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मायका ही मायका...

आशा प्राण

12th December 2016

पति पत्नी में अपने-अपने मायके की तारीफों के पुल बांधने की होड़ लगी रहती है। कई बार तो यह कंपटीशन लार्ज स्केल पर पहुंच जाता है। इस हॉट डिस्कशन के प्रत्यक्षदर्शी होते हैं उनके बच्चे।

मायका ही मायका...


हर महिला की कमजोरी उसका मायका होती है। मायका शब्द सुनते ही उसके चेहरे पर एक अजीब सी रौनक आ जाती है। ससुराल पक्ष का जिक्र आते ही यह लहर ऐसी गायब होती है कि पूछो मत। सच तो यही है न कि आपका ससुराल पति महोदय का मायका है। मजे की बात यह है कि पति पत्नी में अपने-अपने
मायके की तारीफों के पुल बांधने की होड़ लगी रहती है। कई बार तो यह कंपिटीशन लार्ज स्केल पर पहुंच जाता है। इस हॉट डिस्कशन के प्रत्यक्षदर्शी होते हैं उनके बच्चे। वे भी मजे ले-लेकर इस तमाशे को एन्जॉय करते हैं। चरम सीमा तब होती है जब बच्चा पलटन दो दलों में विभाजित दिखाई देने लगती है।

कोई दादी का पक्षधर होता है, तो कोई नानी का। उन्हें दल बदलते भी देर नहीं लगती। जिस तरफ से अच्छी गिफ्ट मिली उसकी ही तरफ हो लिए। इसके साथ ही उन्हें सख्त हिदायत भी होती है कि वे नानी के पाले की बात दादी तक न पहुंचाएं और न दादी की बुराई नानी के कानों तक जाए। एक ही शहर में ससुराल और मायका होने पर सच्चाई सामने आ जाती है। दूसरे शहर की बात और है। वहां कौन देखने जा रहा है इसलिए देवी जी की डींगे चल जाती हैं। मायकेवाद की सबसे ज्यादा खिलाफत डियर सासू मां करती नजर आएंगी। उन्हें कैसे बर्दाश्त हो कि कल को इस घर में पैर रखने वाली बहू उन्हें और उनके खानदान को डाउन करके अपनी फैमिली को द ग्रेट सिद्ध करे। फिर शुरू हो जाता है बैक फॉयर यानी सासू मां के परिवार का यशोगान। इस यशोगान की सूची में उनके नाते रिश्तेदार, भाई बंधु सब अपना स्थान पा लेते हैं। यह सब सुनते हुए ससुर महोदय मंदमंद मुस्कुरा कर किनारा करने में ही अपनी खैर समझते हैं। उन से ज्यादा अपनी ससुराल की असलियत भला कौन जानता होगा। सासू मां भी कम थोड़े ही होती हैं। अपनी कही बात का पक्ष पुख्ता करने की खातिर ससुरजी से 'हां के पोज में सिर तो हिलवा ही लेती हैं, झूठा ही सही।

किटी पार्टी में मायकेवाद की तूती खूब रंग दिखाती है। वहां पर सभी कैंडीडेट 'अपनी- अपनी ढफली अपना-अपना राग अलापते नजर आते हैं।
अगर किसी ने मिसेज सिंह की पहनी हुई नई ज् वैलरी को पिन प्वाइंट कर दिया, बस वह शुरू- यह तो उनकी मॉम की लेटेस्ट गिफ्ट है। भतीजा होने की इतनी बड़ी गिफ्ट बाप रे बाप, यकीन न आने पर कई महिलाओं के चेहरे पर असमंजस के हावभाव भी नजर आ जाते हैं। पर इससे कोई फर्क पडऩेवाला नहीं।
अगर खुदा न खास्ता खानदान में कोई रिश्तेदार किसी रुतबे वाले के पद पर आसीन हो गया तब तो सुनने वाले के कान पक जाते हैं, पर सुनाने वाले बाज नहीं आते। बात-बात पर भैयाजी/अंकलजी का जिक्र आना स्वाभाविक है। देखते तब बनता है जब दूसरी महिला अपने मायके की तूती बजाना शुरू कर देती है। विषय पैसे का हो, सुंदरता का हो या फिर किसी अच्छे ओहदे का। मायकेवाद के चक्कर में पड़ कर हर महिला यह भूल जाती है कि उसका असली घर अब पति का घर है। श्रीमानजी की कमाई से ही उसे आंका जाएगा। इस परिवार की आन-बानशान ही उनका असली स्टेटस होगा।

बिना उड़े हुए अगर हम जमीन पर पांव रखेंगे, तभी दूसरे हमारा सही मूल्यांकन कर पाएंगे। दूसरों के मुंह से खुद-ब-खुद निकले तारीफ के शब्द सच्चे होते हैं। इन्हें सुनने का आनंद ही कुछ और है। मायके का गुणगान करने की बजाय जरा अपने पति के मायके को भी सद्भाव से याद करके देखें, फिर श्रीमानजी भी ग्लैड हो कर आपके स्वर में स्वर मिलाकर आपके घर वालों को सिर माथे बिठाएंगे। यह एक्सपेरिमेंट भी है- नॉट बैड!