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अभिलाषा कि विश्वगुरु बनने का सपना हो सच

अन्शु पाठक - परिवर्तन का दर्पण

2nd November 2016

एक समय ऐसा भी था, जब इस भारतवर्ष में सारे विश्व से छात्र पढऩे आते थे, अध्यात्म की खोज में और हमारा देश विश्वगुरु कहलाता था।


आज हम ज्ञान ज्योति की आशा में मां सरस्वती के चरणों में नतमस्तक हो शिक्षक दिवस मनाते हैं तो गौरवान्वित होते हैं कि भारत विश्व गुरु बनेगा, किंतु वस्तुस्थिति क्या है? पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के सरकारी स्कूलों के एक सर्वेक्षण में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। छठी कक्षा के 90 प्रतिशत बच्चों को बेसिक लॄनग स्किल भी नहीं आती। प्राइमरी पास ये बच्चे इंग्लिश और गणित ही नहीं, हिन्दी की किताब से एक अनुच्छेद भी नहीं पढ़ सके, गणित के जोड़ घटाने के सरल प्रश्न भी हल न कर सके। असल दोष शिक्षा प्रणाली की खस्ता कार्यप्रणाली का है। 

सरकारी स्कूलों में वे बच्चे पढ़ते हैं, जिनके पास कोई अन्य आधार नहीं, गैर सरकारी स्कूलों में छात्रों के चयन का आधार रहता है केवल पैसा। एक अच्छे स्कूल के मायने गुणवत्ता वाली पढ़ाई नहीं बल्कि उसकी फीस व दूसरे तामझाम हो चले हैं। अभिभावकों की सोच है कि उनके बच्चे का भविष्य महंगे स्कूल ही संवार सकते हैं और प्राइवेट स्कूल भी पढ़ाई पर कम इमारत की बनावट और चमचमाहट पर ज्यादा ध्यान देते हैं।

उच्च व मध्यवर्ग अपनी-अपनी हैसियत के अनुरूप अपना स्कूल ब्रैंड बना लेते हैं, फिर गर्व से परिचितों के बीच चर्चा करते हैं। समाज में ये बदलाव का दौर है, जहां घरों में भले ही हिन्दी या अपनी मातृभाषा बोली जाती हो किंतु स्कूल में इंग्लिश स्पीकिंग अनिवार्य हो जाती है क्योंकि सर्वमान्य है कि अंग्रेजीभाषी बच्चे ही तरक्की पाते हैं और नन्हा बालक इंग्लिश के दो चार वाक्य बोलने लगता है तो मातापिता खुशी से फूले नहीं समाते कि बच्चा पानी नहीं वॉटर मांग रहा है यानि स्कूल अच्छा है। हमारे यहां चूकि प्राइवेट स्कूलों में टीचर्स की भरती के लिए कोई नियम-कायदे नहीं होते, इसलिए महंगे से महंगे स्कूल सस्ते से सस्ते टीचर्स रखते हैं ताकि मुनाफा अधिक हो। इनका खुद का शैक्षणिक स्तर दोयम दर्जे का होता है, ये अभिभावकों के सामने प्रभावी अंग्रेजी बोल लेते हैं।

अभिभावक ये जानने की कोशिश भी नहीं करते कि टीचर की शैक्षणिक योग्यता कितनी है। अक्सर बड़े स्कूलों में स्वीमिंग पूल, घुड़सवारी जैसे महंगे शौक पूरे करने की सुविधाएं भी होती हैं। बच्चे की पढ़ाई, आजादी, मानसिक विकास से भले ही इनका सरोकार न हो, स्टेटस तो बनता ही है। दौर निश्चय ही प्रतिस्पर्धा का है लेकिन सच ये भी तो है कि समाज में केवल दो जातियां हैं अमीर व गरीब, गरीब वर्ग सरकारी स्कूल के भरोसे रहता है, भले ही नाम भी सही लिखना न आए।

विश्व में ऐसी भी कुछ जगह हैं जहां शिक्षक बनना सबसे कठिन है और शिक्षक बनना सबसे बड़ा गर्व। ये देश दुनिया के सबसे शांतिप्रिय व समृद्ध खुशहाल देश हैं, स्वीडन व नार्वे। यहां शिक्षा को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है व शिक्षक को सर्वोच्च आदर। असंभव लगता है कि एक समय ऐसा भी था, जब इस भारतवर्ष में सारे विश्व से छात्र पढऩे आते थे, अध्यात्म की खोज में और हमारा देश विश्वगुरु कहलाता था। ये और भी हास्यास्पद लगता है कि बिहार के नालंदा में विशाल विश्वविद्यालय हुआ करते थे वहां आज लालकेश्वर बच्चा सिंह व उषा सिन्हा मिल कर ऐसे रैकेट चला रहे थे, जिन्हें ये तक पता नहीं कि पालिटिकल साइंस में खाना बनाना सिखाया जाता है या कुछ और! धन्य धन्य ये देश और यहां की धरती, यहां के सिस्टम। एक-एक छात्र के दो-दो रोल नंबर, 2 रिजल्ट, पास, फेल करने का सिंडिकेट, टॉपर और फस्र्ट डिवीजन में पास कराने के करोड़ों रुपये, जो बोरों में भर कर रखे जाते थे। स्कॉलर्स की टीम, जो आराम से अपने घर जाकर जवाब लिखती थी, मनमाने नंबर, मनचाहे रेट।

मजे की बात तो यह कि लालकेश्वर स्वयं नालंदा के टॉपर रहे हैं। नैतिकता को ताक पर रख शिक्षा व्यवस्था की किरकिरी मात्र बिहार में ही नहीं, यहां हर राज्य एक से बढ़कर एक हैं। बैंगलूर में एक मेडिकल सीट एक करोड़ की तो उत्तर प्रदेश में 35-40 लाख की, आंध्र व गुजरात में 75 लाख। यहां तक कि परिणाम घोषित होने से पूर्व ही सीटें बुक हो जाती हैं। डोनेशन व सीटों की खरीद फरोख्त में 9,300 करोड़ का कालाधन इधर से उधर होता है और एजूकेशन सिस्टम को सही करने की दिशा में कोई सोचता भी नहीं। नर्सरी से नौकरी तक बेहतरी की उम्मीद जगे ऐसा होना फिलहाल तो असंभव ही लगता है फिर भी निरंतर अक्षर का उजियारा हो, देश साक्षर हो जाए इस अदम्य अभिलाषा के साथ कि ऐसे होगा विश्वगुरु बनने का सपना सच। 


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