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नारायणि नमोस्तुते; कैसे स्त्री का सम्मान किया जाना चाहिए

अन्शु पाठक

25th November 2016

हर स्त्री अपनी गोद के नन्हे बालक को जन्मघुट्टी की तरह पिलाए ये संस्कार कि कैसे स्त्री, नारी चाहे बहन हो या बेटी या फिर पत्नी का आदर सम्मान किया जाना चाहिए...

नारायणि नमोस्तुते; कैसे स्त्री का सम्मान किया जाना चाहिए

 


'ढोर गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताडऩ के अधिकारी रामचरित मानस के सुंदरकांड में यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखी और जैसा इस छंद के अर्थ का अनर्थ लिया गया, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यह सोच परम्परागत तरीके से मूलत: धर्म से, समाज से, घर-परिवारों में आई है और आज भी औरत ताडऩा की अधिकारी है। कस्बों से लेकर महानगरों तक में युवतियां आज पढ़ लिख कर काम कर रही हैं, स्वाभिमान व आत्मसम्मान रख रही हैं और यह पुरुषों को रास नहीं आ रहा। लड़कियां तेजी से घर से बाहर निकली हैं, उनकी आर्थिक निर्भरता पुरुषों पर कम हो चली है। सामाजिक निर्भरता बनी रहे इसलिए महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, हिंसा और बलात्कार के मामले बढ़ते जा रहे हैं। पुरुष का सामाजिक अहं व भय अपराधों के जरिए व्यक्त होता है और उद्देश्य रहता है कि जैसे भी हो औरत को दबाए रखो।

इतिहास साक्षी है कि धर्म ने हमेशा स्त्री के लिए सजा तय की, पुरुष को हमेशा निष्पाप, निष्कलंक, बेदाग रखा। रामचरितमानस की अहिल्या हो या फिर सीता, दोनों ही पुरुष द्वारा छली गई। वे चाहे इंद्रदेव हों, स्वर्ण मृग रूपी मारीच हो या फिर साधुवेष में रावण। महाभारत में स्त्री की सामाजिक दुरावस्था का द्रौपदी से जीवंत उदाहरण क्या होगा।

महाभारत में ही अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका को उनके स्वयंवर से हरण करके लाए थे भीष्म पितामह। बिना स्वीकृति के काशीराज की दो पुत्रियों का विवाह विचित्रवीर्य से करवा दिया। अम्बिका व अम्बालिका दोनों काशी के राजा की पुत्रियां थीं,तब भी उन्होंने मुंह न खोला। पति के मरने के बाद सास सत्यवती ने व्यास से नियोग का आदेश दिया। वे दोनों नहीं चाहती थीं, किंतु सत्यवती ने उन्हें बाध्य किया, नतीजतन धृतराष्ट्र जन्मजात अंधे पैदा हुए। अम्बिका व्यास को देख डर गई व आंखें बंद कर ली। अम्बालिका व्यास को देखकर थर-थर कांपने लगी व फलस्वरूप पांडु अस्वस्थ जन्मे। धर्म में नियोग के नाम पर यह स्त्री का दैहिक शोषण ही तो था। आज कलियुग में धर्म के नाम पर ऐसा बदस्तूर जारी है। धर्म के प्रचार प्रसार की ही वजह से दक्षिण के कांचिकामकोटि मठ के भगवा साधुओं के पास से अश्लील वीडियो सीडी का जखीरा पकड़ा जाता है और शंकराचार्य हत्या के आरोप में जेल में हैं।

धर्म की आड़ में स्वामी भीमानंद चित्रकूटवाले ने न जाने कितनी युवतियों का शोषण किया होगा। गुजरात में स्वामीनारायण मंदिर के साधु पुत्र देने के नाम पर निसंतान औरतों का फायदा उठाते पकड़े जाते हैं। आसाराम व नित्यानंद सांई के किस्से जग प्रसिद्ध हैं ही। जाहिर है कि धर्म और ईश्वर के नाम पर ही चालाक पुरुष ने स्त्रियों को भोग की वस्तु बना कर रखा है और आज भी पुरुष का हर गुनाह माफ और स्त्री के पैरों में नीति नियमों की बेडिय़ां हैं। इस्लाम ने मुस्लिम मर्द को छुट्टïा सांड बना दिया, मोहम्मद 9 शादियां कर सकते हैं तो आम मुसलमान को 4 की इजाजत क्यों न हो। परदे से लेकर अशिक्षा तक हर संभव पाबंदी लगा दी गई तो वहीं ईसाई धर्म में स्त्रियों को पतित करार कर दिया ताकि वह चुपचाप धर्म के ताने-बाने में उलझ कर रह जाए। जो न सहे तो फिर उसकी वो गति की जाए कि आगे कोई विद्रोह न कर सके। हाल की फिल्म 'डाविन्चीकोड इसका ज्वलंत उदाहरण है। वैसे भी अमेरिका और यूरोप की अदालतों में पादरियों द्वारा चर्चो में, मिशनरी स्कूलों में यौनाचार के हजारों मामले चल रहे हैं।

अथर्ववेद में एक श्लोक है- 'इयं नारी पति लोकं वृणाना निपहात उपत्वामत्र्य प्रेतम् धर्म पुराण मनुपालयंती तस्यै प्रजां द्रविणं चेहहोहि। अर्थात- हे मृत पुरुष,धर्म का पालन करती स्त्री तेरे पास आती है, उसे परलोक में भी धन व संतान देना।

यह है हमारे सनातन धर्म का पति की मृत्यु के बाद पत्नी को जिंदा जला देने वाले समाज का सत्य। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार आज भी 55 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। नैशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार हर 3 मिनट पर हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ एक अपराध होता है, छेड़छाड़ प्रताडऩा मानसिक यातना के तो अपराध तक नहीं माना जाता। देश में हर 20 मिनट पर बलात्कार होता है और सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हर 4 में से 3 अपराधी बरी हो जाते हैं। जिस देश में 250 संसद सदस्यों पर खुद आपराधिक केस चल रहे हों वहां क्या उम्मीद रखी जा सकती है। तो किया क्या जाए? निवारण बहुत सरल है... हर स्त्री जो प्रसव वेदना को सह कर पुरुष को जन्म देती है, वही अपनी गोद के नन्हे बालक को जन्मघुट्टी की तरह पिलाए ये संस्कार कि कैसे स्त्री नारी चाहे बहन हो या बेटी या फिर पत्नी का आदर सम्मान किया जाना चाहिए ताकि बच्चा जब कल को पुरुष बन कर समाज का नेतृत्व करे तो यही कहे कि 'नारायणि नमोऽस्तुते क्योंकि सृष्टि की आधारूत तो हमेशा से स्त्री ही रही है और रहेगी भी।