GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

यौन जानकारी के अभाव में किशोरावस्था में बढ़ते गर्भपात

ऋचा कुलश्रेष्ठ - दरकार

23rd July 2016

किशोरावस्था में गर्भधारण के अधिक मामले अशिक्षित लड़कियों में देखे जाते हैं जो स्कूली पढ़ाई कर चुकी लड़कियों के मुकाबले नौ गुना अधिक होते हैं।

यौन जानकारी के अभाव में किशोरावस्था में बढ़ते गर्भपात


सूचना अधिकार के माध्यम से गर्भपात के मुद्दे पर हासिल एक जानकारी के मुताबिक मुंबई की किशोरियों में गर्भपात की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। मुंबई के एमटीपी (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी) सेंटर्स से जुटाए गए नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक 2013-14 में 15 वर्ष से कम उम्र की 111 लड़कियों ने गर्भपात कराये थे। यह संख्या 2014-15 में बढ़कर 185 हो गई, जो 67 फीसदी की बढ़ोतरी है। 15 से 19 वर्ष की लड़कियों के मामले में भी इसी बीच 47 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

ये आंकड़े मुंबई नगर निगम के उन सरकारी हेल्थ सेंटर्स के हैं, जिन्हें कानूनी तौर पर गर्भपात कराने की इजाजत है। जबकि ऐसे मामलों में ज्यादातर मध्यमवर्गीय लोग निजी क्लीनिक में ही जाना पसंद करते हैं ताकि इस बात का किसी को पता न लगे। इसी तरह एक गैर सरकारी संगठन द्वारा किए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के निष्कर्षों के अनुसार किशोरावस्था में गर्भधारण के अधिकतर मामले अशिक्षित लड़कियों में देखे जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक निरक्षर लड़कियों में गर्भवती होने के मामले स्कूली पढ़ाई कर चुकी लड़कियों के मुकाबले नौ गुना अधिक होते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि हमारे देश में अब पश्चिम की तर्ज पर काफी खुलापन आ रहा है लेकिन साथ ही यह भी सच है कि हम आज भी आधुनिकता का मात्र ढोंग ही कर रहे हैं। वास्तव में आधुनिकता क्या होती है, हमें अब भी समझ नहीं आया है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ें-लिखें और उच्च पदों पर आसीन हों लेकिन हम उन्हें अपने फैसले करने तक की आजादी नहीं देते।

हमारे इस दोगले समाज में अधकचरी जानकारी बच्चों को सही रास्ता दिखाने के बजाय ऐसे रास्ते पर ले जा रही है जो उनके लिए नया और अनजाना है। इंग्लैंड की एक रिपोर्ट के अनुसार एक तिहाई से ज्यादा स्कूलों में सेक्स और संबंधों पर उपयुक्त शिक्षा का अभाव बच्चों में यौन शोषण और असंगत यौन व्यवहार का खतरा बढ़ा रहा है।

पिछले ही दिनों बीबीसी की एक रिपोर्ट में मैंने पढ़ा कि उत्तरी लिंकनशायर में बर्टन के कैसलडाइक प्राइमरी की शिक्षिका लिनेट स्मिथ न केवल बच्चों को यौन शिक्षा देती हैं बल्कि आसपास के इलाकों के शिक्षकों को यौन शिक्षण के लिए प्रशिक्षित भी करती हैं। वो हाथ से बने चित्रों को दिखाने के बाद बच्चों से अंगूठा ऊपर या नीचे कर अच्छी और खराब बातों पर प्रतिक्रिया जाहिर करने को कहती हैं। लिनेट चित्रों वाले कार्डों के माध्यम से चार साल से लेकर 10-11 साल तक के स्कूली बच्चों को यौन जानकारी देती हैं।

सबसे अच्छी बात यह है कि वो बच्चों को पढ़ाने से पहले अभिभावकों का एक सत्र बुलाकर उन्हें भी समझाती हैं कि प्राइमरी स्कूल से बच्चों को इस बारे में बताना कितना जरूरी है और यह भी कि अभिभावकों को बच्चों के ऐसे सवालों के जवाब सहजता से देने चाहिए। अगर किसी को जवाब नहीं पता तो किताबों या इंटरनेट पर खोजे लेकिन कभी ये नहीं कहना चाहिए कि जब तुम बड़े हो जाओगे, तब इस बारे में बात करेंगे। अपनी जिज्ञासा शांत न हो पाने के कारण पैदा हुई उनकी उत्सुकता उन्हें स्वयं इंटरनेट पर जवाब तलाशने को मजबूर कर देगी जिसका परिणाम उनके अधपके दिमाग को गलत दिशा मिलना भी हो सकता है।

आज हालात ऐसे हैं कि हमें समझदार होते ही, यानी करीब 8-10 साल की उम्र में ही लड़कों और लड़कियों दोनों को मासिक धर्म और यौन शिक्षा से जुड़ी पूरी जानकारी खुलकर देनी चाहिए। हम अपने रहन-सहन में तो पश्चिमी देशों की नकल करने लगे हैं लेकिन इस मामले में बहुत संकुचित हैं। हमारे यहां यौन शिक्षा के नाम पर लड़कियों को थोड़ी बहुत मासिक धर्म की जानकारी दी जाती है, वह भी न चाहते हुए, मजबूरी में। इस पर भी माताएं पूरी बात छिपा जाती हैं। मेरा मानना है कि सिर्फ लड़कियों को ही नहीं बल्कि लड़कों को भी मासिक धर्म के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए ताकि बचपन से ही वह अपनी माता और बहन समेत सभी लड़कियों की इज्जत करें।

कई बार माताएं अपनी लड़कियों को लड़कों से दूर रखने के लिए भी उन्हें गलत यौन जानकारी देकर भ्रमित कर देती हैं, जिसके दुष्परिणाम शायद वे नहीं जानती। गलत जानकारी या जानकारी न होने के कारण बच्चों में जो उत्सुकता पैदा होती है, वही आगे चलकर उन्हें सही-गलत का भेद नहीं करने देती, जिसका परिणाम गर्भपात के रूप में देखने को मिलता है। आज दरकार है कि अपने बच्चों, यानी लड़कों और लड़कियों दोनों को ऐसी जानकारियां सही समय पर सही तरीके से दी जाएं और उनसे दोस्ताना व्यवहार रखा जाए, ताकि ताकि अपने जीवन में घटने वाली हर छोटी-बड़ी बात वे अपनी मां के साथ साझा करें। संभव है कि गर्भपात के यह आंकड़े बहुत नीचे पहुंच जाएं और कम उम्र में बच्चों को अवांछित जिम्मेदारियों और मानसिक तनावों से न जूझना पड़े।