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गुरूओं के गुरू हैं साईं बाबा

गृहलक्ष्मी टीम

28th April 2016

गुरूओं के गुरू साईं बाबा ने अपना संपूर्ण जीवन सादगी व फकीराना अंदाज में बिता दिया। अपने जीवनकाल में लेकर आज तक वह अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि कर रहे हैं। त्याग, करूणा, प्रेम और वात्सल्य जैसे गुणों ने साई बाबा को गुरूओं का भी गुरू बना दिया। जानिए करूणामयी साईं के आदर्शों के बारे में -

गुरूओं  के गुरू हैं साईं बाबा

 

 

साई बाबा तो गुरूओं के भी गुरू हैं। बाबा सदगुरू हैं। उन्होंने किसी के कान में मंत्र नहीं दिए। कदाचित् प्रभु की इच्छा साई भक्ति को गुरूओं की परपंरा से मुक्त रखने की रही होगी। किसी पंथ या भक्ति मार्ग में गुरू की आवश्यकता तभी होती है जब आचार्य यानी उस मार्ग के प्रवर्तक की मृत्यु हो जाती है। बाबा कहते रहते हैं- ‘मुझे सदा जीवित ही जानो।' इस संबंध में आए दिन होने वाले भक्तानुभव भी साक्षी हैं कि बाबा प्रत्यक्ष रूप से जनकल्याण कर रहे हैं, लोगों को मुक्ति दे रहे हैं।

साईं सिर्फ साईं हैं

साईं भक्ति के आचार्य भी बाबा ही हैं और सदा विद्यमान रहने वाले सदगुरू भी वही हैं। बाबा के उपदेश ही हमारे लिए गुरू उपदेश हैं। हालांकि बाबा की महासमाधि के बाद कई लोगों ने उनका स्थान लेेने का प्रयास किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इस प्रयास में एक सज्जन की तो मृत्यु ही हो गई। आज भी कई लोग स्वयं को साई बाबा का भक्त कहते हैं और गुरू भी बने रह जाते हैं। कई लोगों की विवश्ता होती है और वे जन भावना के नाम पर गुरू बन जाते हैं। लेकिन साईं बाबा के मार्ग में उनके अतिरिक्त कोई अन्य गुरू नहीं है।

साईं की रहम नजर हमेशा भक्तों पर रहती है

बाबा के मार्ग में भक्त और भगवान के बीच कोई नहीं है। यहां पर भगवान स्वयं सदगुरू हैं। हां, यदि किसी ने पहले किसी को अपना गुरू बना लिया है तो उनको संपूर्ण आदर दें, इससे साईं बाबा उनसे प्रसन्न ही रहेंगे। केवल परिपाटी या परंपरा बनाने से परहेज है। जैसे मध्यकाल में पादरी लोग भोली-भाली जनता को गुमराह करने के लिए स्वर्ग का टिकट दिया करते थे, वैसा नहीं होना चाहिए। सदगुरू साईनाथ स्वयं आपका मार्गदर्शन करेंगे। केवल उनकी शरण में चले जाइए, वे प्रेरणा देते रहेंगे कि इससे आगे क्या करना चाहिए। जितनी व्यक्ति को स्वयं की चिन्ता है उससे कहीं अधिक उसकी चिन्ता बाबा करते हैं। व्यक्ति को अपने भविष्य की चिन्ता है लेकिन बाबा उसके हजारों साल पिछले और अगले जन्मों तक के उसके लेखा-जोखा को देख रहे हैं, ठीक इस समय भी जब ये पंक्तियां लिखी जा रही हैं और उस समय भी जब पाठक इसे पढ़ रहे होंगें। साई की नजर कई ब्रह्मांडों के आर-पार के संसार को देख रही है। उन नजरों में सब कुछ है।

