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कृष्णलीला का रूप है लोहड़ी का पर्व

अर्चना चतुर्वेदी

13th January 2016

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ कदम-कदम पर इतिहास से जुड़ी कई रोचक मान्यताएं सामने आती रहती है। आज इसी कड़ी हम आपको लोहड़ी पर्व से जुड़ी एक खास मान्यता के बारे में बताने जा रहे है। लोहड़ी पर्व का नाम पंजाबी रिती-रिवाजों से जुड़ा हुआ है। लेकिन हिंदू धर्म मान्यता के अनुसार यह पर्व भगवान श्री कृष्ण से भी संबंधित है। यही नहीं लोहड़ी पर्व जुड़ी कई पौराणिक और एतिहासिक कथा प्रचलित हैं। आइए जानते हैं...

 

श्री कृष्ण और लोहड़ी

लोहड़ी पर्व के नाम के विषय में भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार मकर संक्रांति की तैयारी में सभी गोकुलवासी लगे थे। वहीं दूसरी तरफ कंस हमेशा की तरह बाल कृष्‍ण को मारने के लिए योजना बना रहा था। उसने बाल कृष्‍ण को मारने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को गोकुल में भेजा था और बालकृष्‍ण ने खेल-खेल में ही उसे मार दिया था।

 

इस उपलक्ष में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहरी पर्व मनाया जाता है। लोहिता के प्राण हरण की घटना को याद रखने के लिए इस पर्व का नाम लोहड़ी रखा गया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

देवी सती और लोहड़ी

 

लोहड़ी पर्व को देवी सती के त्याग रूप में भी हर साल मनाया जाता है। एक कथा के अनुसार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती के पति महादेव शिव का तिरस्कार किया था और अपने जामाता को यज्ञ में शामिल नहीं किया था। जिससे रुष्ठ होकर सती ने अपने आपको को अग्नि में समर्पित कर दिया था। उसी दिन को एक पश्चाताप के रूप में हर साल लोहड़ी पर मनाया जाता हैं। और यही कारण है इस दिन लड़कियों को उपहार भेजने का।

घर की विवाहित बेटी को इस दिन कपड़े, मिठाई व अन्य तोहफे मायके से भिजवाए जाते हैं और भोजन पर भी आमंत्रित कर उसका मान सम्मान किया जाता हैं। साथ ही श्रृंगार का सामान सभी विवाहित महिलाओ को बाँटा जाता हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दुल्ला भट्टी और लोहड़ी

 

अकबर के शासनकाल की एक ऐतिहासिक कथा भी है जिसे दुल्ला भट्टी के नाम से जाना जाता हैं। माना जाता है कि उन दिनों दुल्ला भट्टी पंजाब राज्य का सरदार था। वहां की जनता उसे पंजाब का नायक मानती थी। उन दिनों संदलबार नामक एक जगह थी जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं। वहाँ लड़कियों को बेचा और खरीदा जाता था। तब दुल्ला भट्टी ने इस का विरोध किया और लड़कियों को सम्मानपूर्वक इस गोरखधंधे से बचाया और उनकी शादी करवाकर उन्हें सम्मानित जीवन दिया।

इस घटना को लोहड़ी के गीतों में आज भी गाया जाता हैं और दुल्ला भट्टी को याद किया जाता हैं। इसके चलते पंजाब में लोहड़ी का उत्सव हर्ष-उल्लास के साथ मनाया जाता है।