जानिए क्या है 'श्राद्ध' की महिमा और महत्त्व

शशिकांत 'सदैव'

16th September 2016

 

शास्त्रों के मुताबिक, मनुष्य के लिए तीन ऋण बताये गए हैं पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि व तीसरा पितृ ऋण। इनमें पितृ ऋण को श्राद्ध या पिंडदान करके उतारना आवश्यक है। क्योंकि जिन माता-पिता ने हमारी आयु,आरोग्यता तथा सुख-सौभाग्य की अभिवृद्धि के लिए अनेक प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म लेना निरर्थक होता है। उसे उतारने में कुछ अधिक खर्च नहीं होता। वर्ष भर में केवल एक बार अर्थात् उनकी मृत्यु तिथि को सर्वसुलभ जल, तिल, जौ, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध सम्पन्न करने और गौग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से यह ऋण उतर जाता है। अत: सरलता से साध्य होने वाले इस कार्य की उपेक्षा मनुष्य को भी करनी चाहिए।


श्राद्ध का अर्थ

सरल रूप में पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसे 'श्राद्ध' कहते हैं। 'श्रद्धा' से ही 'श्राद्ध' शब्द बना है। इसे पितृयज्ञ भी कहा गया है। धर्मशास्त्रों और पुराणों में इस विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है। हमारे देश में आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष के पखवाड़े में अतृप्त आत्माओं की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष के रूप में मनाने का प्रावधान है। पितृ ऋण के लिए श्राद्ध करना हम सबका परम कर्तव्य है।

पितृ श्राद्ध की प्राप्ति कैसे करते हैं

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि श्राद्ध में दी गई अन्न आदि की विभिन्न सामग्रियां पितरों को कैसे प्राप्त हो जाती है? मृत्यु के बाद प्राणी किस योनी में जन्म लेता है इस तथ्य का भी निश्चयात्मक प्रमाण नहीं है। शास्त्रों में ऐसी शंकाओं का भी समुचित समाधान किया गया है। गोत्र के सहारे विश्वदेव एवं अग्निस्वात आदि दिव्य पितर हव्य-कव्य को पितरों को सहज में ही उपलब्ध करा देते हैं। यदि पिता देव योनी को प्राप्त हुए हैं तो श्राद्ध में दिया गया है 'अन्न', उन्हें वहां अमृत होकर प्राप्त होता है। मनुष्य योनी में अन्न रूप में, पशु योनी में तृण रूप में, उन्हें प्राप्ति होती है। नागादि योनियों में भी उसे श्राद्धीय भोगजनक तृप्ति कर पदार्थों के रूप में प्राप्त होकर तृप्त करती हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्राद्ध का समय

भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक चलने वाला यह सोलह दिवसीय पितरों का तर्पण पितृपक्ष कहलाता है और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष 16 सितम्बर से शुरू हो रहा है, जो 1 अक्टूबर तक रहेगा। इस बीच कोई भी व्यक्ति अपने पितृों का श्राद्ध कर सकते हैं।

पितृ पक्ष का विशेष महत्त्व

भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से पितरों का दिन प्रारंभ माना जाता है और यह अमावस्या तक रहता है। शुक्ल पक्ष पितरों की रात्रि कही गई है। अत: मनुस्मृति के अनुसार मनुष्यों में एक मास के बराबर पितरों का एक अहोरात्र (दिन रात) होता है। मास में दो पक्ष होते हैं। मनुष्यों का कृष्ण पक्ष पितरों के कर्म का दिन और शुक्ल पक्ष पितरों के सोने के लिए रात होती है। इसलिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष पितृपक्ष में श्राद्ध करने का विधान माना गया है। श्राद्ध करने से पितरों को प्रतिदिन भोजन प्राप्त हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में पितृपक्ष में श्राद्ध की महिमा विशेष रूप से वर्णित की गई है। श्राद्धकर्ता को पुत्र, धन संपदा, दीर्घायु, आरोग्य, प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

श्राद्ध की महिमा

शास्त्रों में श्राद्ध की महिमा के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है स्कन्दपुराण के केदार खंड में यह उल्लेख मिलता है कि श्राद्ध करने से संतान की प्राप्ति होती है। श्राद्ध द्वै परमं यश यानि श्राद्ध से परम आनंद मिलता है। पितरों के संतुष्ट होने पर जगदीश भगवान संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर तीनों लोकों में कोई चीज दुर्लभ नहीं रह जाती। श्राद्ध करने वाले आयु, बल, यश, विद्या और मृत्यु के उपरान्त परमगति प्राप्त करते हैं।

 

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