देवी लक्ष्मी और उल्लू

नरेश शर्मा

12th December 2016


‘उल्लू पक्षी को लेकर न जाने कितनी भ्रान्तियां हमारे समाज में व्याप्त है। उल्लू का नाम सुनते ही हमें जहां एक ओर मसखरी की बात सूझती है तो वहीं दूसरी तरफ हम उल्लू को मूर्खता, बेवकूफी या अशुभता के प्रतीक के रूप में मान लेते हैं। भाषा में अनेक मुहावरे भी प्रचलित है लेकिन एक प्रश्न जिज्ञासा उत्पन्न करता है कि यदि उल्लू को मूर्खता का प्रतीक माना जाए तो फिर धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी के वाहन के रूप में उल्लू की व्युत्पति कैसे है? वास्तव में उल्लू को लेकर प्रचलित भ्रान्तियां गलत है। सनातन धर्म-संस्कृति और पौराणिक ग्रन्थों में प्रतीक के रूप में जिन पशु -पक्षियों को देवी-देवताओं के वाहन के रूप में कल्पित किया गया है वो निरूदेश्य नहीं है। यह ऐसी गम्भीर सोच का परिणाम है जिसमें पशु -पक्षियों का पारिस्थितिक संतुलन पर्यावरण के सन्दर्भ में उनके महत्व और सामाजिक उपयोगिता को देखकर मीमांसा की गई है। धर्म से सीख-संदेश जोड़कर आम आदमी की सोच को परिपक्व बनाना, दिशा निर्धारित करना हमारे ऋषि मुनियों का मनोवैज्ञानिक आधार था। कारण उस पुरातन युग में विज्ञान धर्म से अलग विषय नहीं था।

बात उल्लू की करें तो गौरतलब है कि उल्लू को मूर्खता -अशुभता का प्रतीक मानना एकदम गलत है। न केवल भारत अपितु पाश्चात्य संस्कृति में भी उल्लू को विशिष्ठ महत्व प्रदान किया गया है। लक्ष्मी के वाहन के रूप में उल्लू का सन्दर्भ समझने के लिए कृषि प्रधान भारतीय समाज की पुरातन सामाजिक व्यवस्था को समझना होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही हमारे सामाजिक-आर्थिक शक्ति का प्रधान आधार कृषि और पशुपालन था। भरपूर कृषि उत्पाद साक्षात धन, लक्ष्मी का प्रतीक और आधार स्तम्भ था। कृषि को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े-मकौड़े, जीव-जन्तु न केवल किसान के शत्रु थे बल्कि उसकी धन सम्पदा, लक्ष्मी को क्षति पहुंचाने वाले कारक भी माना गया था। साधारण कीड़े-मकौड़ो को प्राकृतिक रूप से नष्ट करने का परिस्थितिक तंत्र था किन्तु चूहों से होने वाली क्षति कृषक समुदाय के लिए असहनीय थी। जो सम्पूर्ण समाज की मुख्य आधार थी क्योंकि चूहे किसान भाइयों की लक्ष्मी को सीधे -सीधे प्रभावित करते थे। चूहों से होने वाली क्षति कृषक समुदाय के लिए असहनीय थी। जो सम्पूर्ण समाज की मुख्य आघार थी क्योंकि चूहे किसान भाइयों की लक्ष्मी को सीधे-सीधे प्रभावित करते थे। चूहों के विनाश में उल्लू को सर्वप्रिय और सबसे उपयुक्त माध्यम समझा गया। वैसे कृषि को नुकसान पहुंचाने वालों मे दीमकों के लिए दर्जनों प्रजाति के पक्षी, चमगादड़ प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकते थे परन्तु चूहों की बात ही अलग थी। इतनी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद आज भी अन्न संग्रहण के कार्य में चूहें बड़ी मात्रा में नुकसान पहुंचाते है। चूहों पर नियंत्रण के लिए प्राकृतिक रूप में बाज, चील जैसे पक्षी थे परन्तु उल्लू की तुलना में उनका महत्व कम था।

 

 

