भगवान शिव को पशुपति क्यों कहते है

चन्द्रमोहन

5th March 2016

भगवान शिव रूप रहित हैं। अर्थात् शिव अनन्त हैं, असीम हैं। उनमें किसी बात की अभिलाषा नहीं है। वह दयालु भी हैं तथा क्रोध आने पर रौद्र रूप भी दिखा सकते हैं। लिंग भगवान की सृजनात्मक शक्ति का प्रतिरूप है इसलिए यह प्रतिरूप भगवान शिव का है। भगवान तथा जीवात्मा के संबंध को शक्ति और भक्ति के द्वारा समझा जा सकता है। शक्ति शिव में विद्यमान होती है तथा भक्ति तो जीवात्मा में निवास करती है। भक्ति के द्वारा ही जीव और शिव का संयोग होता है।

भगवान शिव को पशुपति क्यों कहते है


अबला व वृद्ध को आरोग्य रखने, पशुओं को निरोगी रखने तथा सभी तरह की दवाइयों का ज्ञान होने की वजह से भगवान शिव को 'वैद्यनाथ' का नाम दिया गया। धन-पुत्र, सुख, सौभाग्य देने से यह सदाशिव के नाम से प्रसिद्ध हुए। भगवान शिव हरदम अटल व अचल रहते हैं इसलिए स्थाणु नाम से भी जाने जाते हैं। चूंकि यह बहुत शीघ्र खुश हो जाते हैं इसलिए इन्हें आशुतोष भी कहते हैं। अम्बिका के पति होने के कारण यह अम्बिकेश्वर के नाम से भी जाने जाते हैं।


शिव के अन्य नामों से एक नाम सर्वभूतेषु भी है। सर्वभूतेषु का आशय होता है पंच महाभूत (धरा, अग्नि, जल, वायु एवं नभ)। यह तो स्पष्ट है कि जगत में प्रत्येक प्राणी तथा पदार्थ का पंच महाभूतों से ही उद्भव होता है। कहते हैं उनका यथेष्ट योग होता है। यह योग होने से वे बढ़ते तथा जीवित रहते हैं। यदि भूत बिगड़ जाए, तो विश्व के सभी प्राणी और पदार्थ का सर्वनाश हो सकता है। यह सब भूतेष की इच्छा पर निर्भर करता है। यही वजह है कि शिव सर्वभूतेषु होने की वजह से परमात्मा कहे जाते हैं। विषपान करने के कारण शिव का गला नीला हो गया। इसी से वे नीलकंठ कहलाए।
शिव का एक नाम रुद्र भी है जो कदाचितप्रलयंकारी, महाक्रोधी अथवा संहारक आदि गुणों के आधार पर रखा गया है। प्रलय के वक्त अग्निदाह प्रज्जवलन, अतिवृष्टि, अनावृष्टि और वज्रापात आदि जो होते हैं वे सब रुद्र के ही प्रतिरूप हैं।

भगवान शिव को पशुपति इसलिए कहते है क्योंकि सब जीवों के स्वामी हैं क्योंकि वे गतात्माओं के भी स्वामी हैं। ये महादेव यानी देवताओं के भी देव हैं। वे सुरगण के भी देव हैं तथा दैत्यों के भी देव हैं। इसलिए दशानन (रावण) ने शिव की पूजा करके अपने दसों सिर का बलिदान करके भगवान शिव से वरदान प्राप्त किया था। भगवान शिव सृष्टि कर्ता भी हैं तथा संहारक भी हैं। वे योगी भी हैं और भोगी भी हैं। वे देवता भी हैं और अद्र्धनारीश्वर का द्वैत रूप भी हैं। उनकी सामथ्र्य और सर्जना अनंत है।


शिव एक होते हुए भी अनेक रूपों वाले हैं। उनके कुछ प्रसिद्ध रूप हैं- नटराज, शरभ, बटुक, क्षेत्रपाल, मृत्युंजय, शिवलिंग, त्रिमूर्ति, हरिहर, पशुपति तथा अद्र्धनारीश्वर।मानव जाति की उत्पत्ति भी भगवान शिव से मानी जाती है।अत: भगवान शिव के स्वरूप को जानना प्रत्येक मानव के लिए जरूरी है।

जटाएं- शिव को अंतरिक्ष का देवता कहते हैं, अत: आकाश उनकी जटा का स्वरूप है, जटाएं वायुमंडल का प्रतीक है।


