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क्यों मनाते हैं शिवरात्रि?

शशि शेखर शुक्ल

6th March 2016

शिवरात्रि का अर्थ वह रात्रि है जिसका शिवतत्व के साथ घनिष्ठ संबंध है। भगवान शिव जी की अतिप्रिय रात्रि को शिवरात्रि कहा गया है। शिवार्चन एवं जागरण ही इस व्रत की विशेषता है। इसमें रात्रि भर जागरण एवं शिवाभिषेक का विधान है। श्री पार्वती जी की जिज्ञासा पर भगवान शिव जी ने बताया कि फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है।

क्यों मनाते हैं शिवरात्रि?

 

जो उस दिन उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है। मैं अभिषेक, वस्त्र, धूप, अर्चन, तथा पुष्पादि समर्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता जितना कि व्रतोपवास से। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदि देव भगवान श्री शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।

 

 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अत: उसी समय जीवनरूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। अत: इस चतुर्दशी को शिव पूजा करने से जीव को अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है। यही शिवरात्रि का रहस्य है।

महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। वह हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति, ऐश्वर्यादि प्रदान करते हैं।

 

 

शिवरात्रि पर चार प्रहर में चार बार पूजा का विधान है।

इसमें शिव जी को पंचामृत से स्नान कराकर चन्दन, पुष्प, अक्षत, वस्त्रादि से श्रृंगार कर आरती करनी चाहिये। रात्रिभर जागरण तथा पंचाक्षर-मन्त्र का जाप करना चाहिये। रुद्राभिषेक, रुद्राष्टाध्यायी तथा रुद्रीपाठ का भी विधान है।

 

कथा-

पद्म कल्प के प्रारम्भ में जब भगवान ब्रह्मा जब अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज एवं देवताओं आदि की सृष्टि कर एक दिन स्वेच्छा से घूमते हुए क्षीरसागर पहुंचे तब उन्होंने देखा भगवान नारायण शुभ्र, श्वेत सहस्त्रफण मौलि शेष की शैय्या पर शान्त अध लेटे हुए हैं। भूदेवी, श्रीदेवी, श्रीमहालक्ष्मी जी शेषशायी के चरणों की चरण सेवा कर रही हैं। गरुड़, नन्द, सुनन्द, पार्षद, गन्धर्व, किन्नर आदि विनम्रता से हाथ जोड़े खड़े हैं। यह देख ब्रह्मा जी को आश्चर्य हुआ। ब्रह्मा जी को गर्व हो गया था कि मैं एकमात्र सृष्टि का मूल कारण हूं और मैं ही सबका स्वामी, नियन्ता तथा पितामह हूं। फिर यह कौन वैभवमण्डित निश्चिन्त सोया हुआ है।

श्री नारायण को अविचल शयन करते हुए देखकर उन्हें क्रोध आ गया। ब्रह्मा जी ने समीप जाकर कहा- तुम कौन हो? उठो! देखो, मैं तुम्हारा स्वामी, पिता आया हूं। शेषशायी ने केवल दृष्टि उठायी और मन्द-मन्द मुस्कान से बोले-वत्स! तुम्हारा मंगल हो। आओ इस आसन पर बैठो। ब्रह्मा जी को अधिक क्रोध हो आया, झल्लाकर बोले- मैं तुम्हारा रक्षक, जगत का पितामह हूं। तुमको मेरा सम्मान करना चाहिये। इस पर भगवान नारायण ने कहा- जगत मुझमें स्थित है, फिर तुम उसे अपना क्यों कहते हो? तुम मेरे नाभि कमल से पैदा हुए हो, अत: मेरे पुत्र हो। मैं सृष्टा, मैं स्वामी यह विवाद दोनों में होने लगा।

श्री ब्रह्मा जी ने पाशुपत एवं श्री विष्णु जी ने माहेश्वर अस्त्र उठा लिया। दिशाएं अस्त्रों के तेज से जलने लगीं, सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गयी थी। देवगण भागते हुए कैलाश पर्वत पर भगवान विश्वनाथ के पास पहुंचे। अन्तर्यामी भगवान शिव जी सब समझ गये। देवताओं द्वारा स्तुति करने पर वह बोले- मैं ब्रह्मा-विष्णु के युद्ध को जानता हूं। मैं उसे शान्त करूंगा। ऐसा कहकर भगवान शंकर सहसा दोनों के मध्य में अनादि अनन्त-ज्योतिर्मय स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए। माहेश्वर, पाशुपत दोनों अस्त्र शान्त होकर उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गये। यह लिंग निष्कल ब्रह्मा, निराकार ब्रह्मï का प्रतीक है। श्री विष्णु एवं ब्रह्मा जी ने उस लिंग (स्तम्भ) की पूजा-अर्चना की। यह लिंग फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ, तभी से आज तक लिंगपूजा निरंतर चली आ रही है। श्री विष्णु एवं श्री ब्रह्मा जी ने कहा- महाराज! जब हम दोनों लिंग के आदि-अन्त का पता न लगा सके तो आगे मानव आपकी पूजा कैसे करेगा? इस पर कृपालु भगवान शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग में विभक्त हो गये। महाशिवरात्रि का यही रहस्य है।

दूसरी कथा-

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