जेल जाते नहीं देख सकती

नम्रता पाण्डेय

2nd September 2017

जेल जाते नहीं देख सकती

बात उस समय की है जब मैं कक्षा तीन में पढ़ती थी। मेरी दादी को पान खाने का बहुत शौक था। जब भी वह गांव से आती तो अपना पानदान साथ में लाती थी, जिसमें पान लगाने का सारा सामान जैसे- कत्था, सुपारी, चूना इत्यादि होता था। एक दिन उनकी सुपारी खत्म हो गई, तो उन्होंने मुझसे कहा कि पापा से बोलो कि शाम को ऑफिस से लौटते वक्त सुपारी लेते आएं। पर मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। शाम को दादी ने पापा से सुपारी के बारे में पूछा। पापा बोले उनसे तो किसी ने नहीं कहा। दादी ने मुझे बुलाकर पूछा तो मैंने कहा कि मैं आप दोनों को जेल जाते हुए नहीं देख सकती। पूछने पर बताया कि कल मैंने मूवी में देखा कि विलेन अपने दोस्त को सुपारी देता है और फिर उन दोनों को पुलिस पकड़ कर ले जाती है। मेरी बात सुनकर पापा और दादी अपनी हंसी नहीं रोक पाए, फिर पापा ने बताया कि फिल्मों में सुपारी देने का मतलब किसी का मर्डर करवाना होता है। तब मेरी समझ में बात आई। आज दादी हमारे बीच नहीं है, पर उनका पानदान देखकर यह बात याद आ जाती है।

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