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दादी की मिली सीख

अल्पिता घोंगे

3rd August 2017

दादी की मिली सीख

तब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी। गरमी की छुट्टियों में मेरी कॉलोनी की सहेलियां मेरे घर खेलने आया करती थी। मेरी दादी मां छुट्टियों में चावल और उड़द के पापड़ बना छत पर सुखाती थी। एक दिन मम्मी ऑफिस गई हुई थी। दादी मां ने चावल के पापड़ बनाए थे। मेरी सहेली सुप्रिया बोली, 'मुझे चावल के पापड़ बहुत पसंद है लेकिन मेरी मम्मी तो बनाती नहीं है। तो ये पापड़ मुझे दे दो। मैंने सारे के सारे पापड़ उसे दे दिए। शाम को दादी ने मम्मी से कहा, 'बहू दो-चार पापड़ तलकर देखो, कैसे बने हैं? मम्मी ने मुझे पापड़ लाने को कहा, तब मैं घबरा गई। रोते-रोते सब मम्मी को बता दिया। मम्मी मुझे मारने दौड़ी। दादी मां ने मुझे बड़े प्यार से समझाया कि चावल के पापड़ बहुत मेहनत से बनते हैं। सहेली को दो-चार पापड़ देने चाहिए थे, सब नहीं देते बेटा। शाम को सहेली की मम्मी पापड़ लेकर हमारे घर आई। पापड़ तो वापस नहीं लिए पर मुझे नई सीख मिली कि बड़े लोगों से पूछे बिना छोटों को निर्णय नहीं लेना चाहिए।

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