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मन हो आलोकित तो सदा रहे दीपावली

अन्शु पाठक - परिवर्तन का दर्पण

29th July 2016

दीपावली पर्व है पुरुषार्थ का, अंधकार की कालिमा से ज्ञान के उजियारे की स्वर्णलालिमा तक जाने का, हर घर-आंगन में ज्ञान का ज्योतिकलश छलके, हर गृहणी अपनी देहरी पर जलते दीप का दिव्यार्थ समझे...

मन हो आलोकित तो सदा रहे दीपावली



कार्तिक मास की अमावस्या अपने साथ हर्ष, उल्लास, उमंग व आशाओं का एक नया वर्ष लिए फिर आ गई। दीपावली यानि दीपों की पंक्ति और निरंतर पांच दिन तक चलने वाले उत्सव। श्रीराम 14 वर्ष का वनवास समाप्त होने पर लंका पर विजय प्राप्त कर जब अयोध्या आए तो अयोध्यावासियों ने अमावस्या की कालिमा को दीपों की रोशनी से सराबोर कर दिया। यूं तो हमारे सभी उत्सव जीवन में नई ऊर्जा नए उत्साह का संचार करते हैं, रोजमर्रा की दिनचर्या में गति व सकारात्मकता लाते हैं किंतु धीरे-धीरे सादगी का स्थान मिथ्या आडंबर लेने लगे, पूजा अर्चना में पाखंड समाने लगे व सौहार्द्र, मैत्री व परस्पर मेल मिलाप की जगह कटुता, ईष्र्या व प्रतिस्पर्धा ने ले ली।

दीपावली पर जगह-जगह रामलीला का आयोजन होता है, कहीं फूहड़ हास्य तो कहीं संवेदनशील व कलात्मक प्रयोगों से श्रीरामकथा का मंचन होता है। जितना भव्य पंडाल उतना बड़ा आयोजन, बिजली, शामियाने, खाने-पीने के स्टाल व लाउडस्पीकर। ऐसे आयोजनों पर लाखों रुपया स्वाहा किया जाता है जो मेहनत की कमाई होता है, इसमें संदेह ही है क्योंकि छोटी सी सत्यनारायण कथा करवाने के लिए भी मध्यवर्गीय परिवार को सोचना पड़ता है। क्या संदिग्ध गतिविधियों की आशंका वाले ऐसे आयोजनों के प्रति सोच बदलनी नहीं चाहिए।

दीपावली का त्योहार आपसी सौहार्द्र के लिए अहम है किंतु जो बड़े से बड़े और महंगे से महंगे उपहार देने की प्रथा विकसित हो गई है। उपहार देने वाला व्यक्ति काम पूरा होने की अपेक्षा रखता है, लेने वाले को स्वीकृति देनी ही पड़ती है। क्या ये भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं? आज एकल परिवारों में मिठाई बनाने का रिवाज खत्म हो चला है। अब बाजार में उपलब्ध गुझिया नमकीन व ब्रैंडेड मिठाइयों का प्रचलन है। भले ही टीवी चैनल सप्ताह पहले से खोया, मावा व घी के नकली या मिलावटी होने की रिपोर्ट दिखाते रहें, हमारी बला से। और त्योहार के दिनों में इतने गरिष्ठ भोजन, तले भुने पकवान व मिठाइयां पेट और हृदय संबंधी बीमारियां, डाइबिटी, एसिडिटी, अपच ही तो करती हैं, लेकिन हम कहां मानते हैं सैचुरेटेड आहार लेने से।

 


कभी आपने सोचा है कि अपने बच्चों के लिए जो पटाखे आप बाजार से खरीदते हैं वे कैसे और कहां बनते हैं? रंग-बिरंगे कागज की पन्नियों में जो बारूद लपेटा जाता है वो नन्हे मासूम असहाय गरीब बच्चे भरते हैं। वे बच्चे जो शायद कभी स्कूल में रसायनशास्त्र न पढ़ सकें लेकिन पेट व परिवार को पालने के लिए अपने कोमल हाथों व नाजुक त्वचा को कार्बन मोनोक्साइड, जिंक, मैगनीज, कैडमियम, सल्फर डाईऑक्साइड जैसे विषैले रसायनों के जोखिम में डालते हैं। लेकिन हमारी बला से, आखिर सालभर का त्योहार है दीवाली, तो क्यों पटाखे न छोड़े जाएं? पड़ोसी ने 1000 के खरीदे तो हम 1500 के तो लाएंगे ही न। भले ही पहले से प्रदूषित हवा को और जहरीला बनाने में योगदान हो।

दीवाली की रात हमारा वायुमंडल जिस जहरीली परत को ओढ़ लेता है, महीनों तक वही हवा हमारे फेफड़ों में जाती है, सांस की बीमारियां, अस्थमा, श्वास रोग होते हों तो हों। राजधानी दिल्ली में ही 5000 मीट्रिक टन कचरा जले पटाखों से दीवाली की अगली सुबह निकलता है, मुंबई में इसका दोगुना लेकिन दीवाली के बाद नववर्ष की पहली सुबह फिर स्वागत होता है जगह-जगह फैले पटाखों की धज्जियों, पुराने गिफ्ट पेपर सूखे फूलों के गुलदस्तों से।

एक अन्य कुरीति जुड़ी है दीपावली से जुआ खेलने की। गलत काम के लिए तर्क ये कि शगुन है। आज रात जुआ खेलना ही पड़ेगा, प्रथा है। महाभारत मिसाल है कि धर्मराज ने भाइयों, पत्नी को दांव पर लगा कर राजपाट गंवा दिया। ... विचार कीजिए कि भाग्य युधिष्ठिर का अच्छा था या फिर दुर्योधन का, जिसके साथ शकुनि भी पासा डालने को थे। आज तो जमाना फैमिली गैम्बलिंग का है जहां जुआ खेलना शर्म नहीं शान की बात है। अभिजात्य वर्ग ही नहीं अब उच्चवर्ग से मध्यम वर्ग तक शान से कार्ड पार्टियां करने लगे हैं और ऐसी कार्ड पार्टियां भला बिना मदिरा के संभव हैं? जुआ तनाव देता है लेकिन कोई धर्मगुरु इससे दूर रहने का प्रवचन नहीं देता। आज जब सामाजिक व पारिवारिक विघटन हो रहा है, धाॢमक कुरीतियां व रुढि़वादिता चरम पर है तो क्या हमें विचार नहीं करना चाहिए।

दीपावली का वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक महत्व सही अर्थो में समझें। परस्पर मेलमिलाप का यह त्योहार आज कई तरह के अंधकार से घिरा है। असहिष्णुता, वैमनस्य, भेदभाव, सौहाद्र्र का अभाव अमावस्या की रात्रि से अधिक खतरनाक है। जब घर परिवार आसपड़ोस, समाज में सद्भाव, प्रेम, मेलमिलाप न रहे तो कैसा उत्सव कैसी खुशी? दीपावली पर्व है पुरुषार्थ का, अंधकार की घोर कालिमा से ज्ञान के जगमग उजियारे की स्वर्णलालिमा तक जाने का, हर गृहलक्ष्मी के घर-आंगन में ज्ञान का ज्योतिकलश छलके, हर गृहणी अपनी देहरी पर जलते दीप का दिव्यार्थ समझे, इसी शुभकामना के साथ, क्योंकि मन हो आलोकित तो सदा रहे दीपावली।

 

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