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जीत

नरेश शर्मा

1st December 2016



‘‘मुझे शादी नहीं करनी मम्मी! बस कह दिया ना, मैं बालिग हूं, अपने बारे में फैसला कर सकती हूं। देट इज फाइनल।'' कमरे से बाहर जाते हुए श्रेया ने तो जैसे अपना अंतिम निर्णय ही सुना दिया था। मम्मी-पापा को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये शब्द उनकी इकलौती बेटी के हैं, जिस पर उनकी सारी खुशियां टिकी थी।

जब भी घर में श्रेया के विवाह की बात चलती थी, उसका गुस्सा सातवे आसमान पर जा पहुंचता था। मम्मी-पापा की परेशानी जायज थी। एम. बी. ए. के बाद अब वह जाॅब में भी आ चुकी थी। उम्र भी हो चुकी थी। फिर श्रेया का ऐसा विहेव? शादी के नाम से ही एलर्जी? उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। पहले भी वह कई अच्छे रिश्ते ठुकरा चुकी थी।

उसकी बुआ ने अब जो रिश्ता बताया था, वैसा रिश्ता फिर मिलना मुश्किल था। अरविन्द प्रशासनिक अधिकारी था। हैण्डसम, रूतबा पैसा, पावर क्या नहीं था, उसके पास। बुआ ने पता नहीं क्या जादू चलाया था कि श्रेया की फोटो देखकर ही अरविन्द ने शादी की हां कर दी थी। पैसे दहेज की भी कोई डिमाण्ड नहीं। चिराग लेकर भी ऐसा वर नहीं मिलने वाला।

उसके मम्मी -पापा अपनी किस्मत को कोस रहे थे। बुआ का बार-बार फोन आ रहा था, अरविन्द के परिवार वालों को भी जवाब देना था। वैसे तो श्रेया और अरविन्द आपस में मिल चुके थे। अभी वैकेशन में श्रेया अपनी बुआ के यहां उदयपुर गई थी तभी अरविन्द उनके यहां श्रेया से मिला था। दोनों में खूब बातचीत भी हुई थी। अरविन्द की ट््रेनिगं खत्म हो चुकी थी। उदयपुर में ही उसकी पोस्टिगं हो गई थी। सो उसके परिवार के लिए उसकी शादी के लिए जल्दी करना अस्वाभाविक भी नहीं था।

श्रेया ने अपनी बुआ के घर से वापस आकर अपनी मम्मी को सब कुछ बताया था। अरविन्द से हुई मुलाकात के बारे में भी। वह उसे एक दोस्त के रूप में तो पसन्द करती थी। उससे इम्प्रेस भी बहुत थी परन्तु शादी के नाम पर तो जैसे वह अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठती थी। संस्कारवान्, श्रेया का व्यवहार इस संवेदनशली विषय पर इतना अजीब हो उठता था उसका ऐसा एब्नाॅर्मल बिहेव सबकी समझ से बाहर था।

मम्मी -पापा ने दूसरे दिन सुबह उसे फिर से समझाने की कोशिश की। इस उम्मीद पर कि शायद उसका फैसला बदल गया हो। बात वहीं की वहीं थी। श्रेया अपनी जिद पर अड़ी थी। पापा का धैर्य भी अब जवाब देने लगा था। फिर भी उन्होंने प्यार से उसे समझाते हुए पूछा-‘‘बेटे! आखिर बात क्या है? अरविन्द में क्या कमी है?''

श्रेया ने दृढ़ता से जवाब दिया-‘‘पापा आप मेरी फीलिंग्स को नहीं समझते। अरविन्द बहुत अच्छा है। मैं उसे बहुत पसन्द करती हूं लेकिन मैं शादी नहीं करूंगी।

‘‘क्यों? ऐसे कैसे चलेगा भला? शादी तो करनी ही पड़ेगी ना। कुंआरी कब तक रहोगी? पापा ने जबरन अपना गुस्सा दबाते हुए पूछा।

श्रेया का जवाब फिर अटपटा सा ही रहा-‘‘लोग बिना शादी के भी रहते हैं पापा। जीने के लिए क्या किसी पुरूष के सहारे की जरूरत अनिवार्य है?''

