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नटखट कान्हा का जन्म महोत्सवः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

ऋचा कुलश्रेष्ठ

24th August 2016

श्रीकृष्ण भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में युगों-युगों से आस्था के केंद्र रहे हैं। वे कभी यशोदा मैया के लाल होते हैं तो कभी ब्रज के नटखट कान्हा। कभी गोपियों का चैन चुराते छलिया दिखते हैं तो कभी अर्जुन को गीता का ज्ञान देते नजर आते हैं। श्रीकृष्ण के रूप अनेक हैं और वह हर रूप में संपूर्ण हैं।

नटखट कान्हा का जन्म महोत्सवः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

वे भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जिन्होंने अर्जुन को कायरता से वीरता, विषाद से प्रसाद की ओर जाने का दिव्य संदेश श्रीमदभगवदगीता के माध्यम से दिया। उन्होंने कालिया नाग के फन पर नृत्य किया और गोवर्धन पर्वत को उठाकर गिरिधारी कहलाए। समय पड़ने पर उन्होंने दुर्योधन की जंघा पर भीम से प्रहार करवाया, शिशुपाल की गालियाँ सुनी, पर क्रोध आने पर सुदर्शन चक्र भी उठाया। अर्जुन के सारथी बनकर उन्होंने पाण्डवों को महाभारत के संग्राम में जीत दिलवायी। सोलह कलाओं से पूर्ण वह भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जिन्होंने मित्र धर्म के निर्वाह के लिए गरीब सुदामा की पोटली के कच्चे चावल खाये और बदले में उन्हें राज्य दिया। उन्हीं प्रभु श्रीकृष्ण के जन्म उत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इसका महोत्सव विशेष रूप से वृन्दावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश), द्वारका (गुजरात), गुरुवयूर (केरल), उडुपी (कर्नाटक) तथा इस्कॉन मन्दिरों में आयोजित किया जाता है।

जन्माष्टमी नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ 

जन्माष्टमी सिर्फ भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी पूरी आस्था व उल्लास से घर-घर में, मन्दिर-मन्दिर में मनाते हैं। गोकुल, नन्दगांव और वृन्दावन में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बड़ी धूमधाम होती है। संपूर्ण ब्रजमंडल में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म उत्सव का दृश्य बड़ा ही दुर्लभ होता है। भगवान के श्रीविग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासी उसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं तथा छप्पन भोग का महाभोग लगते है। वाद्ययंत्रों से मंगल ध्वनि बजाई जाती है। यह त्योहार निस्संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है। सम्पूर्ण ब्रजमंडल नन्द के घर आनंद भयो - जय कन्हैया लाल की जैसे जयघोषों व बधाइयों से गुंजायमान होता है।

 

परम्पराएं 

 इस दिन सभी स्त्री-पुरुष नदी में तिल मिलाकर नहाते हैं। पंचामृत से भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को स्नान कराया जाता है। उन्हें सुन्दर वस्त्रों व आभूषणों से सजाकर सुन्दर झूले में विराजमान किया जाता है। धूप-दीप पुष्पादि से पूजन करते हैं। आरती उतारते हैं और माखन-मिश्री आदि का भोग लगाते हैं। अधिकतर लोग व्रत रखते हैं। इस अकेले व्रत से करोड़ों एकादशी व्रतों का पुण्यफल प्राप्त होता है। दिन भर तरह-तरह के व्यंजन और पकवान बनाए जाते हैं। रात को बारह बजे खीरा चीरकर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कराने के बाद ही पंचामृत या फलाहार ग्रहण किया जाता है। 

मन्दिरों में भव्य आयोजन

 श्रीकृष्ण जन्म स्थान के अलावा द्वारकाधीश, बिहारीजी एवं अन्य सभी मन्दिरों में इसका भव्य आयोजन होता हैं, जिनमें भारी भीड़ होती है। पूरी मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से जगमगा उठती है। श्रीकृष्ण की शोभायात्रा यानी सवारी निकाली जाती है। जन्माष्टमी के मौके पर कान्हा की रासलीलाओं को देखने के लिए भक्त दूर-दूर से मथुरा पहुंचते हैं। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। इस दिन मंदिरों में जगह- जगह झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान श्रीकृष्ण को झूला झुलाया जाता है। जगह-जगह रासलीलाओं का भी आयोजन किया जाता है। 

दही-हांडी समारोह

 

जन्माष्टमी के दिन देश के कुछ स्थानों पर दही हांडी समारोह का भी आयोजन किया जाता है। सामान्यतया महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में मनाए जाने वाले इस समारोह को लेकर विशेषतया युवाओं में बहुत जोश होता है। एक मिट्टी के बर्तन में दही, मक्खन, शहद, फल इत्यादि रख दिए जाते हैं। इस बर्तन को धरती से 30-40 फुट ऊपर टांग दिया जाता है। इस हांडी को फोड़ने की कोशिश करने वाली टोलियों के युवाओं को गोविंदा कहा जाता है। हांडी को फोड़ने के लिए अनेक कंपनियां और संस्थाएं-संगठन लाखों के इनाम की घोषणा करते हैं। युवा लड़के-लड़कियां हांडी फोड़ने पर मिलने वाले पुरस्कार पाने के लिए समारोह में हिस्सा लेते हैं। इसके लिए युवा पुरुष एक-दूसरे के कन्धे पर चढ़कर पिरामिड सा बना लेते हैं। पिरामिड में सबसे ऊपर चढ़ने वाला व्यक्ति उस बर्तन को तोड़कर उसमें रखी सामग्री को प्राप्त कर लेता है। प्रायः रुपयों की लड़ी रस्से से बांधी जाती है। इसी रस्से से वह बर्तन भी बांधा जाता है। इस धनराशि को उन सभी सहयोगियों में बांट दिया जाता है, जो उस मानव पिरामिड में भाग लेते हैं। 

कृष्ण जन्म

श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद श्रीकृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवासुदेव के पुत्ररूप में हुआ था। कंस ने अपनी मृत्यु के भय से बहन देवकी और वासुदेव को कारागार में कैद किया हुआ था। कृष्ण जन्म के समय घनघोर वर्षा हो रही थी। चारों तरफ घना अंधकार छाया हुआ था। श्रीकृष्ण का अवतरण होते ही वसुदेव की की बेड़ियां और कारागार के द्वार स्वयं ही खुल गए, पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए। वासुदेव किसी तरह श्रीकृष्ण को उफनती यमुना के पार गोकुल में अपने मित्र नन्दगोप के घर ले गए। वहां नन्द की पत्नी यशोदा को भी एक कन्या उत्पन्न हुई थी। वासुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को ले गए। कंस ने उस कन्या को पटककर मारना चाहा किन्तु वह असफल रहा। श्रीकृष्ण का लालन-पालन यशोदा व नन्द ने किया। बाल्यकाल में ही श्रीकृष्ण ने अपने मामा द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसों को मार डाला और उसके सभी कुप्रयासों को विफल कर दिया। अन्त में श्रीकृष्ण ने आतातायी कंस को ही मार दिया। श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का नाम ही जन्माष्टमी है। गोकुल में यह त्योहार गोकुलाष्टमी के नाम से मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण विष्णुजी के आठवें अवतार माने जाते हैं। श्रीकृष्ण को श्रीविष्णु का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार माना जाता है।