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मां नैना देवी के दरबार में होती है हर मुराद पूरी

गृहलक्ष्मी टीम

6th October 2016

 

नैना देवी 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहीं सती की आंखें गिरी थीं। यूं को मां के दरबार में हर वक्त भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन श्रावण अष्टमी, चैत्र नवरात्र और आश्विन नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटती है।
 
मंदिर के मुख्य भवन में प्रवेश करते ही मां के दरबार की झलक मिल जाती है। मां नैना देवी यहां स्वयं भू-पिंडी के रूप में पूजी जाती हैं। इस शक्ति पीठ में सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इस मंदिर का नाम नैना देवी पड़ा है। 
 
कुछ ऐसा है मां का दरबार
 
चंडीगढ़ से हिमाचल प्रदेश की ओर बढ़ते हुए सबसे पहले मां नैना देवी का मंदिर पड़ता है। यह एक 12 कि.मी. ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए इलैक्ट्रिक ट्रॉली की व्यवस्था है। पहाड़ी पर पहुंचकर आपको कतार में बहुत सी प्रसाद की दुकानें मिल जाएंगी। उल्टे हाथ की तरफ एक बड़ा पीपल का पेड़ है, जबकि सीधे हाथ की तरफ भगवान और हनुमान जी के मंदिर हैं। दरबार के बाहर, माता के प्रिय वाहन सिंह की दाई और बाई ओर दो मूर्तियां बनी हैं। मंदिर के भीतर मां की सुंदर मूर्ति के दर्शन होते हैं। एक तरफ काली माता की मूर्ति और दूसरी तरफ गणेश जी की मूर्ति के बीच में मां नैना देवी की मूर्ति है। मूर्ति के रूप में दो चांदी की आंखें और अन्य आभूषण हैं।
 
इस मंदिर के पीछे का रहस्य
 
मंदिर को महिषापीठ के नाम से भी जाना जाता है। महिषापीठ आदिकाल में हुए राक्षस महिषासुर के नाम पर पड़ा है। वह एक अति भयंकर दानव था। उसे ब्रह्माजी से वरदान मिला था कि वह केवल एक कुंवारी कन्या के हाथों ही मारा जा सकता है। देवताओं की रक्षा करने के लिए देवी ने महिषासुर का वध करने का निश्चय किया। माता ने महिषासुर के साथ भीषण लड़ाई की और उसका वध कर दिया। माता ने उसकी आखें निकाल दीं और देवताओं ने उनके जयघोष में जय नैना कहते हुए फूल बरसाए। कहा जाता है कि तभी से मंदिर का नाम नैना देवी पड़ा। 
 
कैसे पहुँचे -  नैना देवी के मंदिर तक पहुंचने के लिए पहले भाखड़ा नांगल लाइन पर आनंदपुर साहिब पहुंचा जा सकता है। यहां से उत्तर की ओर शिवालिक की चोटी पर यह मंदिर स्थित है।