लेना चाहिए- ऐसा कभी संभव नहीं होगा। लेकिन अगर आप विचार की सारी खोजों और गतिविधियों को, इसके भय, सुखों और संस्कारों को देखने, सुनने और समझने लग जाएं, अगर आप अपने मस्तिष्क का निरीक्षण करने लग जाएं कि यह किस तरह कार्य करता है, तो आप देखेंगे कि मस्तिष्क असाधारण रूप से शांत, मौन हो जाता है।

यह शांति निद्रा नहीं है बल्कि यह प्रचंड रूप से सक्रिय है और इसीलिए शांत है। विद्युत उत्पन्न करने वाला एक बड़ा यंत्र जब अच्छी तरह कार्य करता है तो इससे शायद ही कोई ध्वनि निकलती हो। ध्वनि और शोर-गुल तभी पैदा होता है जब कहीं घर्षण होता है।

स्वयं ही दिव्य है ध्यान

ध्यान किसी साध्य का साधन नहीं है। वहां न कोई मंजिल है, न कहीं पहुंचना है। वह एक ऐसी गतिविधि है जो समय के आयाम में शुरू होकर समय के पार चली जाती है। ध्यान की हर विधि और पद्धति विचार को समय के साथ बांध देती है, परंतु हर विचार, हर भाव के प्रति निष्पक्ष सजगता के साथ उसकी प्रक्रिया और उसके पीछे कार्यरत प्रेरणाओं को समझना और साथ ही हर विचार और भाव को स्वतंत्रतापूर्वक फलने-फूलने और विकसित होने देना ध्यान का आरंभ है।

ध्यान का न आरंभ है आर न अंत। इसमें न कोई उपलब्धि है और न असफलता, न संग्रह है और न त्याग। यह ऐसी गतिशीलता है जिसकी कोई परिणति नहीं, जिसका कोई अंजाम नहीं और इसलिए यह समय और अंतराल के बाहर तथा पार है। वस्तुत: ध्यान की अनुभूति ध्यान का निषेध है, क्योंकि अनुभवकर्ता समय और अंतराल से तथा स्मृति और पहचान से बंधा होता है।

सच्चे ध्यान की बुनियाद वह निश्चेष्टï सजगता है जो सत्ता और महत्त्वकांक्षा से तथा ईष्र्या और भय से समग्र मुक्ति है। बिना इस मुक्ति के तथा बिना स्वयं को जाने-समझे ध्यान का कोई महत्त्व नहीं, कोई मूल्य नहीं। और स्वयं को जानना और समझना तब तक संभव नहीं है जब तक चयन की, पसंद-नापसंद की स्थिति है। चयन का अर्थ है द्वंद्व, और इस द्वंद्व के रहते 'जो है उसकी समझ संभव नहीं है।

ध्यान किसी शब्द की पुनरावृत्ति, किसी दृश्यबिंब का अनुभव नहीं है, न ही यह मौन का संवर्धन है। माला और शब्द, बड़बड़ाते मन को शांत तो कर देते हैं पर ऐसी शांति एक प्रकार से स्वयं को सम्मोहित करना ही है। वह तो आप कोई शामक औषधि लेकर भी कर लेते। विचार के किसी प्रारूप में, सुख के किसी सम्मोहन में स्वयं को आवृत कर लेना ध्यान नहीं है। ध्यान का कोई आरंभ नहीं है, तथा इसलिए इसका कोई अंत भी नहीं है।

आडम्बरों से परे है ध्यान

यदि आप कहते हैं, 'मैं आज से विचारों पर नियंत्रण करना, ध्यानस्थ आसन में शांतिपूर्वक बैठना, नियमित श्वास-क्रिया का अभ्यास करना आरंभ करूंगा, तो आप उन चालबाजियों में फंसे हैं जिनसे व्यक्ति स्वयं को धोखा दिया करता है। ध्यान किसी आडंबरपूर्ण धारणा या प्रतिमा में तल्लीन हो जाने की अवस्था नहीं है: यह तो व्यक्ति को बस क्षण-भर के लिए शांत कर देता है जैसे कि कोई बच्चा किसी खिलौनों में तल्लीन होकर उतने समय के लिए शांत हो जाता है, पंरतु जैसे ही वह खिलौना रुचिकर नहीं रहता, उसकी बेचैनी और शरारत फिर शुरू हो जाती है।

ध्यान किसी काल्पनिक आनंद की ओर ले जाने वाले किसी अदृश्य पथ का अनुसरण नहीं है। ध्यानस्थ मन तो देख रहा है, अवलोकन कर रहा है, सुन रहा है, बिना शब्द के, बिना टिप्पणी के, बिना अभिमत के, ऐसा मन सारा दिन अपने समस्त संबंधों में जीवन की गतिमयता के प्रति अवधानयुक्त रहता है और रात को, जब पूरा अवयव-संस्थान, शरीर विश्राम में होता है, तो ध्यानास्थ मन को स्वप्न नहीं आते, क्योंकि यह सारा दिन जागा रहा है। स्वप्न तो केवल उन्हें आते हैं जो असजग हैं, केवल अधजगे लोगों को अपनी अवस्थाओं की ओर इंगित किये जाने की दरकार होती है। किंतु मन जब जीवन की गति को, बाहर भी और भीतर भी, देखता है, सुनता है, तो मन में एक ऐसे मौन का आगमन होता है जो विचार द्वारा निर्मित नहीं है।

यह वैसा मौन नहीं है जिसका अवलोकनकर्ता अनुभव करता है। यदि वह इसे अनुभव करता है पहचान लेता है, तो यह मौन नहीं रह जाता। ध्यानास्थ्य मन का मौन पहचान की सीमाओं में नहीं होता, क्योंकि इस मौन की कोई सीमा है ही नहीं। यह केवल मौन है, इसमें विभाजन का अंतराल समाप्त हो जाता है।