चंद्र- चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है, उनका विवेक सदा जाग्रत रहता है। शिव का चंद्रमा उज्ज्वल है।


त्रिनेत्र- शिव को त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव के ये तीन नेत्र सत्व, रज, तम तीन गुणों, भूत, वर्तमान, भविष्य, तीन कालों, स्वर्ग, मृत्यु पाताल तीन लोकों के प्रतीक हैं।
सर्पों का हार- सर्प जैसा क्रूर व हिंसक जीव महाकाल के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक वृत्ति का जीव है जिसे शिव ने अपने अधीन कर रखा है।
त्रिशूल- शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल सृष्टि में मानव भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू- शिव के एक हाथ में डमरू है जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मï रूप है।
मुंडमाला- शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है।
छाल- शिव के शरीर पर व्याघ्र चर्म है, व्याघ्र हिंसा व अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म- शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से करते हैं। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है शरीर नश्वरता का प्रतीक है।
वृषभ- शिव का वाहन वृषभ है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ का अर्थ है- धर्म। महादेव इस चार पैर वाले बैल की सवारी करते हैं अर्थात् धर्म, अर्थ, काम मोक्ष उनके अधीन है। सार रूप में शिव का रूप विराट और अनंत है, शिव की महिमा अपरम्पार है। ओंकार में ही सारी सृष्टि समायी हुई है।


भगवान शिव के अन्य स्वरूपों का उल्लेख-


गंगाधर- राजा भगीरथ ने जन कल्याण के लिए पतितपावनी गंगा जी को पृथ्वी पर लाने के लिए कई वर्षों तक प्रभु भोलेनाथ की कठोर तपस्या की, इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भगीरथ से कहा मैं गिरिराज कुमारी गंगा को अपने मस्तक पर धारण करके संपूर्ण प्राणियों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करूंगा। गंगा जी की सात धाराएं इस प्रकार हादिनी, पावनी और नलिनी नामक की धाराएं पूर्व दिशा की ओर तथा सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु- ये तीन धाराएं पश्चिम की ओर चली गईं। सातवीं धारा महाजन भगीरथ के पीछे-पीछे चली और पृथ्वी पर आई। इस प्रकार भगवान शंकर की कृपा से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ और भगीरथ के पितरों के उद्धार के साथ पतितपावनी गंगा संसारवासियों को प्राप्त हुर्इं।

 

 

 

 

 

 

औढरदानी शिव- वेद तथा आगमों में भगवान शिव को विशुद्ध ज्ञानस्वरूप बताया गया है। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही हैं। उनका यह दिव्य ज्ञान स्वत: सम्भूत है। ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया-शक्ति में भगवान शिव के समान कोई नहीं है। वह सबके मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियंता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अंत न होने से वह अनन्त हैं। भगवान शंकर दिग्वसन होते हुए भी भक्तों को अतुल ऐश्वर्य प्रदान करने वाले, अनंत राशियों के अधिपति होने पर भी भस्म-विभूषण, श्मशानवासी होने पर भी त्रैलोक्याधिपति, योगिराज होने पर भी अद्र्धनारीश्वर, पार्वती जी के साथ रहने पर भी कामाजित तथा सबके कारण होते हुए भी अकारण हैं। आशुतोष और औढरदानी होने के कारण वह शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के संपूर्ण दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान-विज्ञान के साथ अपने आपको भी दे देते हैं।


हरिहर रूप- एक बार सभी देवता मिलकर संपूर्ण जगत के अशांत होने का कारण जानने के लिए विष्णु जी के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर तो भोलेनाथ ही दे सकते हैं। तब विष्णु जी ने कहा कि सारे देवता शिव जी को प्रसन्न करने के लिए तत्पकृच्छ व्रत करें, फलस्वरूप सारे देवता पापमुक्त हो गए। अब सभी देवता यह विचार करने लगे कि सत्वगुणी विष्णु और तमोगुणी शंकर के मध्य यह एकता किस प्रकार हुई। देवताओं का विचार जान विष्णु जी ने उन्हें अपने हरिहरात्मक रूप का दर्शन कराया। देवताओं ने एक ही शरीर में भगवान विष्णु और भोलेनाथ शंकर अर्थात् हरि और हर का एक साथ दर्शन कर उनकी स्तुति की।


