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कैसे करें अपने पैसे का प्रबंधन

मधूलिका सिन्हा

23rd July 2016

बदलते समय के साथ नौकरीपेशा होने के बावजूद महिलाएं गृहणी होने की अपनी अहम जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पाई हैं। लगातार बढ़ती मंहगाई के इस दौर में परिवार के खर्चे चलाना और उसी में से बचत की गुंजाइश भी बनानी पड़ती है।

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की दसवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है। विकास दर के लिहाज से यह शीर्ष तीन देशों के साथ कदमताल मिलाकर बढ़ रही है। करीब सवा अरब की आबादी वाले इस देश ने अपने सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद वैश्विक मंदी के झटकों को उस समय बखूबी झेला जब इसने दुनिया की आर्थिक महाशक्ति अमेरिका की चूलें हिला दी थीं। अर्थव्यवस्था की इस मजबूती का आधार देश में वित्तीय प्रबंधन के दिलचस्प घरेलू नुस्खे रहे हैं जिसमें अर्थशास्त्र का कोई बड़ा सिद्धांत छुपा हुआ नहीं है।

 


वित्तीय प्रबंधन के इन नुस्खों में आय के अनुरूप पांव पसारने, फिजूलखर्ची से परहेज, रोजमर्रा के खर्चों में थोड़ी बहुत कटौती और छोटे-मोटे निवेश की आदतें हमेशा से ही बड़ी भूमिका में रही हैं, इनसे न सिर्फ घर परिवार के भविष्य की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने मे मदद मिली है बल्कि ये आर्थिक मोर्चे पर मिलने वाले जोखिमों से लडऩे की ताकत भी बनी हैं।


भारतीय समाज की संरचना ऐसी है कि परिवार में वित्तीय प्रबंधन का सबसे बड़ा दारोमदार गृहणियों पर होता है। बदलते समय के साथ नौकरीपेशा होने के बावजूद महिलाएं गृहणी होने की अपनी अहम जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पाई हैं। लगातार बढ़ती मंहगाई के इस दौर में परिवार के पुरुष सदस्यों या खुद कमाए गए पैसों से परिवार के खर्चे चलाना और उसी में से बचत की गुंजाइश बनाए रखते हुए उसे अपने वित्तीय प्रबंधन कौशल की हर रोज कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है। दुनिया के जाने-माने निवेश विशेषज्ञ वारेन बफेट ने वित्तीय प्रबंधन के कुछ स्वर्णिम नियम गिनाए हैं। यह वह नियम हैं जो हर देश और काल की कसौटी पर खरे उतरे हैं। इन पर अमल करके आर्थिक संसाधनों की न सिर्फ बेहतर देखभाल की जा सकती है बल्कि भविष्य में किसी भी तरह के वित्तीय जोखिम से लडऩे की ताकत भी हासिल होती है।

 


आय व्यय का आंकलन
कुशल वित्तीय प्रबंधन के लिए आय और व्यय का सही आंकलन पहली शर्त है। सारा वित्तीय प्रबंधन इसी पर टिका रहता है। यह समझना जरूरी है कि आय के स्रोत क्या हैं। एक तय अवधि मे कितना पैसा हमारे पास रहेगा और उसमें से क्या खर्चे होंगे। मंहगाई बढऩे से खर्चों में कितनी बढ़ोतरी होगी। ऐसे में किन खर्चों में कटौती जरूरी हो जाएगी। आय बढ़ाने के विकल्प क्या होंगे आदि।


बजट
आय व्यय के आंकलन के बाद व्यावहारिक बजट बनाना दूसरी शर्त है। बजट ऐसा होना चाहिए जिसमें खर्चों को आय के दायरे में रखने, आमदनी का अधिकतम सदुपयोग करने, देनदारियों को समय पर चुकाने और इन सबके बीच बचत के लिए भी कुछ बचाकर रखने की गुंजाइश बनी रहे।


फिजूलखर्ची से परहेज
पहला नियम फिजूलखर्ची से परहेज का है, जो पैसों को समझदारी के साथ खर्च करने से जुड़ा है। इसके अनुसार दूसरों की देखा देखी, शौकिया या विज्ञापनों के मोहजाल में फंसकर ऐसी कोई वस्तु कभी नहीं खरीदनी चाहिए जिसकी आपको आवश्यकता नहीं है वरना एक दिन ऐसा आ जाएगा जब आपको ऐसी चीज बेचनी पड़ जाएगी जिसकी आपको सबसे अधिक जरूरत है।


बचत की आदत
फिजूलखर्ची की आदत पर काबू पा लिया गया तो समझ लीजिए बचत का आधा रास्ता तय हो गया। इस बारे में बफेट का कहना है कि सारे खर्च होने के बाद जो रकम रह जाए उसे बचत करने की बजाए बचत करने के बाद जो पैसा बचे उसे खर्च के लिए रखिए। ऐसा मानना सरासर गलत है कि जो लोग बचत करते हैं वह अपने शौक और अपने मन को मारकर ही ऐसा कर पाते हैं। इसके लिए कोई बड़ा बलिदान करने की आवश्यकता नहीं होती, थोड़ी सी समझदारी जरूर चाहिए। कोई भी चीज खरीदते समय अति उत्साह में आकर तुरंत फैसला नहीं लें। ठंडे दिमाग से विचार करें। बचत के रास्ते पर चलने के लिए यह पहली शर्त है। आवश्यक नहीं कि आप बड़ी बचत करें। छोटी-छोटी बचत की आदत डालें।