उपवास को नहीं मानते साईं

बाबा उपवास आदि रखने से मना करते थे। वह कहा करते थे व्यक्ति जब उपवास में रहता है तो उसका मन अशांत रहता है। अशांत मन से ब्रह्म को नहीं पाया जा सकता है। ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करना ही वास्तविक उपवास है। अन्न त्याग तो उपवास का विकृत रूप है। बाबा के नाम पर उपवास आदि कर्मकांड को न फैलाया जाए। साथ ही यथासंभव सबके पोषण का ध्यान रखा जाए। क्योंकि धरती के प्रत्येक जीव को भोजन मिलना चाहिए और प्रत्येक मनुष्य को भोजन के अतिरिक्त वस्त्र और आवास मिलना चाहिए। इसके लिए ब्रह्म भाव से जीव की सेवा करनी चाहिए-अन्न, वस्त्र आदि से सेवा सराहनीय है। लेकिन मनुष्योपयोगी अन्न आदि की जमाखोरी अथवा गलत तरीके से धन संग्रह करके अपने पाप को कम करने के भाव से किए जाने वाले भंडारे से साईं प्रसन्न नहीं हो सकते।

 

 

भक्त की खुशी में साईं की खुशी

यदि घोर पाप के बावजूद किसी ने उसका हृदय परिवर्तित हो गया है तो उस पर साईं की कृपा अवश्य होगी। उसका दिया हुआ पत्र-पुष्प साईं अवश्य स्वीकार करेंगे। जो वास्तव में परिवर्तित हो गया, उसका सचमुच पुनर्जन्म हो गया। किसी को जो भी वस्तु दें, वह श्रद्धापूर्वक दें। किसी याचक को यदि कुछ दे न सकें तो उसका अपमान भी न करें। किसी की निंदा न करें क्योकि निंदा से मन में विकार उत्पन्न होते हैं। बाबा की भक्ति में कोई विशेष बंधन नहीं, कोई विशेष कर्मकांड नहीं। लोग अपनी निष्ठा के अनुरूप बाबा की सेवा करें। यदि भक्त को सुविधा होती है कि वे भोजन करके बाबा के मंदिर जाएं तो जा सकते हैं अथवा किसी को वैसे ही जाने से सुविधा होती है तो वैसे ही जाएं। लेकिन स्वयं को अशांत करके भक्ति न करें अथवा बाबा के नाम पर स्वयं को भोग में लिप्त न करें।

बुद्ध वाक्य को ध्यान में रखें-‘वीणा के तार को इतना न कसो कि वह टूट जाए और उसे उतना ढीला न छोड़ों कि वह बजने न पाए।' हां यदि व्यक्ति बाबा को अर्पित करने के बाद ही भोजन करे तो बाबा को प्रसन्नता होती है। बाबा कहते हैं-जो मुझे अर्पित किए बिना कुछ भी नहीं खाता,उसका तो मैं दास हो जाता हूॅं। जहां बाबा की प्रतिमा अथवा चित्र है वहां उनके आगे भोग लगाकर भोजन करना श्रेयस्कर होगा अन्यथा जहां वह उपलब्ध नहीं हैं, वहां मन ही मन साई को अर्पित करके भोजन किया जा सकता है। बाबा के चित्र के आगे धूप-दीप दिखाने से स्वयं का जीवन प्रकाशमय होता है, जीवन में सुगंध फैलती है। वास्तव में हम जब किसी प्रतिमा को दीप दिखाते हैं तो उस दीप के आलोक में हम स्वयं के जीवन को आलोकित करते हैं। बाबा अपने चित्र तथा प्रतिमा में सदैव प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहते हैं। इसके सैंकड़ों प्रमाण मिल चुके हैं।

ऐसे ही हैं साईं

वैसे अपने साईं इतने कृपालु हैं कि एक नमस्कार पर भी रीझ जाते हैं। परन्तु फिर भी साईं बाबा की विशेष कृपा उसी पर होती है जो सदा सत्य के पालन करता है। यदि कोई सत्य के पालन की इच्छा रखते हुए सब कुछ बाबा पर छोड़ देता है तो बाबा विषम परिस्थिति में भी उसके सत्य प्रेम की रक्षा करते हैं। ऐसा प्रत्यक्ष भक्तानुभव है। संक्षेप में, सभी प्रकार के चातुर्य का त्याग कर जो बाबा की शरण में चला जाता है। बाबा उसकी सब प्रकार से रक्षा करते हैं-उसके इस लोक को तो आनंदमय बना ही देते हैं, उसका परलोक भी संवार देते हैं। उसे मुक्त कर देते हैं।

 

(साभार - शशिकांत सदैव, साधना पथ)

 

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