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जानिए कब से चला पिचकारी का चलन ?

- डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम

22nd March 2016

होली एक ऐसा त्योहार है जिसमें हर व्यक्ति उल्लास और उमंग से भर उठता है और होली के रंगों में रंग कर अपनी हर तकलीफ और चिंता को भूल जाता है। पिचकारी में भर-भर कर एक दूसरे को रंगों में डुबा देना हमें एक विशेष प्रकार की खुशी से भर देता है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पिचकारी के बिना हम होली खेलने की कल्पना भी नहीं कर सकते वो पहली बार प्रयोग में कब आई होगी ? आइए जानें।

जानिए कब से चला पिचकारी का चलन ?

 

होली तथा पिचकारी एक दूसरे के पर्याय हैं। होली का नाम आते ही पिचकारी पहले याद आती है जैसे होली का समस्त लुत्फ पिचकारी से ही जुड़ा है। होली में स्नेह तथा यार के सौहार्दपूर्ण रंग बिखेरने के लिए प्राचीन काल से पिचकारियों का प्रयोग होता रहा है। पौराणिक काल की चर्चा करें तो कृष्ण और गोपियों के मध्य होली खेलने के दृष्टांतों में पिचकारी का प्रयोग अच्छी तरह से दर्शाया गया है अन्य किसी पात्र की अपेक्षा पिचकारी से रंग डालने का भाव निराला है।

 

 

 

 

 

 

 


पिचकारी का महत्त्व
पिचकारियों का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। हालांकि समय के साथ पिचकारी का आकार प्रकार तथा बनाने के तौर तरीके बदलते रहे, लेकिन इसके नाम तथा कार्य में कोई बदलाव नहीं आया। अतीत से अब तक प्रत्येक होली के अवसर पर पिचकारी स्नेह और प्रेम के रंगों से लोगों को संघटित करती रही है। इतिहास के पन्नों का अवलोकन करने से यह बात जाहिर होती है कि पहले पिचकारी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत तथा उसकी सम्पन्नता को प्रदर्शित करती थी। तब लोग पिचकारी को बाजारू मोल से न करके सामथ्र्य के मुताबिक कुशल कारीगरों से बनवाते थे। उन्हें बनवाने में कई दिन तथा काफी धन लगता था। अपने प्रियजनों से होली खेलने के लिए विशेष प्रकार की कलात्मकता से ओत-प्रोत पिचकारियों का निर्माण कराया जाता था।

 

 

 

 

 

 

 

 

जल क्रीड़ा का वर्णन 

शास्त्रों में भी प्राचीन भारत में बसंतोत्सव या मदन महोत्सव पर जो जल क्रीड़ा होती है उसका वर्णन तमाम प्राचीन संस्कृत शास्त्रों में भी पढऩे को मिलता है। उस वक्त पिचकारियों को श्रृंगक कहा जाता था तथा उसका आकार सांप या कीप जैसा होता था। अकसर पलाश के पुष्पों के रंग का जल इन पिचकारियों से एक-दूसरे पर डाला जाता, जो न मात्र सुगंधित और देखने में मनोरम ही होता वरन् कीटाणुनाशक और आरोग्यता के लिए फायदेमंद भी था। चंदन, केसर, कुमकुम, गुलाबजल और केवड़े का इस्तेमाल भी प्रचुरता से होता था। इन दिनों राजा और प्रजा सब मिलकर एक-दूसरे पर रंग डालते। समस्त वातावरण रंगमय, प्रेममय और सुगंधित हो जाता। हासपरिहा सभी भरपूर मात्रा में चलता रहता। रघुवंशम्ï में कालिदास ने चर्चा की है कि इस मौके पर संपन्न लोग, सोने की पिचकारियों से रंग की बौछार करते थे। बालों में कुमकुम मिली लाल बूदें टपकती रहतीं।