बचत का लक्ष्य
आपके बचत का लक्ष्य और प्राथमिकताएं क्या है, यह सबसे अहम है। बचत किस चीज के लिए की जा रही है और उसकी आवश्यकता कितनी है, यह तय करना सबसे जरूरी है। यदि उद्देश्य स्पष्ट हो तो निवेश और बचत दोनों आसान हो जाते हैं। बफेट सलाह देते हैं कि बेहतर होगा कि बचत खाते को उद्देश्य के अनुरूप एक नाम दे दें। मसलन- मकान खरीद के लिए बचत। बच्चों की पढ़ाई के लिए बचत, वृद्धावस्था में नियमित पेंशन के लिए बचत आदि। ऐसा करने वाले ज्यादा स्मार्ट बचतकर्ता साबित हुए हैं।


बचत और निवेश के विकल्प
आर्थिक जरूरतें आकस्मिक हो सकती हैं या फिर तय समयानुसार आने वाले खर्च जैसे शादी ब्याह, बच्चों की पढाई, घर मकान खरीदने और बुढ़ापे में एक नियमित आय के स्रोत की जरूरत के तौर पर सामने आ सकती है। आज लोगों की आर्थिक क्षमता और सुविधा के अनुसार निवेश और बचत के कई विकल्प हैं।

इनमें शेयर बाजार और म्युचुअल फंड, भविष्य निधि और पेंशन कोष, स्वास्थ्य या जीवन बीमा, डाकघर बचत खाता तथा बैंक सावधि जमा, किसान विकास पत्र और राष्ट्रीय बचत पत्र योजना आदि शामिल है। इसमें यह देखना जरूरी है कि आप अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बचत या निवेश कर रहे हैं या फिर ऐसा करने के पीछे आपका मकसद पैसों की वृद्धि करना है। यदि मुख्य लक्ष्य मुनाफा कमाना है तो शेयर बाजार, रियल स्टेट, म्युचुअल फंड और ऐसे बेहतर रिटर्न वाले वित्तीय उत्पाद अच्छा विकल्प हो सकते है पर बाजार जोखिम जुड़े होते हैं। इसलिए ऐसे निवेश में तभी हाथ डालें जब आप ऐसे जोखिम को झेलने की क्षमता रखते हों, वरना यह आपके लिए बड़ा खतरा हो सकता है।

यदि आपका इरादा मुनाफा कमाने की बजाए केवल बचत करने का है तो फिर बैंकों और डाकघरों के बचत खातों में सावधि जमा निवेश ज्यादा सुरक्षित हैं। एक निश्चित अवधि की जमा पर आप मासिक स्तर पर या फिर सालाना स्तर पर निश्चित ब्याज अर्जित कर सकते हैं। ऐसे निवेश में आपका मूल धन हमेशा सुरिक्षत रहता है और जरूरत पडऩे पर आप इसे निकाल सकते हैं।


निवेश से जुड़े जोखिम पर नजर
बचत और निवेश समझदारी है लेकिन इनके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं, खासकर तब जब यह बाजार से जुड़े हों। ऐसे में यह देख लेना जरूरी है कि ऐसे जोखिम को वहन करने की आपकी क्षमता कितनी है। ऐसे निवेश के लिए पेशेवर की सलाह अवश्य लें। यदि आपकी आय नियमित और सीमित है तो बचत और निवेश का ऐसा विकल्प चुनें जिससे समय पडऩे पर आपका पैसा तुरंत आपके हाथों में आ सके। कम से कम अवधि में ज्यादा लाभ अर्जित करने के प्रलोभन में नहीं आएं दीर्घअवधि का निवेश ज्यादा सुरक्षित होता है। निवेश और बचत से जुड़े जोखिम से बचने का मूलमंत्र यह है कि निवेश या बचत पोर्टफोलियो में विभिन्नता बनाए रखें यानी कि कुछ पैसा शेयर में तो कुछ बैंक बचत खातों में तो कुछ अन्य वित्तीय उत्पादों मे लगाएं। निवेश और बचत पर लगातार नजर रखना भी जरूरी है। ध्यान रखें कि इस बीच आपकी आर्थिक आवश्यकताओ में क्या परिवर्तन हो रहा है। निवेश या बचत उनके अनुरूप सही बैठ रहे हैं या नहीं। उनमें बदलाव की कितनी दरकार है।


कर्ज का प्रबंधन
कर्ज प्रबंधन वित्तीय प्रबंधन का अहम हिस्सा हैैं। कभी विलासिला समझी जाने वाली चीचें उपभोक्तावाद के इस युग में अब आवश्यकता हो गई हैं। बाजार में आ रहे नित नए उत्पाद लोगों को ऐसे मोहपाश मं ेफांस रहे हैं कि उनकी जकड़ से निकल पाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में लोगों में कर्ज लेने की प्रवृत्ति बढऩे लगी है। लोगों की इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए कंपनियां और बैंक अपना कारोबार बढ़ाने के लिए क्रेडिट कार्ड के जरिए खरीदारी को प्रोत्साहित करते हैं। उधारी में खरीद का यह चलन आसान लगता है लेकिन जब भुगतान की बारी आती है, तब पता चलता है आप कर्ज के कैसे दुष्चक्र मे फंस चुके हैं। ऐसे में कर्ज तभी लें जब यह बेहद आवश्यक हो।

कुल मिलाकर आय के अनुरूप वित्तीय प्रबंधन के लिए आपको कोई बड़ा अर्थशास्त्री बनने की दरकार नहीं है, थोड़ा सी सूझबझ और इच्छाओं को नियंत्रित करने की आदत डालकर आप अपने लिए एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच तैयार कर सकते हैं। गलतियां सभी से होती हैं। बस ध्यान इस बात का रखना है कि पुरानी गलतियों से सीख लें उन्हें दोहराने की भूल नहीं करें।

 

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