'फादर्स डे' स्पेशल: तो इसलिए पापा की लाडली होती हैं बेटियां

शशिकांत 'सदैव'

18th June 2016

एक समय था जब पिता को पुत्री संतान के नाम से ही खीज होती थी, लेकिन आज कारण भी बदले हैं और हालात भी। बेटी पिता के लिए कोई बोझ या जिम्मेदारी बनकर नहीं रह गई हैं, बल्कि पिता की शान और पहचान का हिस्सा बन रही है। बाप-बेटी का रिश्ता गहरी दोस्ती का रूप इख्तियार करने लगा है। जहां संवेदनाएं भी हैं और परवरिश भी। सिमटती दूरियों में पिता को बेटी की अहमियत नजर आने लगी है तभी शायद आज बेटियां भी पापा की लाडली हो गई हैं और मिलती तवज्जो से बेटियां भी फक्र से कहने लगी हैं-‘हां मैं हूं पापा की लाडली।’

 

लगभग हर बेटे पर अपने वंश को चलाने का भार होता है, इसलिए जब वह पिता बनने जा रहा होता है तो सबसे पहले एक पुत्र संतान को न सिर्फ कल्पना करता है। बल्कि उसकी चाहत भी रखता है। पुत्र की तरफ उसका विशेष रूझान होता है। बेटे को लेकर वह जितना उत्साहित होता है बेटी को लेकर उतना ही निराश होता है, इसीलिए बेटी को बोझ या जिम्मेदारी समझ उससे कम ही लाड-प्यार करता है। परंतु आज समय बदल रहा है, पिता का झुकाव घर के चिराग से ज्यादा घर की रोशनी पर होने लगा है यानी बेटी पर। उसे जीवन में बेटी का महत्व समझ में आने लगा है, इसलिए उसके पूरे जीवन को सजाने-संवारने में अपना पूरा योगदान दे रहा है।

बेटियां जिन्हें कभी ये शिकायत रहती थी कि पापा तो सिर्फ भईया के ही हैं, वो तो सिर्फ उसे ही प्यार करते हैं, वहीं आज बेटियां पापा की आंखों का तारा, उनकी लाडली बन गई हैं। और बेझिझक कहती हैं- ‘हां मैं हूं पापा की लाडली।' सच तो यह है कि आज बेटियां के अंदर भी पापा कि ‘हिटलर' वाली छवि धुंधली होने लगी है पापा का खौफ दोस्ती के रिश्ते में तब्दील होने लगा है। बेटियां पापा की लाडली यूं ही नहीं बन गई, इसके लिए दोनों ने एक-दूसरे को खूब समझा है, बल्कि भरपूर सहयोग भी दिया है।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं भले ही पापा ने किन्हीं कारणों से बेटियों को लाडली न कहा हो लेकिन मन की अतल गहराइयों में पिता का प्रेम व रूझान जितना बेटी की तरफ होता है उतना बेटे की तरफ नहीं होता। ऐसे ही बिटिया भी नैसर्गिक तौर पर अपनी मां से ज्यादा अपने पापा की तरफ अधिक आकर्षित होती है। भले ही पिता-पुत्री के बीच का यह प्यारा रिश्ता आज प्रकट होने लगा हो लेकिन यह पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक है।

पहला स्पर्श और आकर्षण

मनोवैज्ञानिक अरूण मेहता का कहना है कि बेटी के जीवन में यदि किसी पहले पुरूष का स्पर्श या दखल होता है तो वह है उसके पापा। या यूं कहें किसी भी लड़की के जीवन में पहला पुरूष उसके पापा होते हैं। छोटे बाल, मर्दाना कपड़े, रोबीली आवाज, मजबूत हाथ, यहां तक की दाढ़ी-मूंछें भी सबसे पहले बेटी अपने पापा में देखती है। क्योंकि बच्चे मां के साथ अधिक आकर्षित होते हैं। खासतौर पर लड़कियां, क्योंकि लड़कियां मां को स्वयं के बहुत करीब पाती हैं। जैसे-जैसे बड़ी होती हैं उन्हें मां अपने जैसी ही नजर आती है। उसे मां में भी वही स्त्रैण गुण नजर आते हैं जो स्वयं में होते हैं। लेकिन पापा ठीक उसके विपरित होते हैं।