नक्काशी का सुन्दर पिचकारियों का निर्माण इस समय कारीगर पिचकारियों का निर्माण बड़े ही परिश्रम रुचि तथा लगन से करते थे। और इन पर काफी धन खर्च होता था। सोने तथा चांदी की पिचकारियों का निर्माण करने वाले कारीगर महीनों पहले से ही काम में लगते थे। इन पिचकारियों पर कारीगर कलात्मक चित्र उकेर देते थे और अच्छी नक्काशी का इन पर कार्य किया जाता था। कारीगर पिचकारियों को वैसा ही आकार देते थे जैसा उन्हें बनवाने वाले चाहते थे। ये पिचकारियां रत्न जडि़त भी होती थीं और इन्हें मछली, सुराही, मगर, हाथीसूंड, सर्पाकार व बेलनाकार आकृतियां दी जाती थीं। देखने में ये पिचकारियां बहुत मनभावन हुआ करती थीं। चूंकि होली का हुड़दंग हास-परिहास व मनोविनोद से लबालब होता था। अत: विनोदी स्वभाव के धनी लोग मनो विनोद हेतु लिंगाकार पिचकारियां भी बनवाते थे।


पशुओं के सींगों से बनती थी पिचकारियां

अति प्राचीन काल में पशुओं के सीगों को खोखला करके पिचकारी बनाई जाती थी। इन पिचकारियों में रंग भर के होली खेली जाती थी। खोखले बांसों को पिचकारी बनाने में प्रयोग करने का एक पुराना रिवाज है। बांस से निर्मित पिचकारी अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल जाती है।


 

 

 

 

 

 

 

 

महंगाई से बदला रंग 

महंगाई की मार से पिचकारियां भी न बच पार्इं। सोने चांदी की पिचकारी स्वप्न की बात बन गई, क्योंकि इन धातुओं की कीमत काफी बढ़ गई है। इसके बाद पीपल और तांबे की पिचकारी बनी लेकिन जल्द ही इनकी जगह स्टील तथा लोहे की पिचकारियां भी बनाई जाने लगीं। अब स्थिति यह है कि प्लास्टिक की पिचकारियां ही आमतौर से चल रही हैं जिन्हें आकर्षक बनाने के लिए तरह-तरह के आकारों-प्रकारों में ढाला जाता है। समय के साथ पिचकारी ने कितने ही रूप क्यों न बदले हों, लेकिन होली के साथ जुड़ा उसका स्नेह तथा सौहार्द का संबंध घनिष्ठ रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 


बाल्टियों ने लिया पिचकारी का स्थान

होली मनाने की उमंग तथा उत्साह भले ही न रुकी हो, लेकिन होली पर एक-दूसरे को रंगने के लिए न तो अब प्राकृतिक रंग का इस्तेमाल होता है न ही पिचकारी रंग बरसाने का माध्यम बनती है। यूं बच्चे भले ही पिचकारी से एक-दूसरे पर रंग बरसाएं, बड़ों ने बड़े-बड़े टबों में रासायनिक रंग घोला तथा बाल्टियों में भर-भर कर हो गए शुरू। अनेक लोग तो टबों के झंझट से भी बचना चाहते हैं तथा अपनी जल की टंकियों में रंग घोल देते हैं। तत्पश्चात् छोटी मोटर लगाकर पाइप के फुव्वारे से बालकनी पर खड़े होकर गली से निकलने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर रंगों की बौछार की जाने लगी है। होली के इस बदलते रंग ढंग ने रंगों से सराबोर करने की प्रक्रिया में सबसे मजबूत अस्त्र पिचकारी को पीछे कर दिया तथा उस पर हावी हो गई बाल्टियों तथा तेज धारों से रंग में सराबोर करने की प्रक्रिया। इसी भांति प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल भी समाप्त सा हो गया।प्राकृतिक रंगों के स्थान पर सामान्य दशाओं पर हर कोई रासायनिक रंगों का इस्तेमाल करता है तथा चेहरे पर पेंट, सफेदा, कीचड़ आदि लगाने में भी लोग पीछे नहीं रहते। तात्कालिक खुशी में तो यह सब अच्छा लगता है, लेकिन इसके दुष्परिणाम तमाम चर्म व्याधियों के रूप में भी संमुख आते हैं।

 

आधुनिक पिचकारियों का बहिष्कार करें
आजकल पिचकारियों को पिस्तौल, मशीनगन, बन्दूक और छुरे की आकृति दी जा रही है जोकि हमारी आपराधिक मानसिकता का प्रतीक है। ऐसी पिचकारियां प्रचुर तादाद में बाजारों में बिकती हैं और बच्चों, जवानों का इनकी ओर लगाव भी ज्यादा रहता है। प्रेम तथा बन्धुत्व के इस पर्व पर ऐसी पिचकारियों का बहिष्कार करना चाहिए।

 

 

 

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