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हिन्दी भाषा को समर्पित विदेशी हिन्दी भक्त

गृहलक्ष्मी टीम

14th September 2016

हिन्दी भाषा के प्रति बेशक आज भारतीयों का रूझान कम हो रहा है लेकिन हमारी इस भाषा ने विभिन्न समयों पर कई विदेशियों को भी आकृषित किया है। आइये, जानते हैं विदेशी हिन्दी प्रेमियों के बारे में।

 

हिन्दी एक ऐसी भाषा है जिसकी मिठास अपने आप में बहुत ज्यादा है। इसी मिठास के चलते इसने सदियों से पूरे विश्व में अपनी अमिट पहचान बनाई है। भारतीय विद्वानों ने तो हिन्दी पर अपनी कलम को चलाया ही है साथ ही भारत की संस्कृति, धर्म, इतिहास की महानता के कारण विदेशी विद्वान भी इसकी तरफ बरबस ही आकर्षित हो जाते हैं।

 

 

 

फादर कामिल बुल्के

बुल्के का नाम विदेशी हिन्दी प्रेमियों में सर्वोपरि है। इनका जन्म बेल्जियम में हुआ था और इन्होंने युवा अवस्था में ही संन्यास ले लिया था। संन्यास लेने के बाद ये सबसे पहले भारत आए और अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर रांची के स्कूल में पढ़ाने लगे। यहीं पर पढ़ाते-पढ़ाते इन्होंने हिन्दी के साथ-साथ, संस्कृत, ब्रज व अवधी भाषा भी सीखी। ये राम के भक्त थे। इनको आधुनिक हनुमान भी कहा गया क्योंकि इन्होंने भगवान राम के ऊपर गहन शोध भी किया था। वे सेंट जेवियर कॉलेज रांची में हिन्दी व संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रहे। हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश को बढ़ाने में बुल्के का प्रयास सराहनीय रहा, जिसमें इन्होंने 50 हजार शब्दों को खोज कर निकाला। अंग्रेजी व यूरोपीय भाषाओं के जानकार होने के कारण ही ये हिन्दी के लिए भी बहुत कार्य कर पाने में सक्षम रहे। कुछ समय बाद ये चर्च में फादर बन गए और इन्होंने बाइबिल का हिन्दी में अनुवाद किया जो भारत के लिए बुल्के का महान तोहफा माना जाता है। भारत के बारे में इन्होंने लिखा है कि मैं ईश्वर का धन्यवाद देता हूं जिसने मुझे भारत देखने के लिए भारतभूमि भेजा और मैं भारत का भी शुक्रिया करता हूं जिसने मुझे पूरे दिल से अपनाया। 7 अगस्त, 1982 को फादर बुल्के का निधन हो गया। उनको भारत के सर्वोच्च सम्मान पद्मभूषण से भी नवाजा गया।

 

 

 रोनाल्ड स्टुअर्ट मेक्ग्रेगॉर (न्यूजीलैंड)

रोनाल्ड सच्चे हिन्दी भक्त थे। उन्होंने पश्चिमी धरती पर हिन्दी को सम्मान दिलाया। 1964 से लेकर 1997 तक इन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवॢसटी में हिन्दी विषय पढ़ाया था। इन्होंने इलाहाबाद यूनिवॢसटी में भी कुछ समय हिन्दी पढ़ाई क्योंकि हिन्दी की शिक्षा इन्होंने भारत में इलाहाबाद यूनिवॢसटी से ही ली थी। 1972 में उन्होंने हिन्दी व्याकरण पर 'एन आउटलाइन ऑफ हिन्दी ग्रामर' नाम की एक किताब भी लिखी। भारत के हिन्दी समीक्षकों के अनुसार ये एक बेजोड़ किताब है। हिन्दी व्याकरण पर इसका कोई तोड़ या मिसाल नहीं है। इन्होंने एक हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोष भी बनाया जो कि अपने आप में अनूठा है। इनका अभी कुछ समय पूर्व ही निधन हुआ है।

  

 

 

डॉ. जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन (आयरलैंड) 

ग्रियर्सन अपने आप में एक अद्भुत प्रतिभा के धनी व महान हिन्दी प्रेमी थे। ये उस समय भारत आए जब भारत पर अंग्रेजी हुकूमत थी और अंग्रेज भारत का नामोनिशान मिटाने में लगे थे। उस समय इन्होंने विभिन्न भाषाओं के इस देश में प्राय: 21 भाषाओं को सम्मिलित करके भाषाओं का एक परिवार बनाया जिसको इन्होंने 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' का नाम दिया। इन्होंने प्राकृत संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला भाषा का भी गहन अध्ययन किया। वे सिविल सर्विस ऑफिसर के पद पर भारत आए थे जहां भी इनकी नियुक्ति होती वे वहीं की भाषा को समझने में लग जाते थे। इन्होंने हिन्दी खड़ी बोली को सीखकर उन पर अनेक किताब भी लिखी और भारत को उपहार के तौर पर दीं। भारतीय सरकार ने उनके सम्मान में उनके नाम पर एक पुरस्कार योजना भी चला रखी है जो कि हिन्दी भाषा पर विशिष्ट कार्य करने वाले विदेशी व्यक्ति को प्रतिवर्ष दिया जाता है।

प्रमुख देशों में हिन्दी का रूतबा

पूर्व सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों जैसे पौलेंड, हंगरी, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया के सभी विश्वविद्यालयों में हिन्दी का भी एक विभाग है जहां विधिवत रूप से हिन्दी पढ़ाई जाती है। विश्व के अनेक देशों ने अपने यहां हिन्दी चेयर, इंडियन काउंसिल आफ कल्चरल रिलेशन की स्थापना की है। इनमें साउथ कोरिया के बुसान व सियोल यूनिवर्सिटी के अलावा पेइचिंग, त्रिनिदाद, इटली, स्पेन, तुर्की, रूस की यूनिवॢसटी भी शामिल है। अमेरिका के येल, न्यूयार्क विनकांसन यूनिवॢसटी में भी हिन्दी पढ़ाई जाती है और इसमें निरंतर क्षेत्रों की गिनती बढ़ भी रही है। जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय में भी हिन्दी विभाग है। यहां की खूबी ये है कि जापानी छात्र ही यहां हिन्दी पढ़ाते हैं। इसके साथ ही एक दूसरा पक्ष भी है। हिन्दी को अपनाने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं जो व्यावसायिक रूप से लाभ कमाने के लिए भी हिन्दी सीख रहे हैं। अनेक बड़े व विकसित देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां भारत में मोटा निवेश कर चुकी हैं। इस स्थिति में ये कंपनियां अपने प्रोफेशनल्म को भारत भेजती ही इसी शर्त पर हैं कि वे भारत में जाकर अच्छी हिन्दी बोल सकें ताकि वहां व्यापार करने में आसानी हो। इसलिए हिन्दी विदेशियों को मानसिक व आर्थिक मजबूती देती है।

(साभार -साधनापथ)

 

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शुक्रिया बाकी है

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