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जो लौट के घर ना आए

अन्शु पाठक - परिवर्तन का दर्पण

29th July 2016

क्या हम देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीद परिवारों को कभी उचित सम्मान दे पाएंगे? क्या हम उनके बारे में भी कुछ सोचेंगे, जो लौट केघर ना आए?


इस वर्ष हमारा स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त पूरे 69 वर्ष पार कर 70वें वर्ष की ओर बढ़ेगा। इतिहास साक्षी है कि इस अमूल्य आजादी के लिए कितने वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान किया है, कितनी मांओं की गोद, कितने घरों के चिराग, कितनी वीरांगनाओं के सुहाग व कितने बच्चों के सिर से साया उठा। तब कहीं हम आजाद हवा में सांस ले रहे हैं, आज हम ऋणी हैं भारत के उन वीर शहीदों के जिन्होंने राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यपथ पर प्राणों की आहुति दे डाली।

पिछले दिनों जय हिन्द मंच ने मुझे चिडिया दुधवा (भिवानी) के सूबेदार सतीश कुमार के शहीदी दिवस पर उनकी स्मृति में शांति यज्ञ के अवसर पर आमंत्रित किया। सूबेदार सतीश कुमार 16 जून 2013 की रात को आई केदारनाथ त्रासदी की प्राकृतिक आपदा के दौरान लोगों को बचाते हुए शहीद हो गए थे। उनके स्मारक पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए मन उद्वेलित हो उठा व साथ ही एक विचित्र गौरव, एक रोमांच हो आया उनके परिवार पर कि धन्य ऐसे माता-पिता जो अपना पुत्र खोकर भी समाज व देश के प्रति सकारात्मक सोच रखते हैं। धन्य ऐसी वीर नारी जिसका पति अंजान देशवासियों की रक्षा करते हुए अपने प्राण निछावर कर देता है। वहीं मिली आंखों में अश्रु और होठों पर मुस्कान लिए उनकी पुत्री संगीता और उनके छोटे दो पुत्र। वे उदास चेहरे आज भी भुलाए नहीं भूलते। 

इसी प्रकार मैं कारगिल युद्ध में शहीद हुए सुरेन्द्र जी की श्रद्धांजलि सभा में बड़दूधिरजा गांव गई। शहीद अपनी माटी का फर्ज निभाते हुए वीरता की मिसाल कायम कर प्राणों की आहुति देते हैं, जिनकी वजह से हम अपने घरों में चैन से सोते हैं, जो रात-दिन सर्दी-गर्मी सरहदों की सुरक्षा करते हैं, उनके परिवारों के प्रति हमारा क्या कोई कर्तव्य नहीं? जो अखबार की बस एक पंक्ति की खबर बन कर रह जाते हैं। बुद्धिजीवी हों या फिर देश की सुरक्षा पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता, उच्चवर्ग के नुमाइंदे या उद्योगपति, कारगिल शहीद सुरेन्द्र की पत्नी का दर्द कभी न जान पाएंगे, जिसकी गोद में एक वर्ष का नन्हा बालक और तीन वर्ष की बेटी थी और एक निराश्रित, अनिश्चित भविष्य।

सत्य कड़वा है कि समाज के तथाकथित सभ्य परिवारों से सेना में सबसे कम भागीदारी देखी जाती है। सेना में फ्रंट पर लडऩे वाली थल सेना में खासतौर पर अधिकतर सिपाही भारत के दूरदराज गांवों व पिछड़े इलाकों व दबे कुचले गरीब वर्ग से आते हैं, जिनके पास न तो खेती के लिए जमीन होती है न ही रोजगार का कोई अन्य साधन। वस्तुत: सीमा पर आतंकी झड़पों में शहीद होने वाले परिवार जब सामने आते हैं तो ज्ञात होता है कि वे हरियाणा के लोहरू या इटावा के किसी बीहड़ गांव या मध्य प्रदेश, बिहार के सुदूर इलाकों के गुमनाम गांव का सैनिक था।

जय हिन्द मंच के सुरेश शर्मा बहुत रोचक किस्सा बताते हैं, लगभग 35 वर्ष पहले वे घूमते घामते भिवानी के एक गांव पहुंचे जहां कुछ लोग हुक्का पीते ताश खेल रहे थे, उनसे पूछा, 'शहीद रमेश कुमार का घर कहां है?, 'यहां शहीद तो किसी का नाम ना है एक स्वर उभरा। सुरेश जी को आश्चर्य हुआ, विस्मय भी और बोले, 'शहीद तमगा है, भइया नाम तो रमेश है। 'अच्छा थम, रामू लोहार के छोरे रमेश को पूछो हो। सुरेश जी को ग्रामवासियों पर करुणा, शिक्षा नीति पर रोष व स्वयं पर ग्लानि हो आई कि जिसने देश की रक्षा में प्राणों की बलि दे दी, उसका समाज में कोई सम्मान नहीं, उस गौरवशाली पिता को रामू लोहार ही कहा जा रहा है, शहीद का पिता नहीं। तभी से उन्होंने प्रण लिया और शुरू की शहीदों को सम्मान दिलाने की यात्रा, जो आज भी अनवरत जारी है।

यहां तक कि उन्होंने इसमें एक नया अध्याय और जोड़ा- शहीदों की पत्नियों का पुनर्विवाह, शहीदों की पत्नियां क्यों एक विधवा का जीवन जीने के लिए मजबूर हों, क्यों न उनकी जिंदगी में फिर से खुशियां आएं...। निश्चित ही अत्यंत कठिन है समाज की रूढिय़ों को तोडऩा किंतु सुरेश जी ने इस असंभव कार्य को सरलता से संभव किया कि एक जगह तो फिल्मी अंदाज में ससुर ने अपने पुत्र के शहीद हो जाने पर पुत्रवधु का कन्यादान किया। छोटे-छोटे गांव कस्बों में ऐसा कर दिखाना कभी किसी ने सोचा भी न होगा। सेना की रेजीमेंट्स के नाम देख कर सहज अंदाजा हो जाता है कि भारतीय सेना में सैनिक किस वर्ग से आते हैं? सत्य कड़वा तो यही है कि वातानुकूलित कमरों, मंचों, रैलियों व अदालत की बेंचों या फिल्मसेट पर देश भक्ति की बातें करना और सीमा पर लडऩे में बहुत अंतर है। क्या समाज में इस सत्य को समझ पाने की जागरूकता आवश्यक नहीं? 

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