जानिए क्या है नवरात्र और रामनवमी का संबंध

गृहलक्ष्मी टीम

14th April 2016

वासंतीय नवरात्र का संबंध मां दुर्गा की स्तुति-अर्चना से ही नहीं जुड़ा बल्कि भगवान श्रीराम के पूजन में भी जुड़ा है। नवरात्र के साथ-साथ रामनवमी का पर्व मात्र संयोगवश ही नहीं है, बल्कि इसका अपना महत्व है। दोनों का आपसी संबंध स्पष्ट करता है ये लेख।

 

दुर्गा-पूजा भारत की सनातन संस्कृति का महत्त्वपूर्ण पर्व है। मुख्य रूप से दो नवरात्रों का यहां अधिक महत्व है। शारदीय नवरात्र और वासंती नवरात्र। इनमें भी वासंती नवरात्र का अधिक महत्त्व है। इसका एक कारण यह भी है कि नवरात्र की नवमी को ही राम-जन्मोत्सव की रामनवमी मनाई जाती है।

दुर्गा ने चंड, मुंड, शुंभ, निशुंभ, चिक्षुपर, महिषासुर, इत्यादि असुरों, दैत्यों और राक्षसों का वध किया था, जिनसे तीनों लोक भयाक्रांत और परास्त थे। राम ने भी त्रिलोक-विजयी रावण को मारकर अत्याचार और अन्याय की एक लंबी परंपरा को नष्ट किया था। राम ने वनवास के क्रम में उन अनेक राक्षसों को मार डाला था, जो ऋषि-मुनियों की अकारण हत्या करते थे। इस असुर-संहार के बाद ही वह मिथिला गए थे। रावण तो महाराक्षस था, जिसका राम ने अंत में वध किया था। भगवती दुर्गा ने भी चंड-मुंड-शुंभ-निशुंभ इत्यादि राक्षसों का वध करने के पश्चात् महाराक्षस महिषासुर का वध कर तीनों लोकों को भय-मुक्त किया था। दुर्गा पूर्ववर्ती हैं, राम परवर्ती। दुर्गा नारी हैं, राम पुरुष। दोनों ने असुरों और महासुरों का वध किया, दोनों दिव्य शक्ति-संपन्न हैं। राम ने भगवती दुर्गा की उपासना से शक्ति प्राप्त की थी और विजय का वर मांग लिया था। रावण पर विजय के कारण इसे विजयादशमी भी कहते हैं। फिर बीसवें दिन राम के अयोध्या लौटने पर उत्सव मनाया गया, जो प्रति वर्ष दीपावली के रूप में मनाया जाता है।

दुर्गा पूजा और राम का महत्व

राम का अर्थ है- 'रमन्ते योगिनो यस्मिन् स राम:'। अर्थात् योगिगण अपने ध्यान में जिन्हें देखते हैं, वे हैं राम। राम का तंत्र में अर्थ है कल्याणकारी अग्नि और प्रकाश।

इसलिए नवरात्रों में रामचरित-मानस या रामायण-पाठ का विधान है। दुर्गा-सप्तशती संपूर्ण रूप से तंत्र-ग्रंथ है। यह योग और भोग दोनों फलों को देने वाला ग्रंथ है। रामकथा मोक्ष या योग या कैवल्य की ओर ले जाने वाली विद्या है। राम ऋषि संस्कृति के प्रतीक पुरुष हैं। भारतीय संस्कृति ऋषि-संस्कृति तथा कृषि-संस्कृति का सम्मिलित स्वरूप हैं।

मानव-सभ्यता के विकास-क्रम में यह सिद्धांत स्थिर हुआ कि पुरुष आखेट या शिकार के लिए जंगलों में आते थे। गर्भधारण, रजस्वला, कोमलांगता या ऐसे कारणों से नारियां गुफाओं में ही रह जाती थीं। स्वयं के लिए, अपने शिशुओं और परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्होंने कृषि का सहारा लिया, कृषि-कर्म आरंभ किया और उसे आगे बढ़ाया। इस तरह फिर खेती का विस्तार होता गया।

इसलिए कलश के नीचे जौ उगाते हैं 

उस खेती और उसकी फसलों को महिष (भैंसा) से बहुत हानि होती थी। उस भैंसे (महिषासुर) को गुफावासिनी ही मार सकती थीं। यह भी एक प्रतीक है। आज दुर्गापूजा के नवरात्र में जब कलश-स्थापन किया जाता है तो कलश के नीचे मिट्टी पर जौ उगाया जाता है। यह कृषि-कर्म का ही प्रतीक है। यह पूजा का समाजशास्त्रीय संदर्भ है।

राम ऋषि-तत्त्व के प्रतीक हैं, यही कारण है कि दुर्गार्चन और रामार्चन साथ-साथ चलते हैं। दोनों के बीज-मंत्र हैं-

 

'दुं दुर्गायै नम:!'

'रां रामाय नम:'

'ओम नमो नारायणाय।'

 

 

 

 

दोनों ही मर्यादित हैं

राम को मर्यादा-पुरुषोत्तम कहा गया है। वे सभी प्रकार के संबंधों में आदर्श उपस्थित करते हैं। इधर दुर्गा किसी भी नियम या मर्यादा से ऊपर हैं। वे जो कुछ करती हैं, वही नियम और मर्यादा बन जाती है। अंडे का उदाहरण लेने पर कहा जा सकता है कि जब-तक अंडे के भीतर का तरल पदार्थ परिपक्व होकर पक्षी का रूप धारण नहीं कर लेता, तब-तक छिलका आवश्यक है। समय से पूर्व अंडा को फोड़ देने पर तरल जीवन बह जाएगा और पक्षी का निर्माण नहीं हो पाएगा, किंतु जब भीतर का तरल पदार्थ परिपक्व होकर पक्षी-रूप धारण कर लेता है। तो अंडे के छिलके का टूटना जरूरी हो जाता है, अन्यथा वह पक्षी भीतर ही मर जाएगा। हम राम को पुरुष (परमात्मा) तत्त्व और दुर्गा को प्रकृति (महामाया-तत्त्व) मानते हैं। ब्रह्मांड के भीतर रामत्व परमात्म-तत्त्व है। दुर्गा वह शक्ति-तत्त्व है, जो अपनी संचारिणी शक्ति के द्वारा छिलके के छंदों को तोड़कर स्वच्छंद आकाश में विचरण करने लगती है।

(साभार -साधना पथ)

 

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