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हम स्त्रियां धर्म के नाम पर की जा रही ठगी से कैसे बचें?

अन्शु पाठक - परिवर्तन का दर्पण

25th July 2016

भव्य महलनुमा आश्रमों में धर्म की आड़ में व्याभिचार पनप रहा है और भोली-भाली जनता से ठगी की जा रही है। क्या हम पढ़े-लिखे सभ्य व्यक्तियों को सचेत नहीं हो जाना चाहिए?

 

ऋग्वेद की एक ऋचा है हिरण्यगर्भा सूक्त जिसको 5000 साल पहले रचा गया और बहुत ही सहजता से हाल की एक फिल्म 'रॉकस्टार में कव्वाली का प्रारूप देकर प्रस्तुत किया गया- 'जब कहीं पर कुछ भी नहीं था, वही था वही था, वो जो तुझमें समाया, वो जो मुझमें समाया, मौला वही, वही माया! संस्कृत में ठीक यही बात हिरण्यगर्भा: समवर्तताग्रे भूतस्यजात: पतिरेकासीत के रूप में कही गई है यानि सारे विश्व का रचयिता स्वामी सृष्टि से पहले विद्यमान था।

विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है हमारी। हमारे वैदिक साहित्य के चिंतन का केन्द्र है सृष्टि विद्या और स्पष्ट है कि ऋचाओं को गढऩे वाले प्रकृति की शक्ति आधार के उपासक थे तभी तो हमने सूर्य को अर्ध्य दिया, पर्वत भी पूजे और नदियां भी। हिन्दू धर्म ऐसी जीवनशैली बनकर विकसित हुआ जो जनमानस के प्रत्येक क्रियाकलाप में परिलक्षित होता है, फिर चाहे वह चरणस्पर्श हो या तिलक लगाना। अन्य सभी धर्म मात्र 2000 साल पहले की उपज हैं। अत: यहां किसी भी प्रकार की प्रतिद्वन्द्विता का प्रश्न ही निरर्थक है।

हमारी इस महानतम संस्कृति की आज यह अधोगति कैसे? धर्म के बचकाने प्रारूप का सटीक चित्रण फिल्म 'पीके में किया गया जहां सड़क किनारे पड़े पत्थर को पान का कत्था लगा कर पेड़ के नीचे रख उसके आगे चंद सिक्के फैला देने भर से ही ईश्वर के नाम पर आस्था का व्यवसाय आरंभ हो जाता है और देखते ही देखते छात्र उस पत्थर के आगे दंडवत प्रणाम कर चढ़ावा चढ़ाने भी लगते हैं। हमने देखा, आनंद भी उठाया, पर सार को नहीं पकड़ा। कबीर ने भी यही गाया है कि 'पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़ किन्तु हम रहीम, कबीर, मीरा, तुलसी को मात्र स्कूल की किताबों तक सीमित रख कर प्रसन्न हैं। उन्हें अपने आचरण में सम्मिलित करने से हमारी आस्था को ठेस जो लगती है। वेद वाक्य 'अह्मब्रह्मास्मि यानि मैं ही ब्रह्मï हूं, को कबीर ने सीधे सरल शब्दों में कह दिया 'इस घट भीतर हीरा होती इसी में परवरन हारा, यही बात श्रीमद्भगवदगीता के सारथी बने श्रीकृष्ण ने कही कि मैं सर्वजीवों के हृदय में अंतरात्मा पार्थ हूं यानि मैं तुम्हारी अंतरात्मा की आवाज हूं, मुझे सुनो, सही-गलत का मनन करो फिर चुनो, मैं तुम्हारी चेतना हूं। मैं तुम्हें हर गलत कार्य से बचाऊंगा। मेरी सुनोगे - सही निर्णय लोगे।

अब प्रश्न यह कि हम स्त्रियां धर्म के नाम पर की जा रही ठगी से कैसे बचें? सर्वप्रथम हम अपने धर्मग्रंथों को कम से कम एक बार पढ़ें अवश्य, यह जानें तो कि उनमें लिखा क्या है। आज निश्चय ही विज्ञापनका युग है। आधुनिक युग में धार्मिक टीवी चैनल 24 घंटे धर्मगुरुओं के प्रवचन प्रसारित करते हैं। दूसरी ओर न्यूज चैनल धड़ल्ले से इन्हीं धर्म के ठेकेदारों का असली चेहरा दिखाते हैं। आज हर गली हर शहर में धर्म के नाम पर जो व्यावसायिक केन्द्र खुल रहे हैं। भव्य महलनुमा इन आश्रमों में धर्म की आड़ में व्याभिचार पनप रहा है और भोली-भाली जनता से ठगी की जा रही है।

क्या हम पढ़े-लिखे सभ्य व्यक्तियों को सचेत नहीं हो जाना चाहिए? तुलसीदास कृत रामचरितमानस के उत्तर कांड में दिया गया विवरण कि जो मिथ्या आडंबर करता है वही संत है। आचरणहीन ही कलियुग में ज्ञानी व संन्यासी है, उनमें वैराग्य कहां रहा जो बहुत धन लगा कर अपने आश्रम सजाते हैं। यह क्या हम स्त्रियों को सचेत करने के लिए काफी नहीं? क्या हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि कैसे देखते ही देखते गुरु करोड़ों के मालिक बन जाते हैं? कैसे सैकड़ों एकड़ में फैले भव्य आश्रमों के कड़े पहरे में क्रियाकलाप, गतिविधियों की साधारण जनमानुस को भनक भी नहीं पड़ पाती?

नारी सुलभ सरलता व कोमलता का लाभ धर्म ने हमेशा से उठाया है इसका दोष हम आसानी से परिस्थितियों पर थोप सकते हैं, कह सकते हैं कि हम हजारो साल से गुलाम रहे थे इसलिए आज पूजा अर्चना में इतने आडंबर व विविध पाखंड हैं। समय आ गया है कि हम स्त्रियां स्वयं से प्रश्न करें कि बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में देश-विदेश भ्रमण करते ये धर्मगुरु क्या वास्तव में जनसाधारण के निकट हैं, जिनके दर्शनमात्र के लिए भी टिकट हैं? क्यों हम स्त्रियां भावविभोर हो जिन गुरु महाराज के चरण रज को इतनी आतुर रहती हैं?

आज स्वतंत्र भारत में पढ़ी-लिखी प्रबुद्ध महिलाएं यदि भावात्मक रूप से गुलाम रहें तो दोष किसका है? प्रचुर धनराशि के मालिक संतों को त्यागमयी वैरागी कहें तो क्या यह हास्यास्पद नहीं क्योंकि कबीर के ही शब्दों में 'साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि। धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहि। गीता के मात्र 700 श्लोक मानस के मात्र 7 सोपान पढ़िए तो सही। हम स्त्रियां जब जानेंगी कि इनमें लिखा क्या है तभी तो संतान को सिखा पाएंगी। तब ये प्रश्न सहज ही उठा पाएंगी कि धर्मगुरु यदि निजकल्याण छोड़कर जनकल्याण का उद्देश्य सार्थक करें तो समाज का उत्थान हो। हजारों लाखों की संख्या में जुटते इनके शिष्यों को धर्मगुरु अपने मंच से स्वच्छता शुचिता सद्भाव शिक्षा का उपदेश दें ताकि भोली जनता को धर्म के नाम पर और न बहकाया जाए। आइए आज एक सम्वेत सुर में कहें हम महिलाएं- साधो सो गुरु सत्य कहावै।


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