बीच में मम्मी बोल पड़ी-‘‘बेटी! तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें शोभा नहीं देती। बेटी के विवाह की जिम्मेदारी पूरी करके ही तो हमें शांति मिलेगी।''

‘‘तो मैं आपके लिए बोझ बन गई हूं ना। कोई बात नहीं। अगर ऐसा ही है तो मैं यह घर छोड़ देती हूं। '' श्रेया ने बिना किसी लाग-लपेट के कठोर जवाब दे दिया।

ऐसे जवाब से उन्हें गहरा सदमा लगा। कुछ भी नहीं सूझ रहा था। अचानक उसके पापा के सीने में तेज दर्द उठा। उनकी हालत वाकई खराब हो चुकी थी। श्रेया और उसकी मम्मी के हाथपांव फूल गए। आनन-फानन में उन्हें हाॅस्पिटल पहुंचाया गया। जब डाॅक्टर ने उन्हें बताया कि उन्हें अटैक आया था तो उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया।

श्रेया अपने मम्मी-पापा को दिल से चाहती थी। परिस्थितियां बदल चुकी थी। अब वह पापा के लिए कोई कारण पैदा नहीं करना चाहती थी, जिससे दुबारा उन्हें सदमा पहुंचे। मजबूरी में या दबाब में आकर उसने शादी के लिए हां कर दी।

हो सकता था कि उसकी परवरिश में ही कोई कमी रही हो या उनके घर का माहौल ही ऐसा रहा कि श्रेया के मन में कभी भी प्रेम-रोमासं की फीलिंग्स पैदा ही नहीं हुई। कठोर और स्टडी, कॅरियर के प्रति डेडीकेशन तो वह थी ही, सो हमेशा अपने मम्मी-पापा की अपेक्षाओं को पूरा करने में ही जुटी रही। स्टूडियस तो वह हमेशा किताबों की दुनिया में ही खोई रहती। उसके अंतर्मन में अनजाने में ही कठोरता घर कर गई थी। मम्मी के साथ भी उसके बेहद औपचारिक संबंध रहे। ना तो घर का वातावरण ही खुला था और न ही उसकी कोई अंतरंग सहेली ही थी, जिससे वह संवेदनशील भावुकता की बातें सीखती। उसका ऐसा व्यक्तित्व एक स्टूडेन्ट के रूप में फायदेमंद था, परन्तु जीवन जीने की कला के अभाव के कारण उसकी पर्सनेल्टी इन्ट्रोवर्ट (आत्ममुखी) ही बनी रही।

चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर धूमधाम से उसका विवाह हो गया। इस उम्र में जैसे लड़कियों को शादी के ख्वाब होते हैं, वैसा श्रेया के लिए कुछ न था। बल्कि उसे शादी के नाम से ही डर सा लगता था। ससुराल और अपरिचित, अनजान व्यक्ति के आगे समर्पण, वो सोच-सोच कर ही भयभीत हो उठती थी। अक्सर सब लोग श्रेया के ऐसे व्यवहार को उसका गुरूर समझ बैठते थे जबकि असलियत यह थी कि यह उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या थी। उसके अवचेतन मन में परपुरूष के प्रति एक अजीब सी ग्रंथि बन चुकी थी। शादी के बाद की लाइफ का उसे अच्छे से ज्ञान था। वह उस सिचुएशन के लिए कभी भी तैयार नहीं थी। उसके मन में हमेशा एक काॅम्प्लेक्स रहता था कि कैसे कोई लड़की अचानक एक अनजान पुरुष को अपना सर्वस्व सौंप सकती है।

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