पंचमुखी शिव- भगवान शंकर के ऊपर की ओर गजमुक्ता के समान किंचित श्वेत-पीत वर्ण, पूर्व की ओर सुवर्ण के समान पीतवर्ण, दक्षिण की ओर सजल मेघ के समान सघन नीलवर्ण, पश्चिम की ओर स्फटिक के समान शुभ्र उज्ज्वल वर्ण तथा उत्तर की ओर जपापुष्प या प्रवाल के समान रक्तवर्ण के पांच मुख हैं। जिनके शरीर की प्रभा करोड़ों पूर्ण चंद्रमाओं के समान है और जिनके दस हाथों में क्रमश: त्रिशूल, टंक (छेनी), तलवार, वज्र, अग्नि, नागराज, घंटा, अंकुश, पाश तथा अभय मुद्रा हैं।


महामृत्युंजय- भगवान मृत्युंजय अपने ऊपर के दो हाथों में स्थित दो कलशों से सिर को अमृत जल से सींच रहे हैं। अपने दो हाथों में क्रमश: मृगमुद्रा और रुद्राक्ष की माला धारण किए हैं। दो हाथों में अमृत-कलश लिए हैं। दो अन्य हाथों से अमृत कलश को ढके हैं। इस प्रकार आठ हाथों से युक्त, कैलाश पर्वत पर स्थित, स्वछ कमल पर विराजमान, ललाट पर बालचंद्र का मुकुट धारण किए त्रिनेत्र, मृत्युंजय महादेव हैं।


शैवागम अनुसार रुद्र के अन्य ग्यारह रूप


शम्भू- भगवान शम्भू से ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देव, दानव, राक्षस आदि उत्पन्न हुए शम्भू, शिवस ईश्वर और महेश्वर आदि कई नाम उन्हीं के हैं। भगवान रुद्र ही इस सृष्टि के सृजन, पालन और संहारकर्ता हैं।


पिनाकी- शैवागम में दूसरे रुद्र का नाम पिनाकी है। क्षमारूपी रथ पर विराजित, ब्रह्मा सूत्र से समन्वित, चारों वेदों को धारण करने वाले भगवान पिनाकी हैं। श्री ब्रह्मा जी नारद जी से कहते हैं- जब हमने एवं भगवान विष्णु ने शब्दमय शरीरधारी भगवान रुद्र को प्रणाम किया, तब हम लोगो को ऊंकार जनित मंत्र का साक्षात्कार हुआ। तत्पश्चत् ऊंतत्त्वमसि यह महावाक्य दृष्टिगोचर हुआ, चारों वेद पिनाकी रुद्र के ही स्वरूप हैं।


गिरीश- भगवान शिव के निवास का वर्णन तीन स्थानों पर मिलता है। प्रथम भद्रवट-स्थान जो कैलाश के पूर्व की ओर लौहित्यगिरि के ऊपर है। दूसरा स्थान कैलाश पर्वत पर और तीसरा मूंजवान पर्वत पर है। वैसे तो भगवान शंकर वैराग्य और संयम की प्रतिमूर्ति हैं, किंतु उनकी संपूर्ण लीलाएं कैलाश पर संपन्न होने के कारण कैलाश पर्वत उन्हें विशेष प्रिय है। कैलाश पर्वत नर भगवान रुद्र अपने तीसरे स्वरूप गिरिश के नाम से प्रसिद्ध हैं। कैलाश पर्वत पर भगवान रुद्र के निवास के दो कारण हैं। पहला कारण अपने भक्त तथा मित्र कुबेर को उनके अलकापुरी के सन्निकट रहने का दिया गया वरदान है और दूसरा कारण रुद्र की प्राणवल्लभा उमा का गिरिराज हिमवान के यहां अवतार है।
स्थाणु- शैवागम में भगवान रुद्र के चौथे स्वरूप को स्थाणु बताया गया है। अपने वामांग में पार्वती को सन्निविष्ट करके उन्हें सुख प्रदान करने वाले तथा संपूर्ण देवमंडल के प्राणम्य भगवान स्थाणु रुद्र हैं। वह समाधिमग्न, आत्माराम तथा पूर्ण निष्काम हैं।