इस सन्दर्भ में हमें उल्लू में पाई जाने वाली विशेषताओं को भी परखना होगा। उल्लू खेत-खलिहान, भण्डार गृहों दोनों जगह अन्न की रक्षा करता था। बिल्ली केवल खलिहानों -भण्डार गृहों चूहों का विनाश कर पाती है। खुले खेतों में नही जबकि शिकारी पक्षी केवल खेतों में ही असरकारी होते थे। उल्लू की भूमिका अन्दर-बाहर दोनों स्थलों पर महत्वपूर्ण थी। उल्लू की शारीरिक संरचना उसे अद्वितीय बनाती है। उल्लू की तीव्र दृष्टि उसे अंधकार में भी चूहों जैसे कृषक शत्रुओं को देखने में सक्ष्म बनाती है। दूसरे उसकी आंखों की बनावट भी बड़ी विशिष्ट है। बड़ी आंखों और दोनों आंखों को शिकार पर जमाकर वह आसानी से उसकी स्थिति दूरी दिशा और शक्ति का सटीक अनुमान कर लेने की अद्भुत क्षमता रखता है। उल्लू 170 प्रतिशत के कोण तक अपनी गर्दन घुमाने में भी महारथ रखता है। इसलिए एक स्थान विशेष पर बैठकर भी वह अपने शिकार को चहुंओर त्रिविमीय स्थिति का अनुमान कर सकता है।

उल्लू की एक और विशेषता है। जब वह उडता है तब फडफडाहट जैसी कोई आवाज उत्पन्न नहीं होती। चूंकि चूहे की श्रवण शक्ति भी बड़ी तेज होती है। तब फडफडाहट जैसी कोई आवाज उत्पन्न नहीं होती। चूंकि चूहे की श्रवण शक्ति भी बड़ी तेज होती है। उल्लू के पंखों की बनावट उसमें एक विशिष्टता प्रदान करती है। उसके परों का विन्यास न केवल साउण्ड प्रूफ बनाता है, उसे वातानुकूलित रखता है। इसलिए प्रतिकूल ठंड या गर्मी में भी वह ज्यादा एक्टिव रहकर शिकार कर सकता है।

उल्लू में एक गजब की बात और भी है। अपनी तीव्र श्रवण शक्ति के साथ-साथ उल्लू 6000 हर्ट्ज की ध्वनी तरंगों पर सर्वाधिक संवेदनशील होता है। जो सुनने की अद्भुत क्षमता के रूप में चूहों के मामले में बड़ी कारगर सिद्ध होती है। क्योंकि चूहों की चूं-चूं भी ध्वनि की इस आवृति पर ही सबसे तीव्र होती है। इसलिए उल्लू की पहंुच से चूहों का बचना लगभग नामुकिन साहोता है। फिर उल्लू उंचाई के साथ-साथ कम उंचाई के स्थलों में भी आसानी से उड़ सकता है। खेतों की मुंडेर, पेड़-पौधों की जड़ों, कोटरों में चूहो की तलाश में उल्लू को ज्यादा परेशानी नहीं होती है।

भारत में उल्लूओं की लगभग 60 उपजातियां पाई जाती है। जीव विज्ञान की भाषा में कहें तो उल्लूओं की तीन प्रजाती है। 1. टाइटोनिडी 2. फोर्डीलिडी 3. स्ट्रीजिड़ी। शिकारी पक्षियों में उल्लू अपने शिकार को बिना किसी चीरफाड के सीधा गटक ने का कमाल करता है। वह सांप मेंढक, छिपकलियों का शिकार भी करता है। उल्लू को पहचानना सरल है। गोल सिर, दो बड़ी-बड़ी आंखें, मजबूत चोंच जो उसे रहस्यमय बनाते है। अब आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि इतने बहुतउपयोगी जीव को उसके अनोखे गुणों के कारण ही लक्ष्मी स्वरूप माना गया है। किसान के मित्र और अन्न-धन की रक्षा प्रदाता के रूप में उसका लक्ष्मी जी के साथ संबद्ध करने का उद्देश्य भी यही प्रतीत होता है।

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