मन का मौन है ध्यान

भारत में और उसके आगे पूर्व के देशों में विभिन्न संप्रदाय हैं, जिनमें वे ध्यान की विधियां सिखाते हैं- इसका अर्थ हुआ मन को यांत्रिक रूप से प्रशिक्षित करना, जिससे कि वह स्वतंत्र नहीं रह पाता और समस्या को समझने में अक्षम रहता है।

तो जब हम ध्यान शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो हमारा तमलब किसी ऐसी चीज से नहीं है जिसका अभ्यास किय जाए। हमारे पास कोई विधि नहीं है। ध्यान का अर्थ है जो भी कुछ आप कर रहे हैं उसके प्रति सजगता, जो आप सोच रहे हैं, जो आप महसूस कर रहे हैं, उसके प्रति सजग होना-बिना किसी पसंद-नापसंद के अवलोकन करना, सीखना।

ध्यान है अपनी संस्कारबद्धता के प्रति सजग होना कि कैसे हम उस समाज द्वारा संस्कारित हैं जिसमें हम रहते हैं, जिसमें हम पले-बढ़े हैं, कैसे हम धार्मिक प्रचार द्वारा संस्कारित हैं- सजग होना बिना किसी चयन के, बिना विकृति के, बिना इस चाहत के काश, यह भिन्न होता! इस सजगता से अवधान का आगमन होता है, पूरी तरह अवधानयुक्त होने की, सावधानता की क्षतमा आती है।

तब चीजों को जैसी वे हैं बिना किसी विकृति के वैसी ही देख पाने की स्वतंत्रता आती है। मन भ्रमयुक्त, स्पष्टï, संवेदनशील बन जाता है। ऐसे ध्यान की परिणति मन की ऐसी गुणवत्ता में होती है जिसमें मन पूरी तरह से मौन है- अब इस गुणवत्ता की बातें हम चाहे जितनी कर लें, लेकिन जब तक यह विद्यमान नहीं है, इसकी चर्चा का भला क्या अर्थ?

शब्दों की, वाक्यों की, मंत्रों की, गुरु द्वारा दी गयी शब्दावली की पुनरावृत्ति करना, दीक्षित होना, किसी वाक्य विशेष को, जिसे आपको गुप्त रूप से दोहराना होगा, सीखने के लिए धन देना-संभवत: आप में से कुछ ने यह किया है और आप इसके बारे में बहुत कुछ जानते हैं। इसे मंत्रयोग कहते हैं और इसे भारत से लाया गया है। मुझे नहीं मालूम कि आप एक पैसा भी क्यों देते हैं किसी के दिये गये शब्दों को दोहराने के लिए जो यह कहता है, 'यदि आप ऐसा करेंगे तो आपको संबोधि उपलब्ध हो जाएगी, आपका मन एक शांत मन होगा।

जब आप शब्दों के किसी क्रम को लगातार दोहराते हैं, चाहे वह 'आवे मारिया हो या विविध संस्कृत शब्द हों, तो जाहिर है कि आपका मन बोझिल, मंद हो जाता है व आपको एक खास किस्म की एकता का, शांति का एहसास होता है, और आप सोचते हैं कि इससे आपको स्पष्टïता लाने में मदद मिलेगी। आप इस सब का अटपटापन देख सकते हैं, क्योंकि इन मामलों में कोई भी-मेरे समेत-चाहे जो कहे उसे आपको स्वीकार क्यों कर लेना चाहिए?

जीवन की आंतरिक गति के बारे में आपको किसी की भी हुकूमत क्यों मान लेनी चाहिए? हम बाहर के संदर्भ में मो सत्ता को नकार देते हैं, अगर आप बौद्धिक रूप से जरा भी जागरूक और राजनीतिक रूप से सचेत हैं, तो आप बाह्मï सत्ता को नकारते ही हैं। पर जाहिर है कि हम उस व्यक्ति का सत्ता-प्रामाण्य स्वीकार कर लेते हैं जो कहता है, 'मैं जानता हूं, मैंने उपलब्ध कर लिया है, मैंने पा लिया है। जो व्यक्ति कहता है कि वह जानता है, वह जानता नहीं है।

ध्यान के संदर्भ में समग्र महत्त्व की बात है उस मार्ग का अनुसरण न करना जो विचार ने उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए निर्मित किया है, जिसे विचार सत्य, संबोधि अथवा यथार्थ मानता है। सत्य तक ले जाने वाला कोई मार्ग नहीं होता है। किसी भी मार्ग का अनुसरण उस तक ले जाता है जिसे विचार ने पहले से ही प्रतिपादित किया हुआ है और वह चाहे जितना सुखप्रद या संतोषदायक हो, सत्य तो नहीं है।

यह सोचना एक भ्रांति है कि ध्यान की कोई प्रणाली, दैनिक जीवन में कुछ तय क्षणों के लिए उस प्रणाली का निरंतर अभ्यास अथवा दिन के दौरान उसकी आवृत्ति-यह सब स्पष्टïता या समझ को जन्म देगा। ध्यान इस सबसे परे है और जैसे विचार द्वारा प्रेम का संवर्धन नहीं किया जा सकता, वैसे ही इसके द्वारा ध्यान का संवर्धन संभव नहीं है। जब तक ध्यान करने हेतु विचारक मौजूद है, ध्यान केवल उस आत्म-अलगाव का ही हिस्सा है जो व्यक्ति के दैनिक जीवन की एक आम गतिविधि है।