भर्ग- पांचवें रुद्र भगवान भर्ग को भयविनाशक कहा गया है। चंद्रभूषण, जटाधारी, त्रिनेत्र, भस्मोज्ज्वल, भयनाशक भर्ग सदा हमारे हृदय में निवास करें। दुख पीडि़त संसार को शीघ्रातिशीघ्र दुख और भय से मुक्ति करने वाले केवल महादेव भगवान भर्ग रुद्र ही हैं।
सदाशिव- शैवागम में रुद्र के छठे स्वरूप को सदाशिव कहा गया है। जो ब्रह्मा होकर समस्त लोकों की सृष्टि करते हैं, विष्णु होकर सबका पालन करते हैं और अंत में रुद्र रूप से सबका संहार करते हैं, वह सदाशिव हैं। शिव पुराण के अनुसार सर्वप्रथम निराकार परब्रह्मा रुद्र ने अपनी लीला शक्ति से अपने लिए मूर्ति की कल्पना की। वह मूर्ति संपूर्ण ऐश्वर्य-गुणों से संपन्न, सबकी एकमात्र वंदनीया, शुभ-स्वरूपा, सर्वरूपा तथा संपूर्ण संस्कृतियों का केंद्र थी। उस मूर्ति की कल्पना करके वह अद्वितीय ब्रह्मï अंतर्हित हो गया, इस प्रकार जो मूर्तिरहित परब्रह्मा रुद्र हैं, उन्हीं का चिन्मय आकार सदाशिव है।


शिव- शैवागम में रुद्र के सातवें स्वरूप को शिव कहा गया है। गायत्री जिनका प्रतिपादन करती है, ओंकार ही जिनका भवन है, ऐसे समस्त कल्याण और गुणों के धाम शिव हैं। शिव शब्द नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मा का वाचक है। शिव शब्द की उत्पत्ति वश कान्तौ धातु से हुई है, जिसका तात्पर्य यह है कि जिसको सब चाहते हैं, उसका नाम शिव है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


हर- शैवागम के अनुसार भगवान रुद्र के आठवें स्वरूप का नाम हर है, जो भुजंग-भूषण धारण करते हैं, देवता जिनके चरणों में विनीत होते हैं। भगवान हर को सर्पभूषण कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि मंगल और अमंगल सब कुछ ईश्वर-शरीर में है। समय पर सृष्टि का सृजन और समय पर उसका संहार दोनों भगवान रुद्र के कार्य हैं। सर्प से बढ़कर संहारकारक तमोगुणी कोई हो नहीं सकता क्योंकि अपने बच्चों को भी खा जाने की वृत्ति सर्प जाति में ही देखी जाती है। इसलिए भगवान हर अपने गले में सर्पों की माला धारण करते हैं। काल को अपने भूषण रूप में धारण करने के बाद भी भगवान हर कालातीत हैं।


शर्व- भगवान रुद्र के नौवें स्वरूप का नाम शर्व है। त्रिपुरहंता, यमराज के मद का भंजन करने वाले, खंगपाणि एवं तीक्ष्मंदष्ट शर्व हमारे लिए आनंददायक हैं। सर्वदेवमय रथ पर सवार होकर त्रिपुर का संहार करने के कारण भी इन्हें शर्व रुद्र कहा जाता है। शर्व का एक तात्पर्य सर्वव्यापी, सर्वात्मा और त्रिलोकी का अधिपति भी होता है।
कपाली- शैवागम के अनुसार दसवें रुद्र का नाम कपाली है। दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले तथा क्रोधित मुख-कमल वाले शूलपाण कपाली हमें रात-दिन सुख प्रदान करें। पद्यपुराण (सृष्टिखंड-17) के अनुसार इसी रूप में भगवान रुद्र ने क्रोधित होकर दक्ष-यज्ञ को विध्वंस किया था।


भव- भगवान रुद्र के ग्यारहवें स्वरूप का नाम भव है। योगीन्द्र जिनके चरण-कमलों की वंदना करते हैं, जो द्वंद्वों से अतीत तथा भक्तों के आश्रय हैं और जिनसे वेदांत का प्रादुर्भाव हुआ है। इसी रूप में वह संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं तथा जगतगुरु के रूप में वेदांत और योग का उपदेश देकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। लिंगपुराण के सातवें अध्याय और शिवपुराण के पूर्व भाग के बाइसवें अध्याय में भगवान भव रुद्र के योगाचार्य स्वरूप और उनके शिष्य-प्रशिष्यों का विशेष वर्णन है। प्रत्येक युग में भगवान भव रुद्र योगाचार्य के रूप में अवतीर्ण होकर अपने शिष्यों (उनके नाम रुरु, दधीचि, अगस्त्य और उपमन्यु हैं) को योगमार्ग का उपदेश प्रदान करते हैं।

 

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