बदलती सोच, बदलता सहयोग

इतना ही नहीं मां कि केयरिंग और पापा की केयरिंग में बेटियां बहुत अंतर पाती हैं। बेटियों को पापा अधिक समझदार एवं स्पोर्टिव लगते हैं। काउंसलर ‘दीपिका चौहान' का कहना है कि एक समय था जब बाप बेटियों को गोद में उठाने से झिझकते थे। फिर एक समय ऐसा आया कि वह बेटियों को मेले घूमने फिरने भी ले जाने लगे। फिर स्कूल में पढ़ाना -लिखाना चालू किया तो उसके भविष्य के बारे में भी चिंता करने लगे। जहां पिताओं को बेटी की शादी की इतनी जल्दी होती थी कि वह बिना सोच-विचार के, बेटी की मर्जी के जिस भी किसी लड़के से शादी कर देते थे, वहीं आज पिता न सिर्फ बिटिया की शादी के लिए बल्कि एक अच्छे करियर के लिए भी फिक्रमंद हैं। आज पिता बेटी का ब्याह कर सिर से बोझ नहीं उतार देना चाहता, उसे अपने पांव पर खड़ी देखना चाहता है, इसलिए उसकी पसंद एवं व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर ही उसके लिए करियर एवं जाॅब चुनना चाहता है या फिर चुनने में बिटिया की मदद करता है। इतना ही नहीं विवाह से पूर्व वह बेटी कि न केवल मर्जी को तवज्जो देता है बल्कि यदि उसका कोई अफेयर है तो उसको भी मद्दे-नजर रखता है। यहां तक कि यदि बिटिया अपने निजी संबंधों से परेशान है तो पिता उन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और मदद करता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सतर्कता और आपसी सामंजस्यता

डाॅ. ‘सरोज' का कहना है कि ‘आज के पिता अपनी बेटियों के प्रति ज्यादा सतर्क हुए हैं। बदलती हवा में उन्हें अपने बेटे से ज्यादा बेटियों से अधिक उम्मीदें हैं। आज के पापा न सिर्फ बेटियों को लोरी सुनाते हैं, बल्कि उनकी नैपी चेंज करने से भी नहीं हिचकिचाते। स्कूल के लिए तैयार करना हो या फिर स्कूल होमवर्क में उनकी मदद करनी हो, खेल, डांस, ड्राइंग-पेंटिग आदि से लेकर उनके पूरे व्यक्तित्व को बनाने में उनका सहयोग देते हैं।'

मनोवैज्ञानिक ‘राहुल आनंद' का कहना है, ‘जैसे-जैसे पिता की उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे उनका बचपना वापस आने लगता है, यानी उन्हें अच्छा लगता है कि कोई उनकी परवाह करे, समझे। और जैसे-जैसे बेटियों की उम्र बढ़ती है उनके अंदर मातृत्व की, यानी समझने -समझाने की,देख-रेख आदि करने की भावना जन्म लेने लगती है। बेटियां पिताजी का खान-पान हो या रख-रखाव, सुबह की चाय हो या दवाइयां सभी का पूरा ख्याल रखने लगती हैं। पिता की जो बात मां को समझ नहीं आती उसे बाप-बेटी की सहायता से मां को या घर के अन्य सदस्यों को समझाने के लिए कहता है। अकेले में बेटी को बुलाकर कभी अपनी भविष्य की योजनाएं बनाता व बताता है तो कभी अपने दिल का दर्द बांटता है। उसे लगता है न केवल बेटी उसकी बातों को तसल्ली से सुनेगी-समझेगी, बल्कि कोई हल ढंढने में मदद भी करेगी। यही कारण है कि बेटी को समाज या घरवाले भले ही बोझ या बुरी मानें, लेकिन शादी के वक्त बाप विदाई में फूट-फूट कर रोता है। कहीं न कहीं बाप-बेटी का रिश्ता अच्छी दोस्ती से गुजरते-गुजरते पुत्र और मां का रूप लेने लगता है, इसलिए शादी के बाद भी और मृत्यु से पूर्व तक पिता का पुत्री से मोह नहीं जाता, वह उसकी लाडली बनी रहती है।'

बेहतर विकल्प

स्माज सेविका ‘रेखा सरीन' इसी विषय पर प्रकाश डालते हुए कहती हैं, आज शहरों में अधिकतर महिलाएं भी काम पर जाती हैं, ऐसे में पुरूष अपनी बेटियों के परवरिश की ओर अधिक जागरूक हुए हैं। खासतौर पर जिस तरह का माहौल आजकल है ऐसे में बेटियों को सुरक्षा प्रदान करना जरूरी है। फिर चाहे सेक्स एजुकेशन हो या फिर उनकी रिलेशन काउंसिलिंग । यही नजदीकियां पापा को उनकी बेटियों के प्रति और भी संवेदनशील और भावुक बनाता है।

बेटियों के प्रति पिताओं के बढ़ते लगाव का कारण वर्तमान में बढ़ते बेटों से निराशा तथा बेटियों की तरक्की भी है। ऐसा नहीं है कि बेटे तरक्की नहीं कर रहे या वह किसी लायक नहीं, लेकिन बेटों की जीवनशैली, उनकी प्राथमिकताएं एवं जरूरत आदि बदल गई हैं। वह अपने शौक एवं परिवाद तक ही सिमटकर रहना पसंद कर रहे हैं, जिसके कारण वह लापरवाह एवं गैरजिम्मेदारी की ओर बढ़ रहे हैं। परिवार वालों को दिखने लगा है कि भविष्य में बेटों से कुछ खास उम्मीद नहीं लगाई जा सकती । ऐसे में बेटियां न सिर्फ उम्मीद का सहारा नजर आ रही हैं, बल्कि पिता एवं घर-परिवार को शान-पहचान में भी इजाफा कर रही हैं।

सच तो यह है कि बेटियां आज घर की चार दीवारी में चौके-चूल्हे तक ही सीमित नहीं है। वह स्कूल में अव्वल भी आने लगी हैं तो मां का हाथ भी बंटाने लगी है। न सिर्फ पापा का स्कूटर या खर्चा उठाना भी जानती है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां बेटियां विजय पताका न फहरा रही हों। ऐसे में बेटियां बेटे का बेहतर विकल्प साबित हो रही हैं। जब बेटियां किसी से कम नहीं तो क्यों न हों वह पापा की लाडली?

बिछड़ने का गम

आज पिता फक्र से कहते हैं ‘यह मेरी बेटी नहीं बेटा है या मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं, आदि। यह बात भले ही सच हो, लेकिन यह भी सही है कि कहीं न कहीं पिता यह भी जानता है कि ‘बेटियां पराया धन है' यानी एक दिन उन्हें ससुराल जाना है। बेटे तो सदा के लिए साथ रहने वाले हैं। बेटियों तो सिर्फ घर का मेहमान बनकर ही रह जाएंगी। इसी मोह में पिता बेटी के और करीब हो जाता है। उसे लगता है मैं जितना भी लाड-प्यार अपनी बेटी को दूं वह कम है विदाई का यह भय भी पिता को बेटी के प्यार में और भी बांधे रखता है, जिससे उसका लाड-प्यार और बढ़ जाता है।

‘डाॅ. अनुराधा मुखर्जी' का कहना है कि ‘बेटियां बेटों के मुकाबले नाजुक, कोमल व संवेदनशील होती हैं। बेटे रफ एंड टफ होते हैं। अधिकतर माता-पिता यही सोचते हैं कि बेटा तो कैसा भी हो उसकी शादी तो हो ही जाएगी। यदि कोई चेहरे या हाथ-पैर पर चोट आदि का निशान भी हो तो क्या लड़के की शक्ल नहीं अक्ल और तनख्वाह अधिक मायने रखती है। लेकिन यदि लड़की का चेहरा या हाथ-पांव खराब हो जाए तो शादी में दिक्कतें आती हैं, इसलिए बाप बेटियों की हिफाजत व परवाह कुछ ज्यादा ही करते हैं।'

एक नया अनुभव

इतना ही नहीं अपनी बेटी को अपने हाथों बड़ा करना, उसका रख-रखाव करना पिता के लिए अलग और नया अनुभव होता है। पिता जीवन में खुद उस उम्र एवं पड़ाव से गुजर चुका होता है। उसे पता होता है। लड़के कैसे होते हैं? कब, क्या, क्यों और कैसा चाहते हैं? बेटे की हरकतें, खेल, लड़ाई, शैतानियां आदि पिता के लिए उतनी नई नहीं होती, जितनी बिटियों की हंसी, आवाज, अदाएं, कामेलता, सौंदर्य। जब भी कोई दम्पति माता-पिता बनने वाले होते हैं तो अक्सर मां यही कहती है, ‘मुझे तो बेटा चाहिए और पति छूटते ही कहता है नहीं लड़के तो शैतान होते हैं मुझे तो प्यारी सी बेटी चाहिए।' शायद बेटी के प्रति लगाव पिता में पुत्री की तरफ पहले से ही होता है। उसको पाल-पोसकर बड़ा करना, उसके हक में बात करना उसे अच्छा लगता है। इसीलिए पिता बेटों को तो कई बार वजह-बेवजह भी डांट-पीट देते हैं, लेकिन बेटियों को मारना तो दूर डांटने से पहले सोचते हैं या फिर डांट कर साॅरी फिल करते हैं, शायद कहीं न कहीं पिता पुत्री से ज्यादा लाड करते हैं जो कई बार तो जाहिर हो जाता है कई बार नहीं। जहां जाहिर हो जाता है वहां बेटियां खुलकर कहती हैं, ‘हां, मैं हूं पापा की लाडली।